भारतकोश
वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

पृष्ठ 74, कुल 353 में से

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पृष्ठ 74

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 46 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता अथर्ववेद की नौ शाखाएँ हैं। दक्षिण भारत में शौनक संहिता तथा उत्तर भारत में पैप्पलाद संहिता का अधिक प्रचार है। अथर्ववेद का एक मात्र गोपथ ब्राह्मण है और कौशिक सूत्र नामक एक ही कल्पसूत्र है। अथर्ववेद परिशिष्ट में लिखा है कि जिस राजा के राज्य में अथर्ववेद का ज्ञाता निवास करता है, वह राष्ट्र विघ्न रहित होकर निरन्तर प्रगति की ओर अग्रसर होता है— ‘‘यस्य राज्ञो जनपदे अथर्वा शान्तिपारगः। निवसत्यपि तद् राष्ट्रं वर्धते निरूपद्रवम्॥ तस्माद् राजा विशेषेण अथर्वाणं जितेन्द्रियम्। दानसम्मानसत्कारैर्नित्यं समभिपूजयेत्॥’’ अथर्ववेद की प्रशंसा में एक स्थान पर कहा गया है— ‘‘न तिथिर्न च नक्षत्रं न ग्रहो च न चन्द्रमाः। अथर्वमन्त्रसम्प्राप्त्या सर्वसिद्धिर्भविष्यति॥’’ गोपथ ब्राह्मण में भी इस प्रकार कहा गया है— ‘‘एतद्वैभूमिष्ठं ब्रह्मयद् भृग्वङ्गिरसः। येऽङ्गिरसः सरसः येऽथर्वाणस्तद् भेषजम्, यद् भेषजं तदमृतं, यदमृतं तद् ब्रह्म।’’ स्कन्दपुराण में भी उल्लेख किया गया है— ‘‘यस्तत्राथर्वणान् मन्त्रान् जपेच्छ्रद्धासमन्वितः। तेषामर्थोद्भवं कृत्स्नं फलं प्राप्नोति स ध्रुवम्॥’’ २. ब्राह्मण ग्रन्थ :- ब्राह्मण ग्रन्थ गद्यात्मक रचनाएँ हैं। इनमें आध्यात्मिक तत्त्वों का निरूपण है। आध्यात्मिक तत्त्वों में मुख्यतः यज्ञ-यागों का प्रतिपादन तथा उनकी विधियों की स्पष्ट व्याख्या करना ही ब्राह्मणों का उद्देश्य रहा है। इनमें वैदिक अनुष्ठानों का क्रियात्मक रूप उपलब्ध होता है। इस प्रकार ‘ब्राह्मण’ में मन्त्रों, कर्मों एवं विनियोगों का सम्पूर्ण वर्णन प्राप्त होता है। ‘ब्रह्म’ का अर्थ ‘यज्ञ’ भी होता है। अतः यज्ञ का प्रतिपादन एवं यज्ञों की प्रचुर व्याख्या करने के कारण इनकी ब्राह्मण संज्ञा सार्थक है। वेदों के समान ही ब्राह्मण ग्रन्थों का भी साक्षात्कार किया गया है, किन्तु वेद मन्त्रों के द्रष्टा ऋषि कहलाते हैं, जबकि ब्राह्मणों के द्रष्टा आचार्य। स्वरूप की दृष्टि से भी वेदों तथा ब्राह्मणों में पर्याप्त अन्तर है। प्रायः चारों वेद छन्दों में उपनिबद्ध हैं, जबकि ब्राह्मण ग्रन्थ आद्योपान्त गद्यात्मक ही हैं। ब्राह्मण ग्रन्थों के प्रतिपाद्य विषय के सम्बन्ध में जैमिनि शबरस्वामी ने निम्न दस घटकों का उल्लेख किया है— CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

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