भारतकोश
वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

पृष्ठ 73, कुल 353 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 73

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri द्वितीय अध्याय 45 बार कथन "अभ्यास" कहलाता है। किसी वर्ण का उच्चारण न करना "लोप" है। किसी पद में किसी अन्य पद का संयोग कर के उच्चारण "आगम" है। जो शब्द मन्त्र के मध्य में गान-काल में असम्बन्ध रूप से बढ़ाकर बोले जावें, उन्हें "स्तोम" कहते हैं। यह कहा भी गया है— "ऋचो यदधिकं किञ्चिद् द्विरुक्तं वापि दृश्यते। स्तोभत्वं तस्य मन्यन्ते क्रमशः शास्त्रचिन्तकाः॥" महर्षि जैमिनि ने सामवेद की शाखाओं का विभाग किया था। जैमिनि के पुत्र सुमन्तु तथा सुमन्तु के पुत्र सुकर्मा ने सामवेद की एक-एक शाखा का अध्ययन किया। सुकर्मा ने सामवेद संहिता के एक हजार शाखा भेद किए— "सहस्रसंहिताभेदं सुकर्मा तत्सुतस्ततः। चकार तं च तच्छिष्यौ जगृहाते महाव्रतौ॥" सामवेद की १००० शाखाओं में सम्प्रति जैमिनीय, राणायनीय तथा कौथुम—ये तीन ही शाखाएँ प्राप्त हैं। सामवेद की प्रशंसा करते हुए भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा है— ‘वेदानां सामवेदोऽस्मि’ । साम की प्रशस्ति में एक स्थान पर कहा गया है— "यद् ऋचा स्तुवते तदसुरा अन्ववायन् यत् साम्ना स्तुवते तदसुरा नान्ववायन्, य एवं विद्वान्, साम्ना स्तुवीत, इत्यृचं निन्दित्वा साम प्रशस्य लिङ्ग प्रत्ययेन साम विहिंत तस्मात् साम्रैव तव्यम्।" बृहद्देवता में तो यहाँ तक कहा गया है कि जो व्यक्ति सामवेद को जानता है, वहीं वस्तुतः वेद को समझता है— "सामानि यो वेत्ति स वेद तत्त्वम्" (द) अथर्व संहिता :- अथर्ववेद के द्रष्टा ऋषि अथर्वा अथवा अङ्गिरस हैं। इसमें २० काण्ड, ७५९ सूक्त और ५९७७ मन्त्र हैं। आदि के दश काण्डों को छोड़कर आगे के दश काण्डों को अङ्गिरोवेद कहते हैं। इसीलिए इसको अथर्वाङ्गिरोवेद भी कहा गया है। यहाँ तक भी ज्ञातव्य है कि "अश्व" शब्द मन का वाचक है। इस प्रकार अश्वमेध का अर्थ मनोनिरोध होगा। जब यजुर्वेदोक्त अश्वमेध को इस भावना से कर चुके तब समाप्ति के अनन्तर पूर्णाहूति के पश्चात् गृहस्थ को ऋग्वेद का उपदेश देना चाहिए तथा जो अश्वमेधकर्ता वृद्ध हों उन्हें यजुर्वेद का द्वितीय दिन उपदेश करना चाहिए। तीसरे दिन युवकों को अथर्ववेद का उपदेश देना चाहिये। चौथे दिन स्त्रियों को अङ्गिरोवेद १०वें काण्ड से अन्तिम काण्ड तक अथर्ववेद का उपदेश देना चाहिए। अन्यत्र कहा भी गया है— "युवतयः शोभना उपसमेता भवन्ति ता उपदिशत्याङ्गिरोवेद।" CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar