भारतकोश
वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

पृष्ठ 75, कुल 353 में से

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पृष्ठ 75

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri द्वितीय अध्याय 47 हेतुर्निर्वचनं निन्दा प्रशंसा संशयो विधिः। परक्रिया पुराकल्पो व्यवधारण कल्पना। उपमानं दशैते तु विधयो ब्राह्मणस्य तु॥ (२/१/८) किन्तु विधि ही ब्राह्मणों का प्रधान विषय है। अन्य विषय उसके अङ्ग होने के कारण गौण माने जाते हैं। इसके विपरीत संहिताओं में देव स्तुतियाँ, यज्ञ-यागों के लिए मन्त्र एवं मन्त्रांश तथा ऐहिक और पारलौकिक फल देने वाले विषयों का निदर्शन है। पुरातन-काल में ब्राह्मण साहित्य अति विशाल था, किन्तु उनमें से अधिकांश ग्रन्थ काल-कवलित हो चुके हैं। अनेक ब्राह्मण ग्रन्थों का मात्र नाम ही उपलब्ध होता है। उपलब्ध ब्राह्मण ग्रन्थों के नाम निम्नलिखित हैं— ऋग्वेदीय ब्राह्मण– इसके दो ब्राह्मण हैं— ऐतरेय एवं शाङ्ख्यायन। ऐतरेय ब्राह्मण चालीस अध्यायों वाला है जबकि शाङ्ख्यायन ब्राह्मण तीस अध्यायों के रूप में प्राप्य है। यजुर्वेदीय ब्राह्मण– इस वेद के दो उपविभाग होने के कारण ब्राह्मण भी दो भागों में विभक्त हैं। एक तो कृष्ण-यजुर्वेदीय ब्राह्मण तथा दूसरा शुक्ल-यजुर्वेदीय ब्राह्मण। कृष्ण-यजुर्वेद के ब्राह्मण का नाम तैत्तिरीय ब्राह्मण तथा शुक्ल-यजुर्वेद का ब्राह्मण शतपथ ब्राह्मण कहलाता है। सामवेदीय ब्राह्मण– सामवेद के नौ ब्राह्मण हैं, वे हैं— ताण्ड्य ब्राह्मण, षड्विंश ब्राह्मण, सामविधान ब्राह्मण, आर्षेय ब्राह्मण, दैवत ब्राह्मण, उपनिषद् ब्राह्मण, संहितोपनिषद् ब्राह्मण तथा जैमिनीय ब्राह्मण। अथर्ववेदीय ब्राह्मण– अथर्ववेद का तो मात्र एक ही ब्राह्मण है— गोपथ ब्राह्मण। इसके दो भाग हैं— पूर्वगोपथ तथा उत्तरगोपथ। ३. आरण्यक :- इन ग्रन्थों का किंचित अंश ब्राह्मण से सम्बन्धित है तथा किंचित अंश स्वयं स्वतन्त्र अस्तित्व वाला है। वस्तुतः आरण्यक ब्राह्मण ग्रन्थों के परिशिष्ट भाग के सदृश हैं। 'अरण्य' में पाठ होने के कारण आरण्यक नाम सार्थक है। वस्तुतः ये ग्रन्थ नगरों तथा ग्रामों में न पढ़े जाकर वनों में पढ़े जाते हैं। कहा भी गया है— "अरण्ये एवं पाठ्यत्वादारण्यकमितीर्यते।" इन ग्रन्थों में अरण्यस्थ ऋषियों अथवा वानप्रस्थ आश्रम को ग्रहण कर चुकने वाले व्रतियों के यज्ञ, महाव्रत एवं होत्र आदि का विस्तृत विवेचन उपलब्ध होता है। मुख्यतः इनमें यज्ञीय रहस्यों का प्रतिपादन है। इनमें आरण्यक ऋषियों के कर्मकाण्ड के अतिरिक् यज्ञ की आध्यात्मिक CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

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