भारतकोश
वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

पृष्ठ 65, कुल 353 में से

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पृष्ठ 65

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri द्वितीय खण्ड - परिपार्श्व द्वितीय अध्याय वैदिक वाङ्मय का संक्षिप्त सर्वेक्षण वेद ईश्वरीय ज्ञान है। संसार के समस्त ज्ञानी पुरुष भूमण्डल के इतिहास में सर्वप्राचीन ग्रन्थ के रूप में वेद के महत्त्व को स्वीकार करते हैं। प्राचीनतम ग्रन्थ के रूप में वेद, की गौरव गरिमा के समक्ष विद्वत्मण्डली एक मत से नतमस्तक है। वेद ऐसी दिव्य वाणी है, जो देश-काल-इतिहास की सीमाओं में न बँधकर समान रूप से, सदा सबको कल्याण का निर्देशन करती है। वेद का तात्पर्य "ज्ञान" है और ज्ञान का लक्ष्य है निर्माण, कल्याण, उत्थान। ज्ञान के नेतृत्व में विज्ञान सुख सुविधा का कारण बने, और इस प्रकार जीवन का प्रत्येक चरण सानन्द एवं सौल्लास हो। आर्य जाति अथवा हिन्दू जाति की वेदों में आस्था एवं श्रद्धा अति प्राचीन काल से मान्य है। पृथिवी के किसी भी स्थान का निवासी हिन्दू अपने धर्म तथा संस्कृति के मूल-तत्त्व, वेदों को ही स्वीकार करता है। वेद आर्य जाति के प्राण सदृश हैं। आर्य सभ्यता, आर्य संस्कृति, आर्य-आचार प्रणाली, आर्य दर्शन सब कुछ वेद की ही देन है। वेद, प्राथमिक, अति पवित्र, अति उदात्त तथा श्रेष्ठ प्रमाण है। अपने सृष्टिकाल से लेकर अद्यावधि वेद अक्षुण्ण रूप से आर्य जाति का सहचर बना हुआ है। वेदों में जीवन, प्रकृति में भौतिकता, आध्यात्मिकता में, ज्ञान तथा कर्म में, सामञ्जस्य का सफल प्रयास है। यह आशा का संदेश है, निराशा का नहीं। भारतीय साहित्य में वेदों का गुणगान सदा से किया जाता रहा है। हमारे साहित्य में जो स्थान वेदों को प्राप्त है, वह इतर ग्रन्थों को नहीं। वेदों को ईश्वर-निर्मित तथा अपौरुषेय स्वीकार करके इनकी प्रामाणिकता स्वीकार की गई है। विश्व साहित्य में वेद केवल प्राचीनता की दृष्टि से ही नहीं, बल्कि सृष्टिविज्ञान की दृष्टि से भी महत्त्वपूर्ण हैं। भारतीय-दर्शन की अधिकांश विचारधाराएँ मुक्त कण्ठ से वेदों को प्रामाण्य मानती हैं। स्मृतियाँ भी वेदों के आदेश एवं उपदेश को मूर्धन्य स्थान प्रदान करती हैं। मनु के अनुसार वेद-निन्दक "नास्तिक" हैं अर्थात् आस्तिक होने के लिए ईश्वर के प्रति निष्ठा उतनी अपेक्षित नहीं, जितनी वेदों के प्रति। मनु की दृष्टि में वेद सनातन चक्षु हैं। वेद में जो कुछ उल्लिखित है, (वही) धर्म है। उसके प्रतिकूल आचरण अधर्म है। आज भी हिन्दुओं के घरों में सामाजिक एवं धार्मिक कृत्य बिना वेद-मन्त्रों के उच्चारण के सम्पन्न नहीं होते। 'गीता' भी शास्त्र के रूप में विधि-निषेध की मर्यादा CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar