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वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

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पृष्ठ 76

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 48 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता व्याख्या एवं दार्शनिक चिन्तन का भी समावेश है। उपनिषदों में विकसित ब्रह्मज्ञान एवं दर्शन का मूल आधार ये आरण्यक ग्रन्थ ही हैं। संहिताओं एवं ब्राह्मणों की संख्या के बराबर ही आरण्यक भी होने चाहिये किन्तु खेद का विषय है कि सम्पूर्ण आरण्यक साहित्य उपलब्ध नहीं है। आरण्यक साहित्य का एक विशाल भाग काल कवलित हो चुका है। जो आरण्यक प्राप्त होते हैं, वे निम्नलिखित हैं- ऋग्वेद के दो आरण्यक मिलते हैं- (१) ऐतरेयारण्यक तथा (२) कौषीतकि या शाङ्खायन आरण्यक। ऐतरेय आरण्यक को ऐतरेय ब्राह्मण का अंश माना जाता है। शाङ्खायन आरण्यक भी ऐतरेय आरण्यक के सदृश ही हैं। सुविख्यात वैदिक भाष्यकार सायण एवं शङ्कर दोनों ने ही, ऐतरेय तथा शाङ्खायन आरण्यकों पर भाष्य लिखे हैं। यजुर्वेद के भी आरण्यक ग्रन्थ प्राप्त होते हैं। शुक्ल यजुर्वेद का बृहदारण्यक है, जो काण्व शाखा से सम्बन्धित हैं। इस पर शङ्कर, रामानुज तथा सायण के प्रामाणिक भाष्य उपलब्ध हैं। कृष्ण यजुर्वेद की मैत्रायणी शाखा का भी एक आरण्यक है, जो मैत्रायणीयोपनिषद् कहलाता है। कृष्ण यजुर्वेद की तैत्तरीय शाखा से सम्बन्धित आरण्यक की संज्ञा तैत्तरीय आरण्यक है। सामवेद से सम्बद्ध आरण्यक तवलकार आरण्यक के नाम से जाना जाता है। इसका दशम अनुवाद ही केनोपनिषद् है। अथर्ववेद का कोई आरण्यक ग्रन्थ नहीं है। इससे सम्बन्धित उपलब्ध उपनिषद् किसी आरण्यक का अंश नहीं है। वह स्वतन्त्र ग्रन्थ के रूप में प्राप्य है। ४. उपनिषद् :- उपनिषद् आरण्यकों में सम्मिलित होने से उन्हीं के विशिष्ट अङ्ग हैं। ये वेद के अन्तिम भाग हैं, वेद के सारभूत सिद्धान्तों के प्रतिपादक हैं, इसीलिए इन्हें वेदान्त भी कहा जाता है। उपनिषद् वैदिक भावना के विकास के द्योतक हैं। जिस प्रकार वैदिक कर्मकाण्ड की व्याख्या के लिए ब्राह्मण ग्रन्थों का प्रणयन हुआ, उसी प्रकार वैदिक ज्ञान काण्ड के लिए उपनिषद् रचे गए। उपनिषद् शब्द की निष्पत्ति दो शब्दों के योग से होती है, वे शब्द हैं- उप और निषद्। उप का अर्थ होता है निकट तथा निषद् का अर्थ है नीचे बैठने वाला अर्थात् परम तत्त्व के निकट बैठकर ग्रहण किये जाने वाला ज्ञान उपनिषद् के रूप में संग्रहीत हैं। यह अधिकारी को ब्रह्म के पास पहुँचा देता है। इसी कारण उपनिषद् शब्द ब्रह्मविद्या का भी द्योतक है। ये ग्रन्थ, ऋषियों, मुनियों एवं अन्य विद्वानों द्वारा विश्व, ईश्वर तथा मानव (जीव) के CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar