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वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

पृष्ठ 92, कुल 353 में से

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पृष्ठ 92

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64 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता

संस्कृत के पूर्व यूरोपीय भाषाशास्त्रियों में आदिम भाषा के सम्बन्ध में मतवैभिन्न्य था। कोई ग्रीक को, कोई लैटिन को, कोई हिब्रू को विश्व की प्राचीनतम भाषा स्वीकार करता था। संस्कृत के ज्ञान होने के साथ ही इस विवाद का समापन हो गया। सभी आर्य-भाषा को विश्व की प्राचीनतम भाषा मानने लगे। पं० बलदेव उपाध्याय जी ने संस्कृत शब्दों के अर्थ परिवर्तन के कारण स्वरूप के विषय में विशेष सामग्री प्रस्तुत की है। उनका कथन है— "वैदिक भाषा की लौकिक भाषा के साथ तुलना करने पर अनेक मनोरंजक बातें दृष्टिपथ में आती हैं। भाषाशास्त्र का यह एक सामान्य नियम है कि भौतिक अर्थ में व्यहृत होने वाले शब्द कालान्तर में आध्यात्मिक अर्थ में प्रयुक्त होने लगते हैं। पार्थिव जगत् से हटकर वे सुदूर मानसिक जगत् की वस्तुओं की सूचना देते हैं। वेद इस विषय में बहुत से रोचक उदाहरण उपस्थित करता है। इन्द्र की स्तुति के प्रसङ्ग में गृत्समदऋषि की अन्तःदृष्टि पुकार कर कह रही है— "यः पर्वतान् प्रकुपितां अरम्णात्" अर्थात् इन्द्र ने चलायमान पर्वतों को स्थिर किया। यहाँ कुप् तथा रम् धातु के प्राचीन अर्थ का ऊहापोह भाषादृष्टि से नितान्त उपदेशप्रद है। कुप् धातु का मौलिक अर्थ है भौतिक संचलन और रम् धातु का अर्थ है स्थिरीकरण, चञ्चल पदार्थ को निश्चल बनाना। कालान्तर में इन धातुओं ने अपनी दीर्घ जीवन यात्रा में पलटा खाया। सबसे अधिक मानसिक विकार उस दशा में उत्पन्न होते हैं जब हम क्रोध के वशीभूत होते हैं। हम उस दशा में अपने मन के भीतर विचित्र प्रकार की प्रखर चञ्चलता का अनुभव पद्- पद पर करते हैं। अतः अर्थ की समता के बल पर "कोप" शब्द भौतिक जगत् से ऊपर उठकर मानस स्तर तक अनायास पहुँच जाता है। आधुनिक संस्कृत में यदि यह कहें "कुपितोमकरध्वजः" तो वाक्यपदीय के मन्तव्यानुसार कोप रूपी 'लिङ्ग' की सत्ता के कारण मकरध्वज से अभिप्राय "काम" से समझा जाता है और 'समुद्र' का अर्थ लक्षणया ही बोधित किया जा सकता है। 'रम्' का अर्थ है भौतिक स्थिरीकरण, परन्तु धीरे-धीरे इस शब्द ने भौतिक भाव को छोड़कर मानस भाव से अपना सम्बन्ध स्थापित कर लिया है। खेल तमाशों में चंचल चित्त स्थिर हो जाता है, क्योंकि उसे इन वस्तुओं में एक विचित्र प्रकार के आनन्द का संचार होता है। यही कारण है कि आजकल 'रम्' का प्रयोग क्रीड़ा अर्थ में किया जाता है। प्रचलित भाषा के प्रयोगों में कभी-कभी प्राचीन अर्थ की भी झलक आ जाती है। "क्रीडायां रमते चित्तम्" (क्रीडा में चित्त रमता है।) यहाँ रमते का लक्ष्य स्थिरीकरण के लिए स्पष्ट प्रतीत होता है।" अतः संस्कृत शब्दों के अर्थ-परिवर्तन के ज्ञानार्थ वैदिक साहित्य एवं भाषा का चिन्तन तथा मनन परमावश्यक है। वैदिक साहित्य तथा वैदिक भाषा के

CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

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