वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)
Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System
डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंDigitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri द्वितीय अध्याय 65 विश्लेषण के बिना भाषा-विज्ञान सम्बन्धी जानकारी अधूरी रह जाती है। (ग) अर्थशास्त्रीय ज्ञान की दृष्टि से महत्त्व :- अर्थशास्त्र के नियमों तथा सिद्धान्तों के निर्धारण में वेदों से अत्यधिक सहायता प्राप्त हो सकती है। वैदिक वाङ्मय में समाज में अर्थव्यवस्था के सम्बन्ध में समाजवाद, साम्यवाद अथवा पूँजीवाद के स्थान पर धर्मानुगत दृष्टि का प्राधान्य दृष्टिगोचर होता है। वेदों में धन की परिभाषा, गतियाँ, विभाजन तथा विकेन्द्रीकरण के विषय में महत्त्वपूर्ण जानकारी उपलब्ध होती है। वेद में धन के लिए श्री तथा लक्ष्मी के अतिरिक्त वसु, अन्न, राधः, रयि आदि शब्दों का प्रयोग हुआ है। धन की तीन गतियाँ बतलाई गई हैं- दान, भोग तथा विनाश। यजुर्वेद के ४०वें अध्याय के प्रथम मन्त्र में कहा गया है कि "तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा" अर्थात् त्यागमय भोग करो। धन का एक ही स्थल पर एकत्रीकरण वेदों में अनुचित तथा असङ्गत बतलाया गया है। व्यापारी-वर्ग मनुष्य को क्षुधातुर तथा तृषातुर न कर सके, इस विषय पर वैदिक विद्वान् सदैव सचेष्ट दिखलाई देते हैं। अनेक स्थलों पर तथा मन्त्रों में शोषण तथा शोषकों के दमन के उपाय बतलाए गए हैं। वेदानुसार अधिक धन नाश का कारण होता है। किसी समय धन की मात्रा इतनी अधिक हो जाती है कि वह मनुष्य के उपभोग में नहीं आ पाती। अनुपयोग की दशा में धन मानव के पतन का कारण हो जाता है। वेद के अनुसार :- या मां ल॒क्ष्मीः प॑तया॒लूरजु॑ष्टाभि॒चस्क॒न्द वन्द॑नेव वृ॒क्षम्। अ॒न्यत्रा॒स्मत् स॑वितु॒स्तामि॒तो धा॒ हिर॑ण्यहस्तो॒ वसु॑ नो॒ ररा॑णः॥ (अथर्व० ७/११५/२) "प्रभु हिरण्यहस्त हैं। ऐश्वर्य, स्वर्ण, हितकर तथा रमणीय स्वरूप उनके करों में दीप्ति हो रहा है। वे ही इसका वितरण तथा विभाजन प्राणि वर्ग में कर रहे हैं। किन्तु जो धन जीवधारियों के पास असेवित है, उपयोग से परे है तथा अंततः पतन की ओर प्रवृत्त करने वाला है, उसे मनुष्य को स्वयं अभीप्सित व्यक्ति तथा स्थान के पास पहुँचा देना चाहिए। यह कदापि नहीं होना चाहिए कि एक व्यक्ति क्षुधाग्रस्त होकर प्राण गवाँ दे तथा दूसरी जगह अतिरिक्त धन व्यक्ति के विनाश का कारण बन जाये।" वेदों में पणि नामक अर्थ पिशाच व्यापारी का वर्णन आया है, जो गो इत्यादि चल आवश्यक वस्तुओं को छिपा देता था तथा उस अभाव की स्थिति से अधिक लाभ उठाता था; इन्द्र देव ने उसके भण्डार गृहों पर आक्रमण करके आवश्यक वस्तुएँ जनसाधारण को उपलब्ध कराईं। CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar