वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)
Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System
डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा
पृष्ठ 95, कुल 353 में से
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द्वितीय अध्याय 67 पर्यास चिन्तन, अध्ययन तथा मनन करके यह निष्कर्ष दिया कि उनमें इस विषय पर विपुल सामग्री विद्यमान है। (च) ऐतिहासिक दृष्टि से महत्त्व :- निःसन्देह ऐतिहासिक दृष्टि से वेदों का महत्त्व अपूर्व है। केवल भारतवर्ष के आदिकालिक ऐतिहासिक तत्त्वों के ज्ञानार्थ ही नहीं, बल्कि सम्पूर्ण विश्व के इतिहास के महत्त्वपूर्ण तथ्यों की जानकारी के लिए भी वैदिक वाङ्मय विशेष उपयोगी है। युद्धों, स्वअस्तित्व को स्थैर्य प्रदान हेतु किए गए संघर्षों, सम्राटों, अनेक राज्य-सत्ताओं के परिवर्तन के लिए की गई क्रान्तियों, वैचारिक विवादों आदि के विषय में उपयोगी संकेतों की वैदिक ग्रन्थों में प्रचुरता है। (द) वैज्ञानिक दृष्टि से महत्त्व :- आधुनिक युग में विज्ञान विभिन्न भागों में विभक्त होकर अनेक प्रकार के अन्वेषणों से विश्व के जनमानस को आश्चर्यचकित कर रहा है। उसने पृथ्वी के बाहर तथा भीतर दोनों भागों में छिपे हुए तत्त्वों की खोज की। प्रकाश, ध्वनि तथा नवीन ग्रहों के विषय में खोज के द्वारा नवीन मान्यताएँ स्थापित की जा रही हैं, किन्तु महर्षि दयानन्द ने अपनी ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका में सप्रमाण सिद्ध किया है कि वेद में विज्ञान के इन आविष्कारों का आधार विद्यमान है। इसीलिए वेदों को विद्वानों ने "सृष्टि विज्ञान" के नाम से अभिहित किया है। वेद में चन्द्र, मंगल, शुक्रादि ग्रहों की विशेषताएँ वर्णित हैं। यथा निम्नलिखित ऋग्वेद के मंत्र में मंगल का वैशिष्ट्य वर्णित है- "अग्निर्मूर्धा दिवः ककुत्पतिः पृथिव्या अयम्। अपां रेतांसि जिन्वति।। (ऋग्वेद ८/४४/१६) मंत्र से पूर्णतया स्पष्ट है कि मंगल पृथ्वी का भाग है, आग्नेय है तथा अरुणवर्णी है। विज्ञान द्वारा भी मंगल के सम्बन्ध में यही निष्कर्ष निकाला गया है। वर्तमान भौतिक शास्त्र की मान्यतानुसार सूर्य यदि हिरण्यगर्भ का जाज्वल्यमान अंश हैं, तो सूर्य के प्रस्फुटित भागों में शुक्र भी है। निम्नलिखित वेद मंत्र में भी शुक्र सम्बन्धी अनेक तथ्यों को प्रकट किया गया है- "अन्ना॑त् परि॑स्रुतो रसं॒ ब्रह्म॑णा॒ व्यपिबत् क्ष॒त्रं पयः॒ सोमं॑ प्र॒जाप॑तिः। ऋ॒तेन॑ स॒त्यमि॑न्द्रि॒य विपा॑नं शु॒क्रमन्ध॑स॒ऽ इन्द्र॑स्येन्द्रि॒यमि॒दं पयो॒ऽमृतं मधु॑।।" (यजु० १९-७५) सूर्य सौर जगत् का प्रजापति तथा सौर जगत् उसकी प्रजा है। सूर्य अपने चतुर्दिक
CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar