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वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

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पृष्ठ 67

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri द्वितीय अध्याय 39 प्रायः साम्प्रदायिक हैं। ऋग्वेद का उपवेद 'आयुर्वेद', यजुर्वेद का 'धनुर्वेद', सामवेद का 'गन्धर्ववेद' तथा अथर्ववेद का 'अर्थ-वेद' है। चारों वेदों में चौबीस हजार मंत्र हैं तथा सात लाख अड़सठ हजार शब्द हैं। ऋग्वेद सभी वेदों में बड़ा है। इसमें १० मण्डल हैं। इन मण्डलों में १०२८ सूक्त और १०५८९ ऋचाएँ हैं। इन ऋचाओं में १५, ३८२६ पद हैं जिनमें ४३२००० अक्षर हैं। सामवेद में १५४३ साममन्त्र हैं। यजुर्वेद में ४० अध्याय हैं जिनमें १९७५ कण्डिकाएँ हैं। अथर्ववेद में २० काण्ड हैं जिनमें ७६० सूक्त और लगभग ६००० मन्त्र हैं। वेदत्रयी उपर्युक्त विवेचन में बतलाया गया है कि वेद चार हैं- ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद तथा अथर्ववेद। फिर वेदत्रयी से क्या तात्पर्य है ? वस्तुतः वेद तो चार ही हैं, जैसा कि अति प्राचीन काल से माना जाता रहा है, परन्तु विद्या तीन प्रकार की होती है। अतः वेद को त्रयीविद्या भी कहा जाता है। मनु ने इसे त्रयं ब्रह्म की संज्ञा प्रदान की है तथा उसे सनातन स्वीकार किया है। सनातन तथा शाश्वत का अर्थ है— जो सदैव विद्यमान रहे, कभी नष्ट न हो। सृष्टि के आरम्भ में यह विद्या प्रकट होती है और प्रलय काल में ब्रह्म में तिरोहित हो जाती है। गद्य, पद्य तथा गान की दृष्टि से भी वेद तीन प्रकार से उच्चरित होते हैं। यजुर्वेद प्रमुखतः गद्य में ऋग्वेद पद्य में तथा सामवेद गानरूप में है। यह त्रयीविद्या 'ऋग्यजुः साम' लक्षण वाली हैं। शतपथब्राह्मण (४/६/७/१) में कहा गया है— त्रयी वै विद्या ऋचो यजूंषी सामानि। तैत्तरीय ब्राह्मण (१/२/२६) के अनुसार त्रयी यजूंषि सामानि। ऐतरेयब्राह्मण (५/५/६) के अनुसार त्रयोवेदा अजायन्त, ऋग्वेद एव अग्नेरजायत, यजुर्वेदो वायोः सामवेदः आदित्यात्। छान्दोग्यब्राह्मण (१/१७/१/१०) का कथन है— अग्नेर्ऋचो वायोर्यजूंषि सामान्यादित्यात् सएतां त्रयीं विद्यामभ्यपतत्। इन्हीं तीन विद्याओं को आगे चलकर ज्ञान, कर्म तथा भक्ति के रूप में प्रसिद्धि प्राप्त हुई। ऋग्वेद में ज्ञान की मुख्यता है, यजुर्वेद में कर्मकाण्ड की मुख्यता है और इसी प्रकार सामवेद में भक्ति की मुख्यता है। अथर्ववेद में इन तीनों ही विद्याओं का समाहार है तथा अध्यात्म की प्रधानता है। अतः वेद चार हैं किन्तु विद्या तीन है, अतः विद्या की दृष्टि से "वेदत्रयी" संख्या भी सार्थक है। वेद मन्त्र वेद मन्त्रों का समूह है। मन्त्र शब्द मन् धातु से बना है। मन्त्र का अर्थ होता है- मनन कराने वाला। मंत्राः मननात्। श्री दुर्गाचार्य स्वयं निरुक्त (७/३/६) के भाष्य में CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar