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वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

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पृष्ठ 71

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri द्वितीय अध्याय 43 मुझसे पढ़ा है, सब त्याग दे। याज्ञवल्क्य ने गुरु की आज्ञा पाते ही उनके पढ़ाये यजुर्वेद को वमन कर दिया। याज्ञवल्क्य द्वारा वमन किए गए यजुः को वैशम्पायन के अन्य शिष्यों ने तित्तिर बनकर ग्रहण कर लिया, इसलिये वे सब तैत्तरीय कहलाए। गुरु के निर्देश से व्रताचरण करने के कारण यजुः शाखाध्यायी चरकाध्वर्यु हुए, जैसा कि कहा भी गया है— यजूंष्यथ विसृष्टानि याज्ञवल्क्येन वै द्विज। जगृहुस्तित्तिरा भूत्वा तैत्तिरीयास्तु ते ततः॥ ब्रह्महत्याव्रतं चीर्णं गुरुणा चोदितैस्तु यैः। चरकाध्वर्यवस्ते तु चरणान्मुनिसत्तम॥ याज्ञवल्क्य ने भी यजुर्वेद की प्राप्ति के लिए संयतचित्त होकर भगवान् सूर्य की उपासना की। भगवान् सूर्य ने अश्व रूप में प्रकट होकर उन्हें अयातयाम नामक यजुः श्रुतियों का उपदेश दिया जिन्हें उनके गुरु वैशम्पायन भी नहीं जानते थे। उन श्रुतियों का अध्ययन करने वाले ब्राह्मण वाजी के नाम से प्रसिद्ध हुए। इन वाजि श्रुतियों की काण्व आदि पन्द्रह शाखाएँ हैं— एवमुक्तो ददौ तस्मै यजूंषि भगवान् रविः। अयातयामसंज्ञानि यानि वेन्ति न तद्गुरुः। यजूंषि यैरधीतानि तानि विप्रैर्द्विजोत्तम। वाजिनस्ते समाख्याताः सूर्योऽप्यश्वोऽमवद्यतः। शाखाभेदास्तु तेषां वै दश पञ्च च वाजिनाम्। काण्वाद्यास्सुमहाभाग याज्ञवल्क्याः प्रकीर्तिताः॥ कृष्णयजुर्वेद की तैत्तिरीय, कठ तथा मैत्रायणी मुख्य शाखाएँ हैं जो कि अब प्राप्त नहीं होती। शुक्ल-यजुर्वेद की वाजसनेयी और कठ शाखाएँ पूर्णतया सुरक्षित हैं। ऐसा माना जाता है कि यजुर्वेद में किंचित् गद्यभाग भी उपलब्ध होता है। आधुनिक विचारकों की मान्यता है कि कृष्ण यजुर्वेद में मन्त्र तथा ब्राह्मण साङ्कर्य है तथा उसका विवेक करना अत्यन्त कठिन है अतएव उसकी कृष्ण संज्ञा पड़ गई। शुक्ल यजुर्वेद में मन्त्र तथा ब्राह्मण पृथक्-पृथक् हैं, अतः उसे 'शुक्ल' कहा गया है। कृष्ण यजुर्वेद दाक्षिणात्यों में अधिक प्रचलित है। यजुर्वेद में याज्या, अनुवाक्या आदि ऋचाओं का विशेष निरूपण हुआ है। स्त्रोतों का निरूपण सामवेद में हुआ है। इस प्रकार कर्मों की आधारभित्ति यजुर्वेद है और उसमें विशेषतापादक ऋक् तथा साम हैं। तथाहि— CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar