भारतकोश
वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

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44 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता अध्वर्युमुख्यैर्ऋत्विग्भिश्चतुर्भैर्यज्ञसम्पदः। निर्मिमीते क्रियासघेरध्वर्युर्यज्ञियं वपुः॥ तदलंकरूते होता ब्रह्मोद्गातेत्यमी त्रयः। यज्ञं यजुर्भिरध्वर्युर्निर्मिमीते तसो ह्यजुः॥ व्याख्यातं प्रथमं पश्चादृग्भ्यां व्याख्यानमोरितम्। साम्नामृगाश्रितत्वेन सामव्याख्याथ वर्ण्यते॥ यजुर्वेद में पहला अध्याय तथा अठ्ठाईसवीं कण्डिका दर्शपूर्णमास का प्रकरण है। द्वितीयाध्याय की समाप्ति तक पिण्डपितृयाग है। तृतीयाध्याय में अग्न्याधान है। अग्निष्टोम होम, अग्नि, उपस्थापन, चातुर्मास्य भी संक्षिप्त रूप में वर्णित है। चतुर्थाध्याय से आठवें अध्याय के ३३वें मन्त्र तक सोम याग है। फिर षोडशी याग, द्वादशाह याग तथा गवानयन है। ९वें अध्याय में ३४वें मन्त्र तक वाजपेय याग है फिर राजसूय है। दशम में भी राजसूय तथा तदन्तर्गत चरक सौत्रामणी है। ११वें अध्याय से १८वें अध्याय तक अग्निचयन है। इसके बाद १४वें अध्याय तक सौत्रामणी है। १८वें अध्याय तक अश्वमेध है। ३९वें अध्याय तक खिलमंत्र है तथा उनमें सर्वमेध और पुरुषमेध का प्रतिपादन हुआ है। ४०वें अध्याय में अध्यात्म विषयों का निरूपण है। (स) साम संहिता :- सामवेद संहिता दो भागों में विभक्त है— छन्दोवेद तथा गानवेद। इसको गान संहिता भी कहते हैं तथा छन्द संहिता भी। इसमें छन्दस् संहिता में तथा गान-संहिता में ऋगादि मन्त्रों का विशेष प्रयोग हुआ है। वर्णविकारों से विकृत गायत्री आदि छन्द गान संहिता में प्रयुक्त हैं। गान का लक्षण है— "आभ्यन्तरप्रयत्नजन्यः वागिन्द्रियव्यापारविशेषो गानम्।" "षड्जश्च ऋषभश्चैव गान्धारो मध्यमस्तथा। पञ्चमो धैवतश्चैवचनिषादः सप्तमः स्वरः॥" गान समय में मनस्वरूप में किंचित् विकृति हो जाती है, उसके ८ कारण हैं- (१) विकार (२) विश्लेष (३) विकर्षण (४) विराम (५) अभ्यास (६) लोप (७) आगम तथा (८) स्तोम। इनमें "विकार" का अर्थ स्पष्ट है जो "इको यणचि" आदि से होता है। सन्धि-विच्छेद को 'विश्लेष' कहते हैं। ह्रस्व के स्थान पर दीर्घ और दीर्घ के स्थान पर लुप्त उच्चारण "विकर्षण" है। वर्णोच्चारण के पश्चात् दो तीन मात्रा काल तक रुकना 'विराम' है। अन्तिम या अथ पद की आवृत्ति या तीन

CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar