वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)
Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System
डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा
पृष्ठ 78, कुल 353 में से
संदर्भ में पढ़ेंDigitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 50 वैदिक वाङ्ग्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता का प्रणयन किया। यह सूत्र साहित्य 'वेदाङ्ग' के नाम से प्रसिद्ध है। 'वेदाङ्ग' का तात्पर्य है- वेद के अङ्ग। अङ्ग का व्युत्पत्ति से प्राप्त अर्थ है उपकारक अर्थात् उपकार करने वाले। जिससे किसी वस्तु के स्वरूपज्ञान में सहायता प्राप्त हो वह अङ्ग कहलाता है। वेद के भावों एवं अर्थों के ज्ञान करने में सहायक शास्त्र 'वेदाङ्ग' की संज्ञा से पुकारा गया। वेदाङ्गों में छह अङ्ग सम्मिलित हैं। जो निम्नलिखित हैं- अ. शिक्षा द. निरुक्त ब. कल्प क. छन्द स. व्याकरण ख. ज्योतिष इनका संक्षिप्त विवेचन प्रस्तुत है- (अ) शिक्षा :- वैदिक साहित्य में वैदिक मन्त्रों के शुद्ध उच्चारण का विशेष महत्त्व है। इस कार्य में सहायता प्रदान करने वाला वेदाङ्ग 'शिक्षा' कहा जाता है। शिक्षा की परिधि में प्रातिशाख्य ग्रन्थ भी आते हैं जो संहिताओं एवं पद-पाठ से प्रत्यक्षतः सम्बन्धित हैं। इस प्रकार शिक्षा के अन्तर्गत उच्चारण विधियों का निर्देश प्राप्त होता है। (ब) कल्प :- वैदिक कर्मकाण्ड तथा यज्ञीय अनुष्ठानों के निमित्त प्रवर्तमान वेदाङ्ग कल्प कहलाता है। इनमें क्रमबद्ध सूत्रात्मक संक्षिप्त रूप में यज्ञ-याग के विधान का विवरण उपलब्ध होता है। कल्प का व्युत्पत्ति से प्राप्त अर्थ है- यज्ञीय प्रयोगों का समर्थन करने वाला शास्त्र। अपने अर्थ के अनुसार ही कल्प में वैदिक कर्मकाण्ड का विवेचन है। (स) व्याकरण :- पदस्वरूप एवं पदार्थ निश्चय के लिए उपयोग किए जाने वाला वेदाङ्ग व्याकरण है। वैदिक मन्त्रों के आलोचनात्मक अध्ययन के लिए व्याकरण अत्यन्त आवश्यक शास्त्र है। व्याकरण शास्त्र पदों की प्रकृति एवं प्रत्यय का निर्देश करके उनके अर्थों का निर्णय करता है। (द) निरुक्त :- निर्वचन शास्त्र की ही 'संज्ञा' निरुक्त है। निरुक्त की रचना यास्क ने की है। यह 'निघण्टु' की टीका है। निरुक्त का मुख्य कार्य है- पदों की निरुक्ति एवं व्युत्पत्ति का ज्ञान कराना। निरुक्त की भिन्नता का प्रभाव अर्थों की भिन्नता का कारण बनता है। अतः वेदों के पदों के अर्थ-निर्णयार्थ प्रयुक्त वेदाङ्ग निरुक्त हैं। (क) छन्द :- 'छन्द' पाँचवा वेदाङ्ग है। समस्त वेद छन्दोबद्ध हैं। अतः छन्दों की यथार्थ जानकारी के बिना मन्त्रों का शुद्ध उच्चारण एवं पाठ सम्भव नहीं है। इस प्रकार छन्दों का ज्ञान मन्त्रों के उच्चारणार्थ अत्यन्त आवश्यक है। इसी कारण 'छन्द' वेदाङ्ग के रूप में प्रतिष्ठित हैं। CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar