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वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

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पृष्ठ 89

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द्वितीय अध्याय 61

बलदेव उपाध्याय जी का विचार है कि- "श्रुतियों की सहायता से ही भारतीय दर्शनों के विविध विकास को हम भली-भाँति समझ सकते हैं। उपनिषदों में समग्र आस्तिक तथा नास्तिक दर्शन के तत्त्वों की बीजरूपेण उपलब्धि होती है। यदि 'नेह नानास्ति किञ्चन,' अद्वैत तत्त्व का बीजरूप से ही सूचक है, तो श्वेताश्वतर में वर्णित 'लोहितकृष्णाशुक्लां अजां' सांख्याभिमत सत्त्वरजतमोमयीत्रिगुणात्मिका-प्रकृति के प्रतीक हैं। यदि हम रामानुज मत के विशिष्टाद्वैत, निम्बार्क के द्वैताद्वैत, मध्वाचार्य के द्वैत, वल्लभ के शुद्धाद्वैत, चैतन्य के अचिन्त्य भेदाभेद के रहस्योद्घाटन के अभिलाषी हैं, तो उपनिषदों का गम्भीर अध्ययन, मनन तथा पर्यालोचन अनन्य साधन है।" वस्तुतः उपनिषदों में भी वैदिक तत्त्वों का ही वर्णन तथा व्याख्या है। इस प्रकार दार्शनिक दृष्टि से भी वेद महिमामय हैं। (क) साहित्यिक दृष्टि से महत्त्व :- साहित्यिक-सौन्दर्य की दृष्टि से वेदों का अध्ययन अपरिहार्य है। औपम्यगर्भ-अलंकारों के अकृत्रिम रूप, सहज-नाद तथा साम-सौन्दर्य, छन्दों के लयात्मक तथा गत्यात्मक निखार का अनुशीलन वेदों के माध्यम से ही हो सकता है। डॉ० वी० राघवन ने अपने ग्रन्थ 'इण्डियन हेरीटेज' में वैदिक काव्यगत विशेषताओं का मार्मिक विवेचन किया है— The literary merits of vedic poetry are quite conspicuous. In handling metre or language, in the expression of striking fancies or telling similies, in graphic descriptions of natural phenomena as in hymns to dawn and night or in the embodiment of abstractions and speculative conceptions as in the cosmogonic hymns and even in the introduction of verbal assonances, the Vedic Ṛṣi shows him definitely a poet and an able one at that : वेद के मन्त्रद्रष्टा ऋषियों को कवि की संज्ञा से सम्बोधित किया गया है। इन कवियों ने ब्रह्म की प्राप्ति के लिए ऋचाओं का प्रणयन किया। इस प्रकार कवि की भावमयी वाणी ने बल व तेज का संचार किया जिससे दक्षता तथा कर्मण्यता की प्रेरणा मिलती है। मनुष्य उसे श्रवण कर संकीर्णता का पर्दा फाड़ कर विशालता तथा उदारता में रमण करने लगते हैं। यथा— "सोमं गावो धेनवो वावशानाः सोमं विप्रा मतिभिः पृच्छमानाः। सोमः सुतः ऋच्यते पवमानः सोमे अकी: त्रिष्टुभः सं नवन्ते॥" अर्थात्— "दुधारू गायें रम्हाती हुई जैसे बछड़े की ओर जाती है, वैसे ही विप्र, व्यापक ज्ञान वाले ब्राह्मण अपनी मतियों द्वारा पूँछते हुए, खोज करते हुए, सौम्य कवि

CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar