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वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

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पृष्ठ 70

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42 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता

महात्मा भर्तृहरि ने वाक्यपदीय में ऋग्वेद की १५ शाखाओं का उल्लेख किया है। कतिपय विद्वानों ने तो इसकी ३४ शाखाएँ बतलाई हैं। श्रीमद्भागवत में लिखा है कि महर्षि वेदव्यास ने मन्त्र समुदाय में से भिन्न-भिन्न प्रकरणों के अनुसार मन्त्रों का संग्रह करके उनसे ऋग्, यजुः, साम तथा अथर्व— ये चार संहिताएं बनाईं। उन्होंने "बह्वृच्" नामक पहली ऋक् संहिता पेल को, "निगद" नामक दूसरी यजुः संहिता वैशम्पायन को, सामश्रुतियों की "छन्दोग- संहिता" जैमिनी को, तथा सुमन्तु को "अथर्वाङ्गिरससंहिता" का अध्यापन कराया- पैलाय संहितामाद्यं बह्वृचाख्यामुवाच ह। वैशम्पायनसंज्ञाय निगदाख्यं यजुर्गणम्॥ साम्नां जैमिनये प्राह तथा छन्दोगसंहिताम्। अथर्वाङ्गिरसीं नाम स्वशिष्याय सुमन्तवे॥ (स्कन्ध १२ अ० ६, श्लोक ५२/५३) पैल मुनि ने संहिता को दो भागों में करके एक का अध्ययन इन्द्रप्रमिति को और दूसरे का बाष्कल को कराया। बाष्कल ने अपनी शाखा के चार भाग करके अपने शिष्य बोध्य याज्ञवल्क्य, पराशर और अग्निमित्र को पढ़ाया। इन्द्रप्रमिति ने अपनी संहिता का अध्ययन माण्डूकेय ऋषि को कराया। माण्डूकेय के पुत्र का नाम शाकल्य था। उन्होंने अपनी संहिता के पाँच भाग करके उन्हें वात्स्य, मुद्गल, शालीय, गोखल्य तथा शिशिर नामक शिष्यों को पढ़ाया। इसी प्रकार का वर्णन विष्णु-पुराण में भी मिलता है। (ब) यजुः संहिता :- यह संहिता दो भागों में विभक्त है— १. शुक्ल संहिता २. कृष्ण संहिता। इसके भेद का कारण सूर्य से वैशम्पायन तथा वैशम्पायन से याज्ञवल्क्य द्वारा आधीत वेद का वमन करना कहा जाता है और उस वमन का तित्तिर के रूप में जिन ऋषियों ने भक्षण किया, उनके द्वारा प्रवर्तित तैत्तरीय शाखा चली और वही कृष्ण यजुर्वेद कहलाया। यह प्रसंग इस प्रकार है— महर्षि वैशम्पायन ने यजुर्वेद की सत्ताइस शाखाओं की रचना की और अपने शिष्यों को पढ़ाया। वैशम्पायन को ब्रह्म हत्या लगी। वैशम्पायन ने अपने शिष्यों से कहा कि वे ब्रह्म हत्या को दूर करने के लिए व्रत का अनुष्ठान करें। इस पर वैशम्पायन के शिष्य याज्ञवल्क्य ने कहा— हे भगवन्! ये सब ब्राह्मण निस्तेज हैं। मैं अकेला ही व्रत का अनुष्ठान करूँगा। इस पर क्रोधित होकर गुरु वैशम्पायन ने कहा कि तू अत्यन्त ही अहंकारी है, तूने जो कुछ भी

CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar