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वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

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66 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता (घ) राजनैतिक दृष्टि से महत्त्व :- राजनैतिक दृष्टि से भी वेदों का महत्त्व न्यून नहीं है। इस दृष्टिकोण से भी वेद प्रचुर उपयोगिता से युक्त है। वेदों में युद्ध, राज्य- व्यवस्था, सैनिक एवं सेनापति के गुण, सेना की स्थिति तथा व्यूह रचना, विश्वासघाती से बचने के उपाय, विभिन्न शासन-प्रणालियों, संस्थाओं तथा सिद्धान्तों का वर्णन उपलब्ध होता है। ऋग्वेद में सभा तथा समिति नामक दो विशिष्ट संस्थाओं का उल्लेख है, जो प्रजातन्त्र की सफलता के लिए आवश्यक है। अथर्ववेद में सामान्य जनता द्वारा राजा के चुनाव की बात कही गई है— त्वां विशो॑ वृणतां राज्या॒य त्वामि॒माः प्र॒दिशः॒ पञ्च॑ दे॒वीः। वर्ष्म॑न् राष्ट्रस्य॑ क॒कुदि॑ श्रयस्व॒ ततो॑ न॒ उग्रो वि भ॑जा॒ वसू॑नि॥ (अथर्व० ३/४/२) “प्रजा राजा का वरण करती है, उसका चुनाव करती है। पंच जन, पाँच प्रकार की जनता, ज्ञानी, बली, श्रमी तथा असभ्य वर्ग द्वारा निर्वाचित सम्राट राष्ट्र के सिंहासन पर सुशोभित होता है। वह उग्रता, तेजस्विता तथा वीरता से सम्पन्न होता है। राजा के पास धनागमन तो होता ही है, किन्तु वह उस धन को प्रजा की सम्पत्ति समझता है तथा जनता की भलाई के कार्यों में व्यय करता है। इस प्रकार प्रजा की सम्पत्ति, प्रजा में विभाजित होकर प्रजा को प्राप्त हो जाती है।” यजुर्वेद (९/४० तथा १०/१८) में 'महते क्षत्राय, महते ज्यैष्ठाय, महते जान राज्याय' शब्दों का उल्लेख है, जो प्रजातन्त्र की स्पष्ट सूचना प्रदान करते हैं। ऋग्वेद में राजा द्वारा शासन करने की विधि तथा व्यवस्था पर प्रकाश डाला गया है। सामान्यतः “त्रीणि राजानां विदथे पुरुणि” (ऋ० ३/३८/६), राजा राज्य की शासन व्यवस्था को सुचारु रूप से चलाने के लिए तीन प्रकार की संस्थाओं का निर्माण करता है। प्रथम संस्था का कार्य आन्तरिक उपद्रवों का दमन करना तथा बाहरी हमलों से देश को बचाना होता है। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए सेना आवश्यक है। द्वितीय संस्था न्याय का कार्य करती है। यह दो भागों में विभाजित है। एक में विवादों का निर्णय होता है तथा दूसरे में दोषी व्यक्ति को दिए गए दण्ड का क्रियान्वयन। इस कार्य के लिए न्यायाधीश तथा रक्षक-वर्ग की नियुक्ति की जाती है। तीसरा विभाग प्रजा की शिक्षा तथा अर्थव्यवस्था का प्रबन्ध करता है। अथर्ववेद के १५वें काण्ड में “तं सभाच समितिश्च सेना च" शब्दों द्वारा ही इन्हीं तीन प्रकार की संस्थाओं का संकेत किया जाता है। प्रो० अल्तेकर, डॉ० काशी प्रसाद जायसवाल, डॉ० बेनी प्रसाद, डॉ० श्यामलाल पाण्डेय आदि वेदज्ञों ने राजनीति के दृष्टिकोण से वेदों का

CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar