वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)
Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System
डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंDigitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri द्वितीय अध्याय 63 पितृस्थानीय सूर्य के समीप जाती है, तो कभी वह रमणीक वस्त्र धारण करके पति को अपने प्रेम पाश में आबद्ध करने के लिए मचलने वाली सुन्दरी के समान पति के सम्मुख स्वसौन्दर्य को प्रकट करती है।' छन्द :- वैदिक ऋषियों की वाणी छन्दों के रूप में प्रकट हुई। इसीलिए वैदिक ऋषियों की दृष्टि में छन्दों का अत्यधिक महत्त्व था। ऋग्वेद में (१०-११४/५) 'छन्दांसि' शब्द आया है। यजुर्वेद ४-२४, ८-४७, १२-५, १३-५३ आदि कई स्थलों पर छन्द शब्द ही नहीं, छन्दों के नामों तक का उल्लेख हुआ है। गायत्री छन्द, त्रिष्टुप छन्द, जगती छन्द, अनुष्टुप छन्द आदि प्रसिद्ध छन्दों के अतिरिक्त यजुर्वेद १४-९, १०- १८ में मा, प्रमा, पंक्ति, उष्णिफ्, बृहती, विराट् तथा १५-४-५ में वरिवः, शंभु, परिभू, ककुप, काव्य, अक्षर-पंक्ति, पद-पंक्ति, विष्टार-पंक्ति आदि अनेक छंदों के नाम आते हैं। इस प्रकार वैदिक ग्रन्थों का साहित्यिक महत्त्व स्पष्ट हो जाता है। वैदिक छन्द भारतीय काव्यउपवन के आदि प्रसून हैं। किन्तु, इसके साथ यह भी ध्यातव्य है कि लौकिक साहित्य से वैदिक साहित्य की चारुता नितान्त भिन्न प्रकार की है। (ख) भाषा विज्ञान की दृष्टि से महत्त्व :- भाषा के वैज्ञानिक अध्ययन के लिए भी वेद अत्यन्त महत्त्वपूर्णशाली है। वैदिक साहित्य में भाषा के उद्भव तथा विकास को जानने के लिए विपुल सामग्री विद्यमान है। आधुनिक भाषा विज्ञान का उद्भव ही तब हुआ, जब विदेशी विद्वानों ने वेदों के विषय में जानकारी प्राप्त की। विश्ववाङ्मय में शायद शतपथ ब्राह्मण ही स्वराङ्कित गद्य का उदाहरण प्रस्तुत करता है। भाषा के साथ बलाघात के साहचर्य की आवश्यकता के अध्ययन हेतु इससे श्रेष्ठ क्षेत्र मिलना सम्भव नहीं। मानवीय सभ्यता तथा संस्कृति के विकास में भाषा विशेष महत्त्वपूर्ण रही है। सभ्यता के साथ ही भाषा के विकास के लिए वैदिक वाङ्मय का अध्ययन अत्यावश्यक है। श्री T. Burrow ने अपने ग्रन्थ The Sanskrit Language में लिखा है- 'The discovery of the Sanskrit Language by European Scholars at the end of the eighteenth century was the starting point from which developed the study of the comparative philology of the Indo-European languages and eventually the whole science of modern linguistics.' आधुनिक भाषा तत्त्व का समस्त विज्ञान संस्कृत भाषा के ऊपर अवलम्बित है। अठारहवीं शताब्दी के अन्त में पश्चिमी विद्वानों के द्वारा संस्कृत भाषा का अन्वेषण ही ऐसा बिन्दु था जहाँ से भारोपीय भाषाओं के तुलनात्मक भाषा विज्ञान के अध्ययन का श्रीगणेश हुआ था तथा पुनः इसी से समस्त आधुनिक भाषा विज्ञान का जन्म हुआ।' CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar