भारतकोश
वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

पृष्ठ 90, कुल 353 में से

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पृष्ठ 90

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62 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता

के पास जाते हैं। उस समय प्रकट हुआ वेगवान, पवित्र भावों से वर्धमान कवि पूजा जाता है, स्तुति-भाजन बनता है।'' इस प्रकार त्रिष्टुप् छन्द में बँधे हुए जितने भी स्तुति गान हैं, वे सब काव्यात्मक सौन्दर्य से मण्डित हैं। वेदों के अनेक मन्त्रों में रसों का सुन्दर परिपाक हुआ है। प्रतिपक्षियों से संघर्ष में वीर-रस का तथा पुरुरवा-उर्वशी संवाद तथा यमयमी संवादों में शृङ्गार रस का आभास मिलता है। इन्द्र की स्तुति में वीररस का विशद संकेत किया गया है- य॒स्मान्न॒ ऋ॒ते वि॒जय॑न्ते॒ जना॑सो॒ यं युध्य॑माना॒ अव॑से॒ हव॑न्ते। यो विश्व॑स्य प्रति॒मानं॑ ब॒भूव॒ यो अ॑च्युत॒च्युत्स जना॑स॒ इन्द्रः॑॥ (ऋ० २/१२/९) “इन्द्र के बिना मनुष्य विजय प्राप्त नहीं कर सकता। योद्धा लोग अपनी रक्षा के निमित्त उसे पुकारते हैं। वह इस विश्व से श्रेष्ठ है। वह च्युत न होने वाले लोगों को च्युत कर देता है, क्योंकि वह शौर्य तथा वीर्य का प्रतीक है।'' पुरुरवा के प्रेम-प्रसंग में विरह से दुःखी पुरुरवा के कथन में विप्रलम्भ शृङ्गार का उत्कृष्ट निदर्शन है- इषु॒र्न श्रिय॑ इषु॒धेरस॑ना॒ गोषाः॑ श॒तसा॒ न रंहिः॑। अ॒वीरे॒ क्रतौ॒ वि द॑विद्युत॒न्नोरा॒ न मा॒युं चि॑तयन्त॒ धुन॑यः॥३॥ (ऋ० १०/९५/३) “हे उर्वशी, मेरा बाण तरकस में फेंके जाने में असमर्थ होकर लक्ष्मी को नहीं प्राप्त कर पाता। अतः वेग से युक्त होकर मैं शत्रुओं की गायों को भोक्ता नहीं हो पाता। यज्ञकर्म में या शक्तिमान कार्य में मैं प्रकाशशील नहीं होता। मेरे योद्धा, विस्तार वाले युद्ध में मेरे सिंहनाद का श्रवण नहीं कर पाते।'' अलङ्कार - वैदिक कार्य में अलंकारों का भी यथोचित प्रयोग उपलब्ध होता है। अलंकारों का कहीं भी खींच-तान कर प्रयोग नहीं हुआ है वे सर्वत्र स्वाभाविक रूप से उपस्थित हुए हैं। वैदिक कवियों का प्रिय अलंकार उपमा है- अभ्रा॑तेव॒ पुंस॒ एति॑ प्र॒तीची॒ गर्ता॒रुगिव॒ सन॑ये॒ धना॑नाम्। जा॒येव॒ पत्य॑ उश॒ती सु॒वासा॑ उ॒षा ह॒स्रेव॒ नि रि॑णीते॒ अप्सः॑॥ (ऋ० १/१२४/७) 'उषा कभी भ्रातृरहित बहन के सदृश अपने दायभाग को ग्रहण करने के लिए

CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

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