वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)
Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System
डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंDigitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 68 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता भ्रमण करने वाले पृथ्वी, मंगल तथा शुक्रादि ग्रहों का पूर्वज है। वह ब्रह्म के साथ पके हुए अन्न के रस को पीता है। यह अन्न सोम है। यजुर्वेद का पुरुष सूक्त चन्द्रोत्पत्ति को यज्ञ पुरुष के मन से तथा सूर्योत्पत्ति को यज्ञ पुरुष के चक्षु से मानता है। चक्षु तथा सूर्य का सम्बन्ध वैज्ञानिक भी स्वीकार करने लगे हैं तथा मन का और चन्द्रमा का सम्बन्ध मनोवैज्ञानिक भी स्वीकार करेंगे। वेदों में यज्ञ की प्रमुखता है। यज्ञों से ही आयुर्विज्ञान का प्रादुर्भाव हुआ। वेदों में अनेक औषधियाँ वर्णित है जो विभिन्न रोगों को दूर करने में समर्थ है। ऋक् संहिता (१०/९७) औषधि सूक्त के नाम से प्रसिद्ध है। यजुर्वेद में १२वें अध्याय में मंत्र ७५ से लेकर मंत्र १०१ तक औषधि प्रकरण है। वेद में अश्विनीकुमार देवताओं के वैद्य के नाम से प्रसिद्ध हैं। वे वृद्ध को युवा तथा लंगड़े को चलने के योग्य बना सकते हैं। इस उपर्युक्त विवेचन से यह स्पष्ट है कि आधुनिक विज्ञान के अनेक सिद्धान्त वेद सम्मत तथा वेदों की अनेक मान्यताएँ विज्ञान सम्मत हैं। अतः वैज्ञानिक दृष्टि से भी वेद विशेष महत्त्व वहन करते हैं। (ज) तुलनात्मक देवशास्त्र तथा पुराण कथाओं के विश्लेषण की दृष्टि से महत्त्वः- वेदों के अध्ययन से इस विषय में भी पर्याप्त सहायता प्राप्त हुई है। अनेक पौराणिक कथाओं का बीज वेदों में निहित है। वेदों के संवादसूक्त अनेक पौराणिक तथा साहित्यिक कथानकों के जन्मदाता है। यथा— पुरूरवा-उर्वशी संवाद। इस संवाद का आधार लेकर गुणाढ्य की बृहत्कथा में कथा उपनिबद्ध की गई है। कालिदास कृत विक्रमोर्वशीय नाटक का आधार वेदों का यही पुरूरवा-उर्वशी संवाद है। मैक्डानल, हिल्लेब्रान्डर, कीथ, सम्पूर्णानन्द आदि के प्रयास इस प्रसंग में उल्लेखनीय है। उपसंहार हमारे धर्म, दर्शन, समाज, राजनीति, इतिहास, भाषा, कला, साहित्य तथा विज्ञान आदि पर वेदों का अत्यधिक प्रभाव परिलक्षित होता है। वेदों ने मार्गदर्शन किया तथा हम उसके द्वारा निर्दिष्ट मान्यताओं का अनुकरण करने लगे। वेद में बीज निहित है। शाखा, पत्र तथा पुष्पों में उसे पल्लवित करना मनुष्य का कार्य है। वेद के इस महत्त्व को पाश्चात्य मनीषियों ने भी मुक्तकण्ठ से स्वीकार किया है, जिनमें मैक्समूलर, ग्रिफिथ, कोलब्रुक, राथ, मैक्डानल, पीटर्सन आदि उल्लेखनीय हैं। विन्टरनिट्ज के अनुसार "If we wish to learn, to understand the beginnings of our own culture, we must go to India where the oldest literature of an Indo- European people is preserved." CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar