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वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

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पृष्ठ 66

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 38 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता के लिये वेदों को ही अधिकार प्रदान करती है। वेद एक प्रकार से सम्पूर्ण ज्ञान-विज्ञान का आदि स्रोत है। उसमें सभी विद्याओं के बीज विद्यमान हैं। भारतीय धर्म, दर्शन, साहित्य, भाषा, सभ्यता, संस्कृति तथा कला का भव्य प्रासाद वेदों की सुदृढ़ आधारशिला पर अवलम्बित है। वेद अनन्त ज्ञान-राशि का वह अक्षय भण्डार है, जो आर्यों के पूर्वज ऋषियों के द्वारा परिलक्षित तथा आविष्कृत होकर नाना प्रकार के मन्त्रों एवं विधानों के समूह के रूप में प्रादुर्भूत हुआ है। अधिकांश विद्वानों का मत है कि वेदों से ही धर्म निःसृत हुआ ‘‘वेदाद्धर्मोहिन्निबभौ।’’ वेद-मन्त्र मानव-निर्मित नहीं है, बल्कि ऋषियों ने इनका साक्षात्कार किया है। ऐतरेय ब्राह्मण (३।९) तथा कौषीतकि ब्राह्मण (१०/३०) के अनुसार वेद मन्त्रों का अवलोकन किया गया है। इसीलिये यास्क ने निरुक्त में और कात्यायन ने ‘‘सर्वानुक्रमसूत्र’’ में मन्त्र-दर्शियों को ‘ऋषि’ की संज्ञा से सम्बोधित किया है। कहा भी गया है- ऋषयः मन्त्रद्रष्टारः अर्थात् मन्त्रों को देखने वाले ‘ऋषि’ है। श्वेत-श्वतरोपनिषद् (६/२) के अनुसार यो वै वेदाश्य प्रहिणोति तस्मै अर्थात् सर्वप्रथम ईश्वर ने ब्रह्मा को उत्पन्न किया तथा लोक-शिक्षार्थ उन्हें वेद प्रदान किए। उसी वेद को ऋषियों ने समाधिस्थ-अवस्था में प्राप्त करके छन्दोमयी वाणी के रूप में प्रकट किया। जो मन्त्र ऋषियों द्वारा साक्षात्कृत किये गये थे, वे मन्त्र कष्ठाम, तथा जो मन्त्र ऋषियों की स्मरण-शक्ति के द्वारा अनुमोदित किए गए, वे मन्त्र कल्प्य कहलाते हैं। वेदों के शब्दों, अर्थों, मन्त्रों एवं छन्दों का रूप नित्य है। वेद और उपवेद वेद शब्द ‘विद् ज्ञाने’ धातु से ‘घञ्’ प्रत्यय लगाने से बनता है। इस प्रकार वेद शब्द का अर्थ ‘‘सम्यक ज्ञान’’ है। आचार्य सायण वेद शब्द की मीमांसा करते हुए लिखते हैं- इष्टप्राप्त्यनिष्टपरिहारयोरलौकिकमुपायं यो ग्रन्थो, वेदयति, सः वेदः। भाव यह है कि वैदिक ज्ञान वह है जो नित्य एवं शाश्वत है तथा जिससे अभ्युदय एवं निःश्रेयस की प्राप्ति सहज में ही हो जाती है। वेद चार हैं- १. ऋग्वेद, २. यजुर्वेद, ३. सामवेद, ४. अथर्ववेद। प्रत्येक वेद- संहिता, ब्राह्मण, आरण्यक तथा उपनिषद् इन चार ही रूपों में चर्चित पाया जाता है। ऋग्वेद की एकमात्र शाकल-शाखा ही उपलब्ध है। शुक्ल यजुर्वेद की काण्व तथा माध्यन्दिन- ये दो शाखाएँ उपलब्ध होती हैं। सामवेद की कौथुम तथा राणायनीय- ये दो शाखाएँ प्राप्त होती हैं। अथर्ववेद की पिप्पलाद एवं शौनक शाखाएँ उपलब्ध हैं। इन शाखाओं में मन्त्र, संख्या-भेद, उच्चारण-भेद तथा पाठ-भेद मिलते हैं जो कि CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar