वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)
Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System
डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंDigitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri द्वितीय अध्याय 51 (ख) ज्योतिष :- 'ज्योतिष' षष्ठ एवं अन्तिम वेदाङ्ग है। यज्ञों का अनुष्ठान किसी विशिष्ट ऋतु एवं नक्षत्र में होना चाहिए। इस प्रकार नक्षत्र, तिथि, मास एवं संवत्सर के ज्ञान से वैदिक कर्मकाण्ड का उचित काल में आयोजन होता है। इस कार्य के लिए निवर्तमान वेदाङ्ग ही ज्योतिष है। ज्योतिष का प्रतिनिधित्व 'वेदाङ्ग ज्योतिष' ग्रन्थ करता है। सूत्र साहित्य :- 'वेद' तो ईश्वरीय ज्ञान है। ऋषियों द्वारा साक्षात्कृत साहित्य है। इसके अतिरिक्त एक अन्य रचना है- कल्पसूत्र अथवा सूत्र साहित्य। यह वैदिक साहित्य से अत्यन्त निकटता से सम्बद्ध है, किन्तु इसकी गणना वैदिक साहित्य में नहीं की जाती है। यह वेदाङ्ग के रूप में माना जाता है। यह सूत्र-ग्रन्थ वेदों तथा ब्राह्मणों के प्रतिपाद्य विषय का साररूप है। यह गद्य में विरचित है। उपलब्ध सूत्रों का विवरण निम्नलिखित है- (अ) ऋग्वेदीय सूत्र- आश्वलायन सूत्र तथा शाङ्खायन सूत्र। (ब) शुक्ल यजुर्वेदीय सूत्र- कात्यायन श्रौत सूत्र, पारस्कर गृह्यसूत्र तथा कात्यायन शुल्ब सूत्र। (स) कृष्ण यजुर्वेदीय सूत्र- विभिन्न शाखाओं के भिन्न-भिन्न सूत्र प्राप्त होते हैं, जो निम्नांकित हैं- (अ) बौधायन तथा आपस्तम्ब शाखाएं- श्रौतसूत्र, गृह्य सूत्र, धर्म सूत्र तथा शुल्बसूत्र। (ब) काठक शाखा- काठक गृह्यसूत्र। (स) मैत्रायणी शाखा- मानव श्रौतसूत्र, मानव गृह्यसूत्र तथा वाराह- गृह्यसूत्र। (द) सामवेदीय सूत्र- लाट्यायन श्रौतसूत्र, द्राह्यायन श्रौतसूत्र, खादिर गृह्यसूत्र, जैमिनीय श्रौतसूत्र, जैमिनीय गृह्यसूत्र, गौतम धर्मसूत्र एवं आर्षेय कल्पसूत्र। (क) अथर्ववेदीय सूत्र- वैतान श्रौत्रसूत्र, कौशिक गृह्यसूत्र एवं वैखानस गृह्यसूत्र। अतः स्पष्ट है कि कल्प सूत्रों में श्रौतसूत्र, गृह्यसूत्र, धर्मसूत्र एवं शुल्बसूत्रों की भी गणना होती है; इनका किंचित परिचय निम्नलिखित है- (अ) श्रौतसूत्र- श्रौतसूत्र में श्रौतयागों का क्रमबद्ध विवरण किया गया है। अधिक दिनों तक निरन्तर अनेक पुरोहितों द्वारा सम्पादन किए जाने वाले CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar