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वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 48 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता व्याख्या एवं दार्शनिक चिन्तन का भी समावेश है। उपनिषदों में विकसित ब्रह्मज्ञान एवं दर्शन का मूल आधार ये आरण्यक ग्रन्थ ही हैं। संहिताओं एवं ब्राह्मणों की संख्या के बराबर ही आरण्यक भी होने चाहिये किन्तु खेद का विषय है कि सम्पूर्ण आरण्यक साहित्य उपलब्ध नहीं है। आरण्यक साहित्य का एक विशाल भाग काल कवलित हो चुका है। जो आरण्यक प्राप्त होते हैं, वे निम्नलिखित हैं- ऋग्वेद के दो आरण्यक मिलते हैं- (१) ऐतरेयारण्यक तथा (२) कौषीतकि या शाङ्खायन आरण्यक। ऐतरेय आरण्यक को ऐतरेय ब्राह्मण का अंश माना जाता है। शाङ्खायन आरण्यक भी ऐतरेय आरण्यक के सदृश ही हैं। सुविख्यात वैदिक भाष्यकार सायण एवं शङ्कर दोनों ने ही, ऐतरेय तथा शाङ्खायन आरण्यकों पर भाष्य लिखे हैं। यजुर्वेद के भी आरण्यक ग्रन्थ प्राप्त होते हैं। शुक्ल यजुर्वेद का बृहदारण्यक है, जो काण्व शाखा से सम्बन्धित हैं। इस पर शङ्कर, रामानुज तथा सायण के प्रामाणिक भाष्य उपलब्ध हैं। कृष्ण यजुर्वेद की मैत्रायणी शाखा का भी एक आरण्यक है, जो मैत्रायणीयोपनिषद् कहलाता है। कृष्ण यजुर्वेद की तैत्तरीय शाखा से सम्बन्धित आरण्यक की संज्ञा तैत्तरीय आरण्यक है। सामवेद से सम्बद्ध आरण्यक तवलकार आरण्यक के नाम से जाना जाता है। इसका दशम अनुवाद ही केनोपनिषद् है। अथर्ववेद का कोई आरण्यक ग्रन्थ नहीं है। इससे सम्बन्धित उपलब्ध उपनिषद् किसी आरण्यक का अंश नहीं है। वह स्वतन्त्र ग्रन्थ के रूप में प्राप्य है। ४. उपनिषद् :- उपनिषद् आरण्यकों में सम्मिलित होने से उन्हीं के विशिष्ट अङ्ग हैं। ये वेद के अन्तिम भाग हैं, वेद के सारभूत सिद्धान्तों के प्रतिपादक हैं, इसीलिए इन्हें वेदान्त भी कहा जाता है। उपनिषद् वैदिक भावना के विकास के द्योतक हैं। जिस प्रकार वैदिक कर्मकाण्ड की व्याख्या के लिए ब्राह्मण ग्रन्थों का प्रणयन हुआ, उसी प्रकार वैदिक ज्ञान काण्ड के लिए उपनिषद् रचे गए। उपनिषद् शब्द की निष्पत्ति दो शब्दों के योग से होती है, वे शब्द हैं- उप और निषद्। उप का अर्थ होता है निकट तथा निषद् का अर्थ है नीचे बैठने वाला अर्थात् परम तत्त्व के निकट बैठकर ग्रहण किये जाने वाला ज्ञान उपनिषद् के रूप में संग्रहीत हैं। यह अधिकारी को ब्रह्म के पास पहुँचा देता है। इसी कारण उपनिषद् शब्द ब्रह्मविद्या का भी द्योतक है। ये ग्रन्थ, ऋषियों, मुनियों एवं अन्य विद्वानों द्वारा विश्व, ईश्वर तथा मानव (जीव) के CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri द्वितीय अध्याय 49 सम्बन्ध में ध्यानस्थ अवस्था में प्रत्यक्षीकृत ज्ञान का विशाल भण्डार है। " इन ग्रन्थों में एक अत्यन्त पुरातन् भारतीय दर्शन का मूलाधार निहित है। प्राचीन काल में इन ग्रन्थों का बृहद् भण्डार अवश्य रहा होगा और वे ग्रन्थ— गायकों, पुरोहितों एवं विचारकों द्वारा कण्ठस्थ करके कुल क्रमागत रूप में दूसरी पीढ़ियों को प्राप्त कराए जाते रहे होंगे। किन्तु विभिन्न कालों में वेद विरोधी शक्तियों द्वारा अनेक वैदिक ग्रन्थ नष्ट कर दिए गए। उन्हीं में ढेरों उपनिषद् भी समास हो गएं। इसी कारण अब उपलब्ध वैदिक साहित्य अत्यन्त अल्प है, फिर भी इतना अधिक तथा उत्कृष्ट है। उपनिषदों की संख्या के विषय में विद्वानों में पर्याप्त मतभेद हैं। मुक्तिकोपनिषद् में १०८ उपनिषदों की सूची दी गई है, जिनमें दस उपनिषद् "ऋग्वेद" से सम्बन्धित, उन्नीस "शुक्ल यजुर्वेद" से, बारह 'कृष्ण यजुर्वेद' से, सोलह "सामवेद" से तथा इकतीस "अथर्ववेद" से सम्बन्धित है। किन्तु शङ्कराचार्य ने केवल दस उपनिषदों पर अपना भाष्य लिखा है, वे ही प्रामाणिक उपनिषद् हैं। मुक्तिकोपनिषद् के अनुसार उनके नाम एवं क्रम इस प्रकार हैं— १. ईशोपनिषद् ६. माण्डूक्योपनिषद् २. केनोपनिषद् ७. तैत्तरीयोपनिषद् ३. कठोपनिषद् ८. ऐतरेयोपनिषद् ४. प्रश्नोपनिषद् ९. छान्दोग्योपनिषद् ५. मुण्डकोपनिषद् १० बृहदारण्यकोपनिषद् उपर्युक्त दस उपनिषदों के अतिरिक्त तीन अन्य उपनिषद् भी प्राचीन माने जाते हैं क्योंकि शङ्कराचार्य ने "ब्रह्मसूत्र भाष्य" में इनका नामोल्लेख किया है; वे हैं— १. कौषीतिकोपनिषद् २. श्वेताश्वतरोपनिषद् ३. मैत्रायणीयोपनिषद् इन उपनिषदों का विस्तृत विवेचन एवं उपनिषद् सम्बन्धी अन्य महत्त्वपूर्ण सामग्री आगे उपनिषदों के पृथक् अध्याय में विस्तारपूर्वक दी गई हैं। वैदिक साहित्य दैविक प्रकाश हैं। इससे निकट का सम्बन्ध रखने वाली रचना 'वेदाङ्ग' है। यह वैदिक साहित्य के अन्तर्गत नहीं आती। वेदाङ्ग :- वेद एक जटिल एवं दुरूह विषय है, भाव की दृष्टि से एवं भाषा की दृष्टि से भी। उसे सरल तथा सुबोध करने के लिए विद्वानों ने एक नूतन सूत्र साहित्य CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 50 वैदिक वाङ्ग्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता का प्रणयन किया। यह सूत्र साहित्य 'वेदाङ्ग' के नाम से प्रसिद्ध है। 'वेदाङ्ग' का तात्पर्य है- वेद के अङ्ग। अङ्ग का व्युत्पत्ति से प्राप्त अर्थ है उपकारक अर्थात् उपकार करने वाले। जिससे किसी वस्तु के स्वरूपज्ञान में सहायता प्राप्त हो वह अङ्ग कहलाता है। वेद के भावों एवं अर्थों के ज्ञान करने में सहायक शास्त्र 'वेदाङ्ग' की संज्ञा से पुकारा गया। वेदाङ्गों में छह अङ्ग सम्मिलित हैं। जो निम्नलिखित हैं- अ. शिक्षा द. निरुक्त ब. कल्प क. छन्द स. व्याकरण ख. ज्योतिष इनका संक्षिप्त विवेचन प्रस्तुत है- (अ) शिक्षा :- वैदिक साहित्य में वैदिक मन्त्रों के शुद्ध उच्चारण का विशेष महत्त्व है। इस कार्य में सहायता प्रदान करने वाला वेदाङ्ग 'शिक्षा' कहा जाता है। शिक्षा की परिधि में प्रातिशाख्य ग्रन्थ भी आते हैं जो संहिताओं एवं पद-पाठ से प्रत्यक्षतः सम्बन्धित हैं। इस प्रकार शिक्षा के अन्तर्गत उच्चारण विधियों का निर्देश प्राप्त होता है। (ब) कल्प :- वैदिक कर्मकाण्ड तथा यज्ञीय अनुष्ठानों के निमित्त प्रवर्तमान वेदाङ्ग कल्प कहलाता है। इनमें क्रमबद्ध सूत्रात्मक संक्षिप्त रूप में यज्ञ-याग के विधान का विवरण उपलब्ध होता है। कल्प का व्युत्पत्ति से प्राप्त अर्थ है- यज्ञीय प्रयोगों का समर्थन करने वाला शास्त्र। अपने अर्थ के अनुसार ही कल्प में वैदिक कर्मकाण्ड का विवेचन है। (स) व्याकरण :- पदस्वरूप एवं पदार्थ निश्चय के लिए उपयोग किए जाने वाला वेदाङ्ग व्याकरण है। वैदिक मन्त्रों के आलोचनात्मक अध्ययन के लिए व्याकरण अत्यन्त आवश्यक शास्त्र है। व्याकरण शास्त्र पदों की प्रकृति एवं प्रत्यय का निर्देश करके उनके अर्थों का निर्णय करता है। (द) निरुक्त :- निर्वचन शास्त्र की ही 'संज्ञा' निरुक्त है। निरुक्त की रचना यास्क ने की है। यह 'निघण्टु' की टीका है। निरुक्त का मुख्य कार्य है- पदों की निरुक्ति एवं व्युत्पत्ति का ज्ञान कराना। निरुक्त की भिन्नता का प्रभाव अर्थों की भिन्नता का कारण बनता है। अतः वेदों के पदों के अर्थ-निर्णयार्थ प्रयुक्त वेदाङ्ग निरुक्त हैं। (क) छन्द :- 'छन्द' पाँचवा वेदाङ्ग है। समस्त वेद छन्दोबद्ध हैं। अतः छन्दों की यथार्थ जानकारी के बिना मन्त्रों का शुद्ध उच्चारण एवं पाठ सम्भव नहीं है। इस प्रकार छन्दों का ज्ञान मन्त्रों के उच्चारणार्थ अत्यन्त आवश्यक है। इसी कारण 'छन्द' वेदाङ्ग के रूप में प्रतिष्ठित हैं। CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri द्वितीय अध्याय 51 (ख) ज्योतिष :- 'ज्योतिष' षष्ठ एवं अन्तिम वेदाङ्ग है। यज्ञों का अनुष्ठान किसी विशिष्ट ऋतु एवं नक्षत्र में होना चाहिए। इस प्रकार नक्षत्र, तिथि, मास एवं संवत्सर के ज्ञान से वैदिक कर्मकाण्ड का उचित काल में आयोजन होता है। इस कार्य के लिए निवर्तमान वेदाङ्ग ही ज्योतिष है। ज्योतिष का प्रतिनिधित्व 'वेदाङ्ग ज्योतिष' ग्रन्थ करता है। सूत्र साहित्य :- 'वेद' तो ईश्वरीय ज्ञान है। ऋषियों द्वारा साक्षात्कृत साहित्य है। इसके अतिरिक्त एक अन्य रचना है- कल्पसूत्र अथवा सूत्र साहित्य। यह वैदिक साहित्य से अत्यन्त निकटता से सम्बद्ध है, किन्तु इसकी गणना वैदिक साहित्य में नहीं की जाती है। यह वेदाङ्ग के रूप में माना जाता है। यह सूत्र-ग्रन्थ वेदों तथा ब्राह्मणों के प्रतिपाद्य विषय का साररूप है। यह गद्य में विरचित है। उपलब्ध सूत्रों का विवरण निम्नलिखित है- (अ) ऋग्वेदीय सूत्र- आश्वलायन सूत्र तथा शाङ्खायन सूत्र। (ब) शुक्ल यजुर्वेदीय सूत्र- कात्यायन श्रौत सूत्र, पारस्कर गृह्यसूत्र तथा कात्यायन शुल्ब सूत्र। (स) कृष्ण यजुर्वेदीय सूत्र- विभिन्न शाखाओं के भिन्न-भिन्न सूत्र प्राप्त होते हैं, जो निम्नांकित हैं- (अ) बौधायन तथा आपस्तम्ब शाखाएं- श्रौतसूत्र, गृह्य सूत्र, धर्म सूत्र तथा शुल्बसूत्र। (ब) काठक शाखा- काठक गृह्यसूत्र। (स) मैत्रायणी शाखा- मानव श्रौतसूत्र, मानव गृह्यसूत्र तथा वाराह- गृह्यसूत्र। (द) सामवेदीय सूत्र- लाट्यायन श्रौतसूत्र, द्राह्यायन श्रौतसूत्र, खादिर गृह्यसूत्र, जैमिनीय श्रौतसूत्र, जैमिनीय गृह्यसूत्र, गौतम धर्मसूत्र एवं आर्षेय कल्पसूत्र। (क) अथर्ववेदीय सूत्र- वैतान श्रौत्रसूत्र, कौशिक गृह्यसूत्र एवं वैखानस गृह्यसूत्र। अतः स्पष्ट है कि कल्प सूत्रों में श्रौतसूत्र, गृह्यसूत्र, धर्मसूत्र एवं शुल्बसूत्रों की भी गणना होती है; इनका किंचित परिचय निम्नलिखित है- (अ) श्रौतसूत्र- श्रौतसूत्र में श्रौतयागों का क्रमबद्ध विवरण किया गया है। अधिक दिनों तक निरन्तर अनेक पुरोहितों द्वारा सम्पादन किए जाने वाले CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

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52 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता श्रौताग्नि से सम्बन्धित यज्ञ श्रौत याग कहलाते हैं। कुछ प्रमुख श्रौतयाग निम्नलिखित हैं- दर्श, पौर्णमास, सोमयाग, वाजपेय, राजसूय, सोत्रामणी, अश्वमेधादि। इन्हीं श्रौतयज्ञों के विधानों एवं नियमों का संग्रह श्रौतसूत्रों में उपलब्ध होता है। (ब) गृह्यसूत्र- गृह्याग्नि साध्य यज्ञों, विवाहादि संस्कारों तथा शाला निर्माण एवं कृषि कर्मों के विधान का संग्रह ग्रन्थ गृह्यसूत्र के नाम से विख्यात है। इनमें षोडश संस्कार, पञ्चमहायज्ञ, सप्त पाकयज्ञ, गृह निर्माण, गृह प्रवेश, पशु-पालन, रोग विनाशक विधियों का विवेचन उपलब्ध होता है। (स) धर्मसूत्र- ये भारतवासियों के सर्वप्राचीन न्याय ग्रन्थ हैं। इनमें आध्यात्मिक एवं धार्मिक नियमों के सन्देश प्राप्त होते हैं। इनमें नीति, धर्म, रीति, प्रथाओं, चार वर्णों, चार आश्रमों आदि के कर्तव्यों एवं सामाजिक व्यवहारोपयोगी नियमों का वर्णन है। (द) शुल्ब सूत्र- इन सूत्र-ग्रन्थों का वैज्ञानिक महत्त्व है। क्योंकि इनमें आर्यों की पुरातन ज्यामितीय कल्पनाओं एवं गणनाओं का प्रतिपादन है। प्राचीन भारतीय ज्यामिति के विकास की जानकारी इन ग्रन्थों से पता चलती है। इनमें यज्ञ-वेदी से सम्बद्ध नाप तथा वेदी निर्माण के नियमों का विवेचन है। उपसंहार:- इस प्रकार उपर्युक्त समस्त रचनाएँ वैदिक हैं। सम्पूर्ण वैदिक साहित्य किसी एक काल की निश्चित अवधि की देन नहीं है। यह तो अतिदीर्घकाल में उपलब्ध गीति- संग्रहों, प्रार्थना-ग्रन्थों, आध्यात्मिक एवं पारमार्थिक निबन्धात्मक धार्मिक रचनाओं का समूह है। सम्पूर्ण वैदिक साहित्य की विभिन्न विधाओं एवं ग्रन्थों में स्वयं में पर्याप्त भिन्नता होते हुए भी वह एकता के प्रशंसनीय आदर्श का उत्कृष्ट उदाहरण है। आर्यजनों ने सदैव वेदों को "श्रुति" की संज्ञा से सम्बोधित किया है। इसका कारण है कि संहिताओं की रचना तथा अध्ययन नहीं किया गया है, अपितु उच्चारण एवं श्रवण किया गया है। भारतीय दर्शनशास्त्र के अनुसार ऋग्वेद से लेकर उपनिषद् तक आद्योपान्त वैदिक साहित्य ईश्वरीय सम्पत्ति है जिसे प्राचीन महर्षियों ने अपने ध्यान- नेत्रों से प्रत्यक्षीकृत किया है। भारतीय दर्शन की विभिन्न विचारधाराएं परस्पर सैद्धान्तिक रूप से भले ही कितनी भेदयुक्त हो, किन्तु वेदों को सभी समान आदर

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Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri द्वितीय अध्याय 53 प्रदान करती हैं। भारतीय दर्शन में किसी भी विचारधारा की आस्तिकता अथवा नास्तिकता का निर्धारण ईश्वर की सत्ता पर विश्वास करने अथवा न करने से नहीं होता, बल्कि वेदों की प्रामाणिकता को मानने अथवा न मानने से होता है। वेदों के “प्रामाण्य” को स्वीकार करने वाली विचार पद्धति “आस्तिक” तथा वेदों के “प्रामाण्य” को अस्वीकार करने वाली विचार पद्धति ‘नास्तिक’ कहलाती है। सर्वाधिक आश्चर्यजनक एवं महत्त्वपूर्ण विषय तो यह है कि बौद्ध जो कि नास्तिक हैं क्योंकि वे वेदों के प्रामाण्य को नहीं मानते, वे भी वेदों को परब्रह्म द्वारा प्रदत्त अथवा प्रणीत मानते हैं। जिस व्यक्ति, विषय अथवा ग्रन्थ को उसके विरोधी भी आलौकिक स्वीकार करें, इससे अधिक गौरव की बात, उसके लिए दूसरी क्या हो सकती है। वेदों के साथ ऐसा ही है। CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri ५ द्वितीय वेदों का महत्त्व वैदिक वाङ्मय विश्व का प्राचीनतम वाङ्मय है। यह वाङ्मय अत्यन्त प्राचीन होते हुए भी अपना अनुपम वैशिष्ट्य रखता है। यह समस्त सत्यज्ञान की अप्रतिमराशि एवं विश्व के ग्रन्थागार में सर्वप्राचीन ग्रन्थ है। वह भारतीय संस्कृति तथा सभ्यता का प्राण है। मानव सभ्यता के विकास के अति प्राचीन काल से ही वेद की शिक्षाएं मानव मात्र को असत् से सत् की ओर प्रेरित करती रही हैं। वैदिक-मन्दाकिनी की सुधाधारा में अवगाहन कर हृदय को परम शान्ति प्राप्त होती है। यह युगों में प्रवाहित होने वाली वह पवित्र अक्षुण्ण ज्ञान-धारा है जो कि अनेक संक्रमण-व्युत्क्रमणों को पार करती हुई आज भी अपने अनवद्यवपु के द्वारा बहती चली आ रही है। यह भारत ही नहीं अपितु समस्त विश्व के मानव हृदय का प्रतिनिधित्व करने वाली, परम शान्ति प्रदान करने वाली वह दिव्य ज्योति है जिससे आलोकित मानव को अपने कर्मपथ का ज्ञान होता है। भारत तथा भारतीयता से स्नेह रखने वाले सुधीजन जिसे सम्मान की दृष्टि से देखते हुए जिसके उपदेश पीयूष का पान कर उस दिव्य स्वर्गस्थ पीयूष की कामना नहीं करते, उस विश्व विश्रुत भगवती श्रुति की उपासना से ही भारतीय संस्कृति, धर्म, दर्शन आदि का तात्त्विक अनुशीलन किया जा सकता है। भारत की समस्त मौलिक ज्ञान-विज्ञान की निधि इसी में विद्यमान है। भारतीय संस्कृति, धर्म, दर्शन, सभ्यता, ललित साहित्य, विधिशास्त्र, अर्थशास्त्र, स्थापत्य, गणित, फलित, विज्ञान, इतिहास, कलाएँ आदि सबका आदिस्तोत्र वैदिक वाङ्मय ही है। भारत के मौलिक रूप के दर्शनार्थ वैदिक वाङ्मय का अध्ययन अनुशीलन अत्यावश्यक है। आर्य जाति की वेदों के प्रति अपूर्व आस्था है। पृथ्वी के किसी भी स्थान पर निवास करने वाला हिन्दू अपने धर्म और संस्कृति का मूलतत्त्व वेदों को ही मानता है। धार्मिक पर्वों तथा संस्कारों के समय पर हिन्दुओं के घरों में आज भी सादर वेदमन्त्रों का उच्चारण किया जाता है। वेद मन्त्रों के उच्चारण को सुनकर हिन्दू जाति आज भी गौरव का अनुभव करती है। यद्यपि भारत में अनेक मतमतान्तर प्रचलित हैं, परन्तु उन सभी ने अपने मत का आधार वेदों को ही माना है। इस प्रकार वेदों की महत्ता सर्वातिशायी सिद्ध होती है। महर्षि मनु लिखते हैं— “वेद एव द्विजातीयानां निःश्रेयस्करः परम्” CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri द्वितीय अध्याय 55 अर्थात् मानव मात्र के लिए वेद ही एकमात्र सुख का साधन है। इसका अध्ययन पाँच प्रकार से होता है। जैसा कि लिखा गया है— ‘वेदस्वीकरणं पूर्वं विचारोऽभ्यसनं जपः। तद्दानं चैव शिष्येभ्यो वेदाभ्यासोहि पञ्चधा॥’ अर्थात्- (१) वेद पढूँगा, यह निश्चय करना। (२) वेदार्थ का विचार। (३) वेदमन्त्रों का अभ्यास या पाठ। (४) शिष्य-प्रशिष्यों द्वारा वेद का अध्यापन। (५) वेदमन्त्रों का जप। इस प्रकार वेदाध्ययन करने वाले मानव द्विज कहलाए। वेदों को महर्षि मनु ने सर्वज्ञानमय तथा समस्त विधाओं का आधार एवं स्रोत माना है— ‘यः कश्चित् कस्यचिद् धर्मो मनुना परिकीर्तितः। स सर्वोऽभिहितो वेदे सर्वज्ञानमयो हिं सः॥’ मनु का मत है कि वेदों द्वारा ही तीनों काल के रहस्य को जाना जा सकता है- ‘भूतं भव्यं भविष्यच्च, सर्वं वेदात् प्रसिध्यति।’ चाणक्य तथा महर्षि दयानन्द ने राजा के मंत्री को वेदवित् होना चाहिए, यह स्वीकार किया है। अतएव वेदभक्त कहलाने वाले प्रत्येक व्यक्ति को स्वाध्याय करना आवश्यक है। यही तो इस स्वाध्यायोऽध्येतव्यः मीमांसक प्रोक्त घोषणा का आशय है। अपि च— “वेत्ति यो विविधान् वेदानधीते च यथाविधिः। स्वधर्मनिरतो विप्रो वैदिकः परिकीर्तितः॥” तथा— “ये साङ्गवेदान् विधिवद् विदन्ति, ते ब्राह्मणाः वैदिकनामधेयाः। वेदेन हीनाः यदि केऽपि सन्ति, ते शूद्रतुल्या भुवि सञ्चरन्ति॥” इस प्रकार वैदिक मतानुसार सृष्टिकाल के आदि में प्रकट हुए वेदों का आविर्भाव काल भी सृष्टिकाल के समान है। अतः मनु का कथन है— ‘युगान्तेऽन्तर्हितान् वेदान् सेतिहासान् महर्षयः। लेभिरे तपसा पूर्वम् अनुज्ञातः स्वयम्भुवा॥’ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 56 वैदिक वाङ्ग्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता अतः जब वेदों का इतना महत्त्व है तो तन्मूलक स्मृत्यादि का भी महत्त्व स्वयंसिद्ध है। अब हम भिन्न-भिन्न दृष्टियों से वेदों की महत्ता को प्रस्तुत कर रहे हैं— (अ) धार्मिक दृष्टि से महत्त्व :- वेदों का सर्वाधिक महत्त्व धार्मिक दृष्टि से है। वेद हिन्दू धर्म के मूल स्रोत हैं। वेदों का आधार लेकर ही समस्त हिन्दू धर्म से सम्बन्धित ग्रन्थों का प्रणयन हुआ है। 'मनुस्मृति' में लिखा भी है— 'वेदोऽखिलोधर्ममूलम्' अर्थात् वेद धर्म सभी धर्मों के मूल हैं। वे भारतीय ही नहीं, बल्कि संसार के सभी धर्मों के आदि स्रोत हैं— यः कश्चित् कस्यचिद्धर्मो मनुना परिकीर्तितः। स सर्वोऽभिहितो वेदे सर्वज्ञानमयो हि सः॥ (मनु० २.७) धर्म के तत्त्व को जानने के ईच्छुक सामान्य जनों के लिए वेद परम प्रमाण के रूप में मान्य हैं— "धर्म जिज्ञा समानानां प्रमाणं परमं श्रुतिः" (मनु २.१३) लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक जी ने कहा है कि हिन्दू धर्म का लक्षण "केवल वेदों को प्रमाण रूप में स्वीकार करना है"— 'प्रामाण्यबुद्धिर्वेदेषु'। डॉ० सम्पूर्णानन्द के अनुसार ईश्वर की सत्ता न स्वीकार करने वाला हिन्दू संभव है, किन्तु वेद की सत्ता को नकारने वाला 'हिन्दू' सम्बोधन का अधिकारी नहीं। इसी कारण महाभाष्यकार पतञ्जलि ने कामना न करते हुए छः अङ्गों सहित वेदों का अध्ययन ब्राह्मणों के लिए आवश्यक कहा है— "ब्राह्मणेननिष्कारणो धर्मः षडङ्गो वेदोऽध्येयोज्ञेयश्च" (महाभाष्य) वेदों में हिन्दुओं के देवी-देवताओं, उनके स्वरूप तथा गुणों, उनकी शक्तिसम्पन्नता, उनकी पूजा तथा सेवा का महत्त्व तथा उनसे उपलब्ध होने वाले लाभादि समस्त धार्मिक तत्त्वों के विषय में जानकारी प्राप्त होती है। मनु का कथन है कि वेदों के अतिरिक्त शास्त्रों का परिश्रमपूर्वक अध्ययन करने वाला ब्राह्मण जीवित शूद्र है— "योऽनधीत्य द्विजो वेदमन्यत्र कुरुते श्रमम्। स जीवन्नेव शूद्रत्वभाशु गच्छति सान्वयः॥" (मनु : २.१६८) और भी— "आर्षधर्मोपदेशं च वेदशास्त्रविरोधिना। यस्तर्केणानुसन्धत्ते स धर्म वेद नेतरः॥" (मनु. १२.१०६) हिन्दू धर्मरूपी महल की आधारशिला 'यज्ञ' है तथा यज्ञ के अनेक प्रकार तथा उनके विधान हेतु आवश्यक मन्त्रादि का विवेचन वेदों में उपलब्ध होता है। 'शतपथ ब्राह्मण' के अनुसार तो धनादि से परिपूर्ण पृथ्वीदान के कर्म से होने वाली फलप्राप्ति CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

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द्वितीय अध्याय 57 वेदों के अध्ययनशास्त्र से ही हो जाती है। वेदों के अध्ययन से अक्षय्य लोक की उपलब्ध होती है— "यावन्तं हैवे इमां पृथिवी वित्तेन पूर्णांददतु लोकं जयति, त्रिमिस्तावन्तं जयतिः भूयांस च अक्षय्य च एवं विद्वान् अहरहः स्वाध्यायमधीते, तस्मात् स्वाध्यायोऽध्ये तव्यः'' (शत. ११.५.६१)। आर्यधर्म में यज्ञ की प्रधानता है। वेद इस विश्व के मूल में यज्ञ की भावना को स्वीकार करता है। ऋग्वेद के दशम मण्डलानुसार यज्ञमहिमा अपूर्व है— "यज्ञ द्वारा ही सब कुछ वर्णित है। " गीतानुसार भी यह सृष्टि, यह रचना, यह प्रजा, यज्ञ के साथ ही उत्पन्न हुई है। प्रजापति विश्वरूपी यज्ञ का याजक, होता, अध्वर्यु तथा पुरोहित है। अथर्व संहितानुसार भी सृष्टि का उद्गम-स्थल यज्ञ है। शतपथ ब्राह्मण में भी यज्ञ को उत्तम-कर्म स्वीकार करके प्रजापति तथा विष्णु का रूप कहा गया है। शरीर भी यज्ञ रूप है, जिसमें चक्षु, श्रोत्र, मुख, वाणी, मन आदि भाग ले रहे हैं। मन—यजमान, चक्षु—होता, प्राण—उद्गाता, श्रवण—अध्वर्यु तथा वाणी—ब्रह्मा का रूप है। वेद के अनुसार— "इमं यज्ञं विततं विश्वकर्मणा।" तथा "स्विष्टिनस्ता कृणवद् विश्वकर्मा।" विश्वकर्मा ने ही इस यज्ञ का विस्तार किया। वही हमारी दुरिष्टियों को स्विष्टियों में परिणत कर सकता है। यज्ञ की भावना सहयोग, सौहार्द तथा संस्कृति की जननी है। यज्ञ के द्वारा हम अहिंसा, दान और ज्ञान का प्रसार करते हैं। समाज का सम्पूर्ण कंकाल इसी प्रसार पर अवलम्बित है। यज्ञ के द्वारा ही हम उस परम यज्ञ स्वरूप प्रभु के पास पहुँचते हैं, जिसने सृष्टि को यज्ञ के साथ ही उत्पन्न किया था। उसी ने हम सबको आदेश दिया था कि हम इसी यज्ञ प्रणाली द्वारा अभ्युदय में संलग्न हों। यही यज्ञ हमारे लिए कामधेनु है। गीतानुसार यज्ञ द्वारा ही हम दिव्य-शक्तियों को भावित तथा प्रसन्न करते हैं, इसीलिए देव भी हमें प्रसन्न करते हैं। इस प्रकार परस्पर भावित होते हुए हम सब कल्याण को प्राप्त करते हैं। अतः यज्ञ श्रेष्ठ कर्तव्य माना जाता है। याज्ञिक विधान के अतिरिक्त वेदों में नैतिक मूल्यों का भी अत्यधिक महत्त्व है। धर्म का मेरुदण्ड नैतिकता, सद्गुण तथा सदाचरण आदि हैं। इन सबका वेदों में विपुल वर्णन उपलब्ध होता है। अतः नैतिक दृष्टि से भी वेदों का अत्यन्त महत्त्व है। (ब) सांस्कृतिक दृष्टि से महत्त्व :- सांस्कृतिक तथा सामाजिक दृष्टि से भी वेदों का महत्त्व अपार है। अनेक सामाजिक संस्थाओं के निर्माण तथा नामकरण का श्रेय वेदों को प्राप्त है। मनुस्मृति के अनुसार—

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Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 58 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता “सर्वेषां तु स नामानि, कर्माणि च पृथक्-पृथक्। वेदशब्देभ्य एवादौ, पृथक् संस्थाश्च निर्ममे॥” वैदिक संस्कृति के विषय में डॉ० आर० के० मुखर्जी का कथन है कि The Ṛgvedic civilization was based on plain living and high thinking यह जानकारी वेदों से ही प्राप्त हुई है। सामाजिक जीवन, वर्ण व्यवस्था, व्यक्ति का संस्कार, परिवार अथवा कुटुम्ब का निर्माण, विवाह संस्था, आश्रम व्यवस्था, स्त्रियों की स्थिति, दासप्रथा, शिक्षा, नियमित यौनसम्बन्ध, सामाजिक आचार तथा व्यवहार, स्वजनों के प्रति कर्तव्य-भावना, सामयिक दायित्वबोध, निवास, भोजन, पेय, वस्त्र, नागरिकता की दृढ़ आधारभूमि तथा अन्य सांस्कृतिक एवं सभ्यता विषयक तत्त्वों के उद्गम तथा विकास की जानकारी के लिए वेद श्रेष्ठ ग्रन्थ हैं। इस विषय में पं० बलदेव उपाध्याय का कथन उचित ही है- “यदि हम जानना चाहते कि हमारे पूर्वज किस प्रकार अपना जीवन बिताते थे, कौन क्रीड़ाएँ उनके मनोरंजन की साधिका थीं, किस प्रकार उनका विवाहसम्बन्ध, देहसम्बन्ध का ही प्रतीक न होकर आध्यात्मिकसंयोग का प्रतिनिधि माना जाता था, किन देवताओं की वे उपासना किया करते थे, किस प्रकार वे प्रातः काल प्राची के मुखमण्डल को उजागर करने वाली पुराणी युवति उषा की सुनहली छटा में अग्नि में आहुति प्रदान किया करते थे, किस तरह आवश्यकतानुसार वे इन्द्र, वरुण, पूषा, सविता तथा पर्जन्य की स्तुति अपने ऐहिक कल्याण तथा आमुष्मिक मंगल की साधना के लिए किया करते थे, तो हमारे पास एक ही साधन है, वेदों का गाढ़ अनुशीलन-श्रुतियों का गहरा अध्ययन।” अपनी बात को सबल तर्कों के साथ सिद्ध करते हुए उपाध्याय जी आगे कहते हैं कि- “ये आर्यों के ही नहीं, प्रत्युत मानव जाति के सबसे प्राचीन ग्रन्थ हैं। मानव जाति के प्राचीन इतिहास, रहन-सहन, आचार-व्यवहार की जानकारी के लिए भी उतने ही उपादेय तथा आदरणीय हैं। वेद मानव जाति के विचारों को लिपिबद्ध करने वाले गौरवमय ग्रन्थों में सबसे प्राचीन माने जाते हैं। अतः अतीव अतीत काल में मानवों के व्यवहार तथा विचार का पता इन अमूल्य ग्रन्थों की पर्यालोचना से भली भाँति लग सकता है।” वेदों का सांस्कृतिक-महत्त्व इसलिए भी अधिक है, क्योंकि वैदिक संस्कृति सदाचार को जितना महत्त्व प्रदान करती है, उतना अन्य उपादानों को नहीं। व्यक्ति चाहे अद्वैतवादी हो चाहे द्वैतवादी, यदि व्यक्ति सदाचारी नहीं है, तो उसका अद्वैतवादी या द्वैतवादी होना निरर्थक है, वह तो बालू में से तेल निकालने के समान है। यदि व्यक्ति सदाचारी है, तो ईश्वर में अविश्वास या विश्वास का प्रश्न उठेगा ही नहीं। वेद के CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri द्वितीय अध्याय 59 शब्दों में ‘‘ऋतस्य पन्थां न तरन्ति दुष्कृतः’’ दुराचारी ऋत (सत्य) के पन्थ को पार कर ही नहीं सकता। सदाचारी व्यक्ति ही ‘ऋतपथ’ का अनुगामी है और जो ऋतपथ पर चल रहा है वह एक दिन उसे पार कर ही जायेगा तथा प्रभु का सामीप्य ग्रहण कर ही लेगा। वैदिक संस्कृति में ऋत या सदाचार का नियम महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि संस्कृति रूपी जीवन की नींव वेद हैं। (स) ज्योतिष ज्ञान की दृष्टि से महत्त्व :- वेद की प्रवृत्ति यज्ञ के सम्पादन के लिए है। यज्ञ का विधान विशिष्ट समयों की अपेक्षा रखता है। यज्ञ याग के लिए समय शुद्धि की बड़ी आवश्यकता रहती है। इसीलिए वैदिक आर्यों का ज्योतिष ज्ञान बहुत बढ़ा-चढ़ा था। नक्षत्र, तिथि, पक्ष, मास, ऋतु तथा सम्वत्सर—काल के समस्त खण्डों के साथ यज्ञ याग का विधान वेदों में पाया जाता है। जो व्यक्ति ज्योतिष को भली प्रकार से जानता है, वहीँ यज्ञ का वास्तविक ज्ञाता है। ज्योतिष शास्त्र के मुख्यतः दो भेद हैं— (१) गणित ज्योतिष (२) फलित ज्योतिष। गणित ज्योतिष- ऋग्वेद तथा यजुर्वेद दोनों में समान रूप से गणित ज्योतिष का विवेचन उपलब्ध होता है। गणित के योग-वियोग का आधार यजुर्वेदान्तर्गत निम्नलिखित मन्त्र में दृष्टव्य है— ‘एक॑या च दश॒भि॑श्च स्वभूते॒ द्वाभ्या॑मि॒ष्टये॑ विंश॒ती च॑। ति॒सृभि॑श्च॒ वह॑से त्रिं॒शता॑ च नि॒युद्भि॑र्वायवि॒ह ता विमु॑ञ्च॥’ (यजु० २७/३३) उपर्युक्त मन्त्र में ‘विमुञ्च’ शब्द द्वारा वियोग प्रक्रिया स्पष्ट होती है। गुणन- प्रक्रिया के लिए निम्नलिखित मन्त्र प्रस्तुत किया जा सकता है— ‘‘युवां देवात्रयः एकादशासः सत्यस्यददृशेपुरस्त्राता’’ (ऋ० १०.५७.२) अर्थात् (देवां) दिव्य गुणों को वहन करने वाले ११×३ = ३३ (सत्याः) सद्गुणों से सम्पन्न है। यजुर्वेद के एकमन्त्र चतस्त्रश्चमे से वर्ग प्रक्रिया पूर्णतः स्पष्ट हो जाती है जैसे— २×२ = ४ होता है। वेदों में इकाई, दहाई, सैकड़ा आदि के प्रयोग से योग-वियोगादि का दर्शन उपलब्ध होता है। हमारे वेदज्ञों की संख्या-गणित की अनेक प्रक्रियाएँ पाश्चात्य विद्वानों द्वारा ग्रहण कर ली गई। ऋक् संहिता (८/५६/२२) में हजार की संख्या का अंकन है। बीज-गणित तथा रेखा-गणित के नियमों तथा उपयोग की जानकारी वेदों से प्राप्त होती है। यज्ञीयस्तम्भादि के निर्माण में रेखा गणित का विशेष महत्त्व है। जैसे— रेखा गणित- इयं वेदिः परोअन्तः पृथिव्या अयं यज्ञो भुवनस्य नाभिः। CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

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60 वैदिक वाङ्गमय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता उपर्युक्त मन्त्र से वृत्त के व्यास तथा परिधि की परिभाषा का भी परिज्ञान होता है। यथा- यज्ञवेदी के पृथ्वी का चारों ओर का घेरा परिधि कहलाता है। व्यास- यज्ञवेदी को ऊपर से अन्त तक संयुक्त करने वाली रेखा "व्यास" कहलाती है। फलित ज्योतिष के परिज्ञान की दृष्टि से भी वेद अत्यन्त महत्त्वशाली हैं क्योंकि वेदों में फलित-ज्योतिष सम्बन्धी विवेचन भी पर्याप्त मात्रा में किया गया है। यजुर्वेद के मन्त्र "आकृष्णेन रजसा वर्तमानो निवेशयन्न" से सूर्य के क्रान्तिवृत्त में गतिशील होने का पता चलता है। क्रान्तिवृत्त सूर्य का मार्ग है। इसके १२ भाग कर लिए गए हैं। यही बारह भाग ही बारह राशियाँ हैं। इसके अतिरिक्त वेदों में अन्य ग्रहों का भी विवेचन है। जैसे- 'शुक्राङ्गारक बुध बृहस्पति शनैश्चर राहु केतु सोम सहित आदित्यः पुरोगाः ग्रहाः प्रीयन्ताम्।' सूर्य चन्द्र के सदृश ही बृहस्पति तथा शुक्र को भी महत्त्वपूर्ण देव माना गया है। यजुर्वेद में राहु की स्तुति उपलब्ध होती है। इसी प्रकार नक्षत्रों तथा मुहूर्त आदि की भी पर्याप्त चर्चा वेदों में की गई है। आर्द्रा से द्वादश नक्षत्र वृष्टि के कारण होते हैं- द्वादश धून्यदगोह्यास्याऽऽतिथ्येरणन्भवः ससन्तः। (ऋ० ४.३३.७)। वेदों में शुभ नक्षत्रों के विधान का भी विवेचन है। वेद में सूर्याकर्षण के बल पर क्षितिज में नक्षत्र का वर्णन उपलब्ध होता है- "तिस्रोद्यावः सवितुर्द्वा उपस्थांएका यमस्यभुवने विराषाट्। अणिं न रथ्यममृताधि तस्थुरिह ब्रवीतुयतच्चिकेतत्। (ऋ० १.३५.६)'' वेदों में बीज रूप में विद्यमान ज्योतिष के तीनों स्कन्धों, सिद्धान्त, गणित तथा फलित का विकास बाद के युग में हुआ। (द) दार्शनिक दृष्टि से महत्त्व :- वेदों की दार्शनिक दृष्टि से भी महत्ता अत्यन्त व्यापक है। वेद ही समस्त भारतीय दर्शन का मूल स्रोत है। भारतीय दर्शन की विभिन्न विचारधाराओं का उद्गम स्थल वेद है। प्रत्येक विचारधारा के प्रमुख सिद्धान्तों का बीज वेदों में विद्यमान है। सभी भारतीय आस्तिक दर्शन तो अपना मूल वेद को स्वीकार करते ही हैं, साथ ही साथ नास्तिक दर्शन भी वैदिक विचारधारा को आधार रूप में ग्रहण करके अपने सिद्धान्तों की विवेचना करते हैं। वैशेषिक दर्शन के अनुसार- 'तद्वचनादाम्नायस्य प्रामाण्यम्' (वै०सू० १.१.३)। आचार्य वाचस्पति मिश्र का कथन है कि महाप्रलय में नित्य सर्वज्ञ परमेश्वर वेद का प्रणयन कर सृष्टि के आदि में स्वयं ही सम्प्रदायों का प्रवर्तन करते हैं- "महाप्रलये तु ईश्वरेण वेदान् प्रणीय सृष्ट्यादौ स्वयमेव सम्प्रदायः प्रवर्त्यत एवेतिभावः" (न्यायवार्तिकतात्पर्य टीका)। बौद्ध दर्शन के आविर्भाव के पूर्व ही वैदिक साहित्य का प्रणयन हो चुका था, अतः इस दर्शन के निरूपण में भी वेदों का महत्त्वपूर्ण योगदान है। इस विषय पर पं०

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द्वितीय अध्याय 61

बलदेव उपाध्याय जी का विचार है कि- "श्रुतियों की सहायता से ही भारतीय दर्शनों के विविध विकास को हम भली-भाँति समझ सकते हैं। उपनिषदों में समग्र आस्तिक तथा नास्तिक दर्शन के तत्त्वों की बीजरूपेण उपलब्धि होती है। यदि 'नेह नानास्ति किञ्चन,' अद्वैत तत्त्व का बीजरूप से ही सूचक है, तो श्वेताश्वतर में वर्णित 'लोहितकृष्णाशुक्लां अजां' सांख्याभिमत सत्त्वरजतमोमयीत्रिगुणात्मिका-प्रकृति के प्रतीक हैं। यदि हम रामानुज मत के विशिष्टाद्वैत, निम्बार्क के द्वैताद्वैत, मध्वाचार्य के द्वैत, वल्लभ के शुद्धाद्वैत, चैतन्य के अचिन्त्य भेदाभेद के रहस्योद्घाटन के अभिलाषी हैं, तो उपनिषदों का गम्भीर अध्ययन, मनन तथा पर्यालोचन अनन्य साधन है।" वस्तुतः उपनिषदों में भी वैदिक तत्त्वों का ही वर्णन तथा व्याख्या है। इस प्रकार दार्शनिक दृष्टि से भी वेद महिमामय हैं। (क) साहित्यिक दृष्टि से महत्त्व :- साहित्यिक-सौन्दर्य की दृष्टि से वेदों का अध्ययन अपरिहार्य है। औपम्यगर्भ-अलंकारों के अकृत्रिम रूप, सहज-नाद तथा साम-सौन्दर्य, छन्दों के लयात्मक तथा गत्यात्मक निखार का अनुशीलन वेदों के माध्यम से ही हो सकता है। डॉ० वी० राघवन ने अपने ग्रन्थ 'इण्डियन हेरीटेज' में वैदिक काव्यगत विशेषताओं का मार्मिक विवेचन किया है— The literary merits of vedic poetry are quite conspicuous. In handling metre or language, in the expression of striking fancies or telling similies, in graphic descriptions of natural phenomena as in hymns to dawn and night or in the embodiment of abstractions and speculative conceptions as in the cosmogonic hymns and even in the introduction of verbal assonances, the Vedic Ṛṣi shows him definitely a poet and an able one at that : वेद के मन्त्रद्रष्टा ऋषियों को कवि की संज्ञा से सम्बोधित किया गया है। इन कवियों ने ब्रह्म की प्राप्ति के लिए ऋचाओं का प्रणयन किया। इस प्रकार कवि की भावमयी वाणी ने बल व तेज का संचार किया जिससे दक्षता तथा कर्मण्यता की प्रेरणा मिलती है। मनुष्य उसे श्रवण कर संकीर्णता का पर्दा फाड़ कर विशालता तथा उदारता में रमण करने लगते हैं। यथा— "सोमं गावो धेनवो वावशानाः सोमं विप्रा मतिभिः पृच्छमानाः। सोमः सुतः ऋच्यते पवमानः सोमे अकी: त्रिष्टुभः सं नवन्ते॥" अर्थात्— "दुधारू गायें रम्हाती हुई जैसे बछड़े की ओर जाती है, वैसे ही विप्र, व्यापक ज्ञान वाले ब्राह्मण अपनी मतियों द्वारा पूँछते हुए, खोज करते हुए, सौम्य कवि

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62 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता

के पास जाते हैं। उस समय प्रकट हुआ वेगवान, पवित्र भावों से वर्धमान कवि पूजा जाता है, स्तुति-भाजन बनता है।'' इस प्रकार त्रिष्टुप् छन्द में बँधे हुए जितने भी स्तुति गान हैं, वे सब काव्यात्मक सौन्दर्य से मण्डित हैं। वेदों के अनेक मन्त्रों में रसों का सुन्दर परिपाक हुआ है। प्रतिपक्षियों से संघर्ष में वीर-रस का तथा पुरुरवा-उर्वशी संवाद तथा यमयमी संवादों में शृङ्गार रस का आभास मिलता है। इन्द्र की स्तुति में वीररस का विशद संकेत किया गया है- य॒स्मान्न॒ ऋ॒ते वि॒जय॑न्ते॒ जना॑सो॒ यं युध्य॑माना॒ अव॑से॒ हव॑न्ते। यो विश्व॑स्य प्रति॒मानं॑ ब॒भूव॒ यो अ॑च्युत॒च्युत्स जना॑स॒ इन्द्रः॑॥ (ऋ० २/१२/९) “इन्द्र के बिना मनुष्य विजय प्राप्त नहीं कर सकता। योद्धा लोग अपनी रक्षा के निमित्त उसे पुकारते हैं। वह इस विश्व से श्रेष्ठ है। वह च्युत न होने वाले लोगों को च्युत कर देता है, क्योंकि वह शौर्य तथा वीर्य का प्रतीक है।'' पुरुरवा के प्रेम-प्रसंग में विरह से दुःखी पुरुरवा के कथन में विप्रलम्भ शृङ्गार का उत्कृष्ट निदर्शन है- इषु॒र्न श्रिय॑ इषु॒धेरस॑ना॒ गोषाः॑ श॒तसा॒ न रंहिः॑। अ॒वीरे॒ क्रतौ॒ वि द॑विद्युत॒न्नोरा॒ न मा॒युं चि॑तयन्त॒ धुन॑यः॥३॥ (ऋ० १०/९५/३) “हे उर्वशी, मेरा बाण तरकस में फेंके जाने में असमर्थ होकर लक्ष्मी को नहीं प्राप्त कर पाता। अतः वेग से युक्त होकर मैं शत्रुओं की गायों को भोक्ता नहीं हो पाता। यज्ञकर्म में या शक्तिमान कार्य में मैं प्रकाशशील नहीं होता। मेरे योद्धा, विस्तार वाले युद्ध में मेरे सिंहनाद का श्रवण नहीं कर पाते।'' अलङ्कार - वैदिक कार्य में अलंकारों का भी यथोचित प्रयोग उपलब्ध होता है। अलंकारों का कहीं भी खींच-तान कर प्रयोग नहीं हुआ है वे सर्वत्र स्वाभाविक रूप से उपस्थित हुए हैं। वैदिक कवियों का प्रिय अलंकार उपमा है- अभ्रा॑तेव॒ पुंस॒ एति॑ प्र॒तीची॒ गर्ता॒रुगिव॒ सन॑ये॒ धना॑नाम्। जा॒येव॒ पत्य॑ उश॒ती सु॒वासा॑ उ॒षा ह॒स्रेव॒ नि रि॑णीते॒ अप्सः॑॥ (ऋ० १/१२४/७) 'उषा कभी भ्रातृरहित बहन के सदृश अपने दायभाग को ग्रहण करने के लिए

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Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri द्वितीय अध्याय 63 पितृस्थानीय सूर्य के समीप जाती है, तो कभी वह रमणीक वस्त्र धारण करके पति को अपने प्रेम पाश में आबद्ध करने के लिए मचलने वाली सुन्दरी के समान पति के सम्मुख स्वसौन्दर्य को प्रकट करती है।' छन्द :- वैदिक ऋषियों की वाणी छन्दों के रूप में प्रकट हुई। इसीलिए वैदिक ऋषियों की दृष्टि में छन्दों का अत्यधिक महत्त्व था। ऋग्वेद में (१०-११४/५) 'छन्दांसि' शब्द आया है। यजुर्वेद ४-२४, ८-४७, १२-५, १३-५३ आदि कई स्थलों पर छन्द शब्द ही नहीं, छन्दों के नामों तक का उल्लेख हुआ है। गायत्री छन्द, त्रिष्टुप छन्द, जगती छन्द, अनुष्टुप छन्द आदि प्रसिद्ध छन्दों के अतिरिक्त यजुर्वेद १४-९, १०- १८ में मा, प्रमा, पंक्ति, उष्णिफ्, बृहती, विराट् तथा १५-४-५ में वरिवः, शंभु, परिभू, ककुप, काव्य, अक्षर-पंक्ति, पद-पंक्ति, विष्टार-पंक्ति आदि अनेक छंदों के नाम आते हैं। इस प्रकार वैदिक ग्रन्थों का साहित्यिक महत्त्व स्पष्ट हो जाता है। वैदिक छन्द भारतीय काव्यउपवन के आदि प्रसून हैं। किन्तु, इसके साथ यह भी ध्यातव्य है कि लौकिक साहित्य से वैदिक साहित्य की चारुता नितान्त भिन्न प्रकार की है। (ख) भाषा विज्ञान की दृष्टि से महत्त्व :- भाषा के वैज्ञानिक अध्ययन के लिए भी वेद अत्यन्त महत्त्वपूर्णशाली है। वैदिक साहित्य में भाषा के उद्भव तथा विकास को जानने के लिए विपुल सामग्री विद्यमान है। आधुनिक भाषा विज्ञान का उद्भव ही तब हुआ, जब विदेशी विद्वानों ने वेदों के विषय में जानकारी प्राप्त की। विश्ववाङ्मय में शायद शतपथ ब्राह्मण ही स्वराङ्कित गद्य का उदाहरण प्रस्तुत करता है। भाषा के साथ बलाघात के साहचर्य की आवश्यकता के अध्ययन हेतु इससे श्रेष्ठ क्षेत्र मिलना सम्भव नहीं। मानवीय सभ्यता तथा संस्कृति के विकास में भाषा विशेष महत्त्वपूर्ण रही है। सभ्यता के साथ ही भाषा के विकास के लिए वैदिक वाङ्मय का अध्ययन अत्यावश्यक है। श्री T. Burrow ने अपने ग्रन्थ The Sanskrit Language में लिखा है- 'The discovery of the Sanskrit Language by European Scholars at the end of the eighteenth century was the starting point from which developed the study of the comparative philology of the Indo-European languages and eventually the whole science of modern linguistics.' आधुनिक भाषा तत्त्व का समस्त विज्ञान संस्कृत भाषा के ऊपर अवलम्बित है। अठारहवीं शताब्दी के अन्त में पश्चिमी विद्वानों के द्वारा संस्कृत भाषा का अन्वेषण ही ऐसा बिन्दु था जहाँ से भारोपीय भाषाओं के तुलनात्मक भाषा विज्ञान के अध्ययन का श्रीगणेश हुआ था तथा पुनः इसी से समस्त आधुनिक भाषा विज्ञान का जन्म हुआ।' CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

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64 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता

संस्कृत के पूर्व यूरोपीय भाषाशास्त्रियों में आदिम भाषा के सम्बन्ध में मतवैभिन्न्य था। कोई ग्रीक को, कोई लैटिन को, कोई हिब्रू को विश्व की प्राचीनतम भाषा स्वीकार करता था। संस्कृत के ज्ञान होने के साथ ही इस विवाद का समापन हो गया। सभी आर्य-भाषा को विश्व की प्राचीनतम भाषा मानने लगे। पं० बलदेव उपाध्याय जी ने संस्कृत शब्दों के अर्थ परिवर्तन के कारण स्वरूप के विषय में विशेष सामग्री प्रस्तुत की है। उनका कथन है— "वैदिक भाषा की लौकिक भाषा के साथ तुलना करने पर अनेक मनोरंजक बातें दृष्टिपथ में आती हैं। भाषाशास्त्र का यह एक सामान्य नियम है कि भौतिक अर्थ में व्यहृत होने वाले शब्द कालान्तर में आध्यात्मिक अर्थ में प्रयुक्त होने लगते हैं। पार्थिव जगत् से हटकर वे सुदूर मानसिक जगत् की वस्तुओं की सूचना देते हैं। वेद इस विषय में बहुत से रोचक उदाहरण उपस्थित करता है। इन्द्र की स्तुति के प्रसङ्ग में गृत्समदऋषि की अन्तःदृष्टि पुकार कर कह रही है— "यः पर्वतान् प्रकुपितां अरम्णात्" अर्थात् इन्द्र ने चलायमान पर्वतों को स्थिर किया। यहाँ कुप् तथा रम् धातु के प्राचीन अर्थ का ऊहापोह भाषादृष्टि से नितान्त उपदेशप्रद है। कुप् धातु का मौलिक अर्थ है भौतिक संचलन और रम् धातु का अर्थ है स्थिरीकरण, चञ्चल पदार्थ को निश्चल बनाना। कालान्तर में इन धातुओं ने अपनी दीर्घ जीवन यात्रा में पलटा खाया। सबसे अधिक मानसिक विकार उस दशा में उत्पन्न होते हैं जब हम क्रोध के वशीभूत होते हैं। हम उस दशा में अपने मन के भीतर विचित्र प्रकार की प्रखर चञ्चलता का अनुभव पद्- पद पर करते हैं। अतः अर्थ की समता के बल पर "कोप" शब्द भौतिक जगत् से ऊपर उठकर मानस स्तर तक अनायास पहुँच जाता है। आधुनिक संस्कृत में यदि यह कहें "कुपितोमकरध्वजः" तो वाक्यपदीय के मन्तव्यानुसार कोप रूपी 'लिङ्ग' की सत्ता के कारण मकरध्वज से अभिप्राय "काम" से समझा जाता है और 'समुद्र' का अर्थ लक्षणया ही बोधित किया जा सकता है। 'रम्' का अर्थ है भौतिक स्थिरीकरण, परन्तु धीरे-धीरे इस शब्द ने भौतिक भाव को छोड़कर मानस भाव से अपना सम्बन्ध स्थापित कर लिया है। खेल तमाशों में चंचल चित्त स्थिर हो जाता है, क्योंकि उसे इन वस्तुओं में एक विचित्र प्रकार के आनन्द का संचार होता है। यही कारण है कि आजकल 'रम्' का प्रयोग क्रीड़ा अर्थ में किया जाता है। प्रचलित भाषा के प्रयोगों में कभी-कभी प्राचीन अर्थ की भी झलक आ जाती है। "क्रीडायां रमते चित्तम्" (क्रीडा में चित्त रमता है।) यहाँ रमते का लक्ष्य स्थिरीकरण के लिए स्पष्ट प्रतीत होता है।" अतः संस्कृत शब्दों के अर्थ-परिवर्तन के ज्ञानार्थ वैदिक साहित्य एवं भाषा का चिन्तन तथा मनन परमावश्यक है। वैदिक साहित्य तथा वैदिक भाषा के

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Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri द्वितीय अध्याय 65 विश्लेषण के बिना भाषा-विज्ञान सम्बन्धी जानकारी अधूरी रह जाती है। (ग) अर्थशास्त्रीय ज्ञान की दृष्टि से महत्त्व :- अर्थशास्त्र के नियमों तथा सिद्धान्तों के निर्धारण में वेदों से अत्यधिक सहायता प्राप्त हो सकती है। वैदिक वाङ्मय में समाज में अर्थव्यवस्था के सम्बन्ध में समाजवाद, साम्यवाद अथवा पूँजीवाद के स्थान पर धर्मानुगत दृष्टि का प्राधान्य दृष्टिगोचर होता है। वेदों में धन की परिभाषा, गतियाँ, विभाजन तथा विकेन्द्रीकरण के विषय में महत्त्वपूर्ण जानकारी उपलब्ध होती है। वेद में धन के लिए श्री तथा लक्ष्मी के अतिरिक्त वसु, अन्न, राधः, रयि आदि शब्दों का प्रयोग हुआ है। धन की तीन गतियाँ बतलाई गई हैं- दान, भोग तथा विनाश। यजुर्वेद के ४०वें अध्याय के प्रथम मन्त्र में कहा गया है कि "तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा" अर्थात् त्यागमय भोग करो। धन का एक ही स्थल पर एकत्रीकरण वेदों में अनुचित तथा असङ्गत बतलाया गया है। व्यापारी-वर्ग मनुष्य को क्षुधातुर तथा तृषातुर न कर सके, इस विषय पर वैदिक विद्वान् सदैव सचेष्ट दिखलाई देते हैं। अनेक स्थलों पर तथा मन्त्रों में शोषण तथा शोषकों के दमन के उपाय बतलाए गए हैं। वेदानुसार अधिक धन नाश का कारण होता है। किसी समय धन की मात्रा इतनी अधिक हो जाती है कि वह मनुष्य के उपभोग में नहीं आ पाती। अनुपयोग की दशा में धन मानव के पतन का कारण हो जाता है। वेद के अनुसार :- या मां ल॒क्ष्मीः प॑तया॒लूरजु॑ष्टाभि॒चस्क॒न्द वन्द॑नेव वृ॒क्षम्। अ॒न्यत्रा॒स्मत् स॑वितु॒स्तामि॒तो धा॒ हिर॑ण्यहस्तो॒ वसु॑ नो॒ ररा॑णः॥ (अथर्व० ७/११५/२) "प्रभु हिरण्यहस्त हैं। ऐश्वर्य, स्वर्ण, हितकर तथा रमणीय स्वरूप उनके करों में दीप्ति हो रहा है। वे ही इसका वितरण तथा विभाजन प्राणि वर्ग में कर रहे हैं। किन्तु जो धन जीवधारियों के पास असेवित है, उपयोग से परे है तथा अंततः पतन की ओर प्रवृत्त करने वाला है, उसे मनुष्य को स्वयं अभीप्सित व्यक्ति तथा स्थान के पास पहुँचा देना चाहिए। यह कदापि नहीं होना चाहिए कि एक व्यक्ति क्षुधाग्रस्त होकर प्राण गवाँ दे तथा दूसरी जगह अतिरिक्त धन व्यक्ति के विनाश का कारण बन जाये।" वेदों में पणि नामक अर्थ पिशाच व्यापारी का वर्णन आया है, जो गो इत्यादि चल आवश्यक वस्तुओं को छिपा देता था तथा उस अभाव की स्थिति से अधिक लाभ उठाता था; इन्द्र देव ने उसके भण्डार गृहों पर आक्रमण करके आवश्यक वस्तुएँ जनसाधारण को उपलब्ध कराईं। CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

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66 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता (घ) राजनैतिक दृष्टि से महत्त्व :- राजनैतिक दृष्टि से भी वेदों का महत्त्व न्यून नहीं है। इस दृष्टिकोण से भी वेद प्रचुर उपयोगिता से युक्त है। वेदों में युद्ध, राज्य- व्यवस्था, सैनिक एवं सेनापति के गुण, सेना की स्थिति तथा व्यूह रचना, विश्वासघाती से बचने के उपाय, विभिन्न शासन-प्रणालियों, संस्थाओं तथा सिद्धान्तों का वर्णन उपलब्ध होता है। ऋग्वेद में सभा तथा समिति नामक दो विशिष्ट संस्थाओं का उल्लेख है, जो प्रजातन्त्र की सफलता के लिए आवश्यक है। अथर्ववेद में सामान्य जनता द्वारा राजा के चुनाव की बात कही गई है— त्वां विशो॑ वृणतां राज्या॒य त्वामि॒माः प्र॒दिशः॒ पञ्च॑ दे॒वीः। वर्ष्म॑न् राष्ट्रस्य॑ क॒कुदि॑ श्रयस्व॒ ततो॑ न॒ उग्रो वि भ॑जा॒ वसू॑नि॥ (अथर्व० ३/४/२) “प्रजा राजा का वरण करती है, उसका चुनाव करती है। पंच जन, पाँच प्रकार की जनता, ज्ञानी, बली, श्रमी तथा असभ्य वर्ग द्वारा निर्वाचित सम्राट राष्ट्र के सिंहासन पर सुशोभित होता है। वह उग्रता, तेजस्विता तथा वीरता से सम्पन्न होता है। राजा के पास धनागमन तो होता ही है, किन्तु वह उस धन को प्रजा की सम्पत्ति समझता है तथा जनता की भलाई के कार्यों में व्यय करता है। इस प्रकार प्रजा की सम्पत्ति, प्रजा में विभाजित होकर प्रजा को प्राप्त हो जाती है।” यजुर्वेद (९/४० तथा १०/१८) में 'महते क्षत्राय, महते ज्यैष्ठाय, महते जान राज्याय' शब्दों का उल्लेख है, जो प्रजातन्त्र की स्पष्ट सूचना प्रदान करते हैं। ऋग्वेद में राजा द्वारा शासन करने की विधि तथा व्यवस्था पर प्रकाश डाला गया है। सामान्यतः “त्रीणि राजानां विदथे पुरुणि” (ऋ० ३/३८/६), राजा राज्य की शासन व्यवस्था को सुचारु रूप से चलाने के लिए तीन प्रकार की संस्थाओं का निर्माण करता है। प्रथम संस्था का कार्य आन्तरिक उपद्रवों का दमन करना तथा बाहरी हमलों से देश को बचाना होता है। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए सेना आवश्यक है। द्वितीय संस्था न्याय का कार्य करती है। यह दो भागों में विभाजित है। एक में विवादों का निर्णय होता है तथा दूसरे में दोषी व्यक्ति को दिए गए दण्ड का क्रियान्वयन। इस कार्य के लिए न्यायाधीश तथा रक्षक-वर्ग की नियुक्ति की जाती है। तीसरा विभाग प्रजा की शिक्षा तथा अर्थव्यवस्था का प्रबन्ध करता है। अथर्ववेद के १५वें काण्ड में “तं सभाच समितिश्च सेना च" शब्दों द्वारा ही इन्हीं तीन प्रकार की संस्थाओं का संकेत किया जाता है। प्रो० अल्तेकर, डॉ० काशी प्रसाद जायसवाल, डॉ० बेनी प्रसाद, डॉ० श्यामलाल पाण्डेय आदि वेदज्ञों ने राजनीति के दृष्टिकोण से वेदों का

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द्वितीय अध्याय 67 पर्यास चिन्तन, अध्ययन तथा मनन करके यह निष्कर्ष दिया कि उनमें इस विषय पर विपुल सामग्री विद्यमान है। (च) ऐतिहासिक दृष्टि से महत्त्व :- निःसन्देह ऐतिहासिक दृष्टि से वेदों का महत्त्व अपूर्व है। केवल भारतवर्ष के आदिकालिक ऐतिहासिक तत्त्वों के ज्ञानार्थ ही नहीं, बल्कि सम्पूर्ण विश्व के इतिहास के महत्त्वपूर्ण तथ्यों की जानकारी के लिए भी वैदिक वाङ्मय विशेष उपयोगी है। युद्धों, स्वअस्तित्व को स्थैर्य प्रदान हेतु किए गए संघर्षों, सम्राटों, अनेक राज्य-सत्ताओं के परिवर्तन के लिए की गई क्रान्तियों, वैचारिक विवादों आदि के विषय में उपयोगी संकेतों की वैदिक ग्रन्थों में प्रचुरता है। (द) वैज्ञानिक दृष्टि से महत्त्व :- आधुनिक युग में विज्ञान विभिन्न भागों में विभक्त होकर अनेक प्रकार के अन्वेषणों से विश्व के जनमानस को आश्चर्यचकित कर रहा है। उसने पृथ्वी के बाहर तथा भीतर दोनों भागों में छिपे हुए तत्त्वों की खोज की। प्रकाश, ध्वनि तथा नवीन ग्रहों के विषय में खोज के द्वारा नवीन मान्यताएँ स्थापित की जा रही हैं, किन्तु महर्षि दयानन्द ने अपनी ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका में सप्रमाण सिद्ध किया है कि वेद में विज्ञान के इन आविष्कारों का आधार विद्यमान है। इसीलिए वेदों को विद्वानों ने "सृष्टि विज्ञान" के नाम से अभिहित किया है। वेद में चन्द्र, मंगल, शुक्रादि ग्रहों की विशेषताएँ वर्णित हैं। यथा निम्नलिखित ऋग्वेद के मंत्र में मंगल का वैशिष्ट्य वर्णित है- "अग्निर्मूर्धा दिवः ककुत्पतिः पृथिव्या अयम्। अपां रेतांसि जिन्वति।। (ऋग्वेद ८/४४/१६) मंत्र से पूर्णतया स्पष्ट है कि मंगल पृथ्वी का भाग है, आग्नेय है तथा अरुणवर्णी है। विज्ञान द्वारा भी मंगल के सम्बन्ध में यही निष्कर्ष निकाला गया है। वर्तमान भौतिक शास्त्र की मान्यतानुसार सूर्य यदि हिरण्यगर्भ का जाज्वल्यमान अंश हैं, तो सूर्य के प्रस्फुटित भागों में शुक्र भी है। निम्नलिखित वेद मंत्र में भी शुक्र सम्बन्धी अनेक तथ्यों को प्रकट किया गया है- "अन्ना॑त् परि॑स्रुतो रसं॒ ब्रह्म॑णा॒ व्यपिबत् क्ष॒त्रं पयः॒ सोमं॑ प्र॒जाप॑तिः। ऋ॒तेन॑ स॒त्यमि॑न्द्रि॒य विपा॑नं शु॒क्रमन्ध॑स॒ऽ इन्द्र॑स्येन्द्रि॒यमि॒दं पयो॒ऽमृतं मधु॑।।" (यजु० १९-७५) सूर्य सौर जगत् का प्रजापति तथा सौर जगत् उसकी प्रजा है। सूर्य अपने चतुर्दिक

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