भारतकोश
वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

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पृष्ठ 97

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द्वितीय अध्याय 69 मैक्समूलर जर्मनी मे उत्पन्न हुआ और इंग्लैण्ड में जाकर रहने लगा। उसने संस्कृत साहित्य का अध्ययन करके वेदों के प्रति अपनी निष्ठा को निम्नलिखित पंक्तियों में प्रकट किया— "I maintain that for a study of man, there is nothing in the world equal in importance with the 'Veda'. I maintain that to every body who cares for himself, for his ancestors, for his history or for his intellectual development, a study of Vedic Literature is indispensable." "To the present day India acknowledges no higher authority in the matters of religion, ceremonials, customs and law than the Veda." वस्तुतः भारतीयों का जन-जीवन वेदों की मान्यताओं से आपूर्ण है। जन्म से लेकर देहान्त तक के समस्त भारतीय संस्कार वेद सम्मत हैं। वस्तुतः वेद हिन्दू धर्म तथा दर्शन के आशा केन्द्र हैं। हिन्दू-संस्कृति तथा सभ्यता के आधार स्तम्भ हैं। हिन्दुत्व की भावना के आलोक हैं। माननीय रामगोविन्द जी त्रिवेदी ने वेदों की विशुद्ध वाणी के समर्थन में विद्वानों का यह अंश उद्धृत किया है— वेद ईश्वर की विमल वाणी है और विश्व के उद्धार के लिए ही उसका अवतरण हुआ है। वैदिक-वाङ्मय पारिजात से भी अधिक सुगन्धमय और स्फटिक मणि से भी अधिक शुभ्र है। वेद के किसी मन्त्र में कुरुक्षेत्र का भैरव-रव है, किसी में वीरों की सी भयंकर हुंकार है, किसी में रण-चण्डी का प्रचण्ड अट्टहास है, किसी में समर-भूमि का विकट रणत्कार है, किसी में लक्ष्मी का मधुर- हास्य है, किसी में वृन्दावन का प्रेम-प्रवाह है, किसी में दिव्य शक्ति का नवल-नृत्य है और किसी में ब्रह्मदेव का ललित-विलास है। 'श्रुतिभगवती' जिसे छू देती है, वह अमृत से भी अधिक प्रिय बन जाता है और जिसके ऊपर पैर रख देती है, वह पद्मराग-मणि से भी मूल्यवान हो जाता है। वस्तुतः वेद अलौकिक हैं, महान् हैं, अद्भुत हैं, अमूल्य-निधि के सदृश हैं। उनका प्रत्येक मन्त्र, प्रत्येक ऋचा तथा प्रत्येक पद अपना विशेष महत्त्व रखता है। वेदों के शब्दों के महत्त्व के विषय में श्रीरामगोविन्द जी त्रिवेदी का मत है कि— "वेद का प्रत्येक शब्द बाह्य तत्त्वों से विमुक्त और योग की प्रक्रिया से विशुद्ध है। इस विशुद्धीकरण के कारण ही वेद के प्रत्येक शब्द में दिव्य शक्ति निहित है। वेद का प्रत्येक शब्द तपःपूत योगियों और महर्षियों की विमल समाधि में उपलब्ध अनन्त शक्तिमन्त्र है। फलतः प्रत्येक वेद-मन्त्र में रहस्य भरा पड़ा है। कमी है केवल इस रहस्य को समझने वाले तपस्वी तथा अधिकारी पुरुषों की।"

CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar