वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)
Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System
डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा
पृष्ठ 80, कुल 353 में से
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52 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता श्रौताग्नि से सम्बन्धित यज्ञ श्रौत याग कहलाते हैं। कुछ प्रमुख श्रौतयाग निम्नलिखित हैं- दर्श, पौर्णमास, सोमयाग, वाजपेय, राजसूय, सोत्रामणी, अश्वमेधादि। इन्हीं श्रौतयज्ञों के विधानों एवं नियमों का संग्रह श्रौतसूत्रों में उपलब्ध होता है। (ब) गृह्यसूत्र- गृह्याग्नि साध्य यज्ञों, विवाहादि संस्कारों तथा शाला निर्माण एवं कृषि कर्मों के विधान का संग्रह ग्रन्थ गृह्यसूत्र के नाम से विख्यात है। इनमें षोडश संस्कार, पञ्चमहायज्ञ, सप्त पाकयज्ञ, गृह निर्माण, गृह प्रवेश, पशु-पालन, रोग विनाशक विधियों का विवेचन उपलब्ध होता है। (स) धर्मसूत्र- ये भारतवासियों के सर्वप्राचीन न्याय ग्रन्थ हैं। इनमें आध्यात्मिक एवं धार्मिक नियमों के सन्देश प्राप्त होते हैं। इनमें नीति, धर्म, रीति, प्रथाओं, चार वर्णों, चार आश्रमों आदि के कर्तव्यों एवं सामाजिक व्यवहारोपयोगी नियमों का वर्णन है। (द) शुल्ब सूत्र- इन सूत्र-ग्रन्थों का वैज्ञानिक महत्त्व है। क्योंकि इनमें आर्यों की पुरातन ज्यामितीय कल्पनाओं एवं गणनाओं का प्रतिपादन है। प्राचीन भारतीय ज्यामिति के विकास की जानकारी इन ग्रन्थों से पता चलती है। इनमें यज्ञ-वेदी से सम्बद्ध नाप तथा वेदी निर्माण के नियमों का विवेचन है। उपसंहार:- इस प्रकार उपर्युक्त समस्त रचनाएँ वैदिक हैं। सम्पूर्ण वैदिक साहित्य किसी एक काल की निश्चित अवधि की देन नहीं है। यह तो अतिदीर्घकाल में उपलब्ध गीति- संग्रहों, प्रार्थना-ग्रन्थों, आध्यात्मिक एवं पारमार्थिक निबन्धात्मक धार्मिक रचनाओं का समूह है। सम्पूर्ण वैदिक साहित्य की विभिन्न विधाओं एवं ग्रन्थों में स्वयं में पर्याप्त भिन्नता होते हुए भी वह एकता के प्रशंसनीय आदर्श का उत्कृष्ट उदाहरण है। आर्यजनों ने सदैव वेदों को "श्रुति" की संज्ञा से सम्बोधित किया है। इसका कारण है कि संहिताओं की रचना तथा अध्ययन नहीं किया गया है, अपितु उच्चारण एवं श्रवण किया गया है। भारतीय दर्शनशास्त्र के अनुसार ऋग्वेद से लेकर उपनिषद् तक आद्योपान्त वैदिक साहित्य ईश्वरीय सम्पत्ति है जिसे प्राचीन महर्षियों ने अपने ध्यान- नेत्रों से प्रत्यक्षीकृत किया है। भारतीय दर्शन की विभिन्न विचारधाराएं परस्पर सैद्धान्तिक रूप से भले ही कितनी भेदयुक्त हो, किन्तु वेदों को सभी समान आदर
CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar