वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)
Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System
डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा
पृष्ठ 88, कुल 353 में से
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60 वैदिक वाङ्गमय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता उपर्युक्त मन्त्र से वृत्त के व्यास तथा परिधि की परिभाषा का भी परिज्ञान होता है। यथा- यज्ञवेदी के पृथ्वी का चारों ओर का घेरा परिधि कहलाता है। व्यास- यज्ञवेदी को ऊपर से अन्त तक संयुक्त करने वाली रेखा "व्यास" कहलाती है। फलित ज्योतिष के परिज्ञान की दृष्टि से भी वेद अत्यन्त महत्त्वशाली हैं क्योंकि वेदों में फलित-ज्योतिष सम्बन्धी विवेचन भी पर्याप्त मात्रा में किया गया है। यजुर्वेद के मन्त्र "आकृष्णेन रजसा वर्तमानो निवेशयन्न" से सूर्य के क्रान्तिवृत्त में गतिशील होने का पता चलता है। क्रान्तिवृत्त सूर्य का मार्ग है। इसके १२ भाग कर लिए गए हैं। यही बारह भाग ही बारह राशियाँ हैं। इसके अतिरिक्त वेदों में अन्य ग्रहों का भी विवेचन है। जैसे- 'शुक्राङ्गारक बुध बृहस्पति शनैश्चर राहु केतु सोम सहित आदित्यः पुरोगाः ग्रहाः प्रीयन्ताम्।' सूर्य चन्द्र के सदृश ही बृहस्पति तथा शुक्र को भी महत्त्वपूर्ण देव माना गया है। यजुर्वेद में राहु की स्तुति उपलब्ध होती है। इसी प्रकार नक्षत्रों तथा मुहूर्त आदि की भी पर्याप्त चर्चा वेदों में की गई है। आर्द्रा से द्वादश नक्षत्र वृष्टि के कारण होते हैं- द्वादश धून्यदगोह्यास्याऽऽतिथ्येरणन्भवः ससन्तः। (ऋ० ४.३३.७)। वेदों में शुभ नक्षत्रों के विधान का भी विवेचन है। वेद में सूर्याकर्षण के बल पर क्षितिज में नक्षत्र का वर्णन उपलब्ध होता है- "तिस्रोद्यावः सवितुर्द्वा उपस्थांएका यमस्यभुवने विराषाट्। अणिं न रथ्यममृताधि तस्थुरिह ब्रवीतुयतच्चिकेतत्। (ऋ० १.३५.६)'' वेदों में बीज रूप में विद्यमान ज्योतिष के तीनों स्कन्धों, सिद्धान्त, गणित तथा फलित का विकास बाद के युग में हुआ। (द) दार्शनिक दृष्टि से महत्त्व :- वेदों की दार्शनिक दृष्टि से भी महत्ता अत्यन्त व्यापक है। वेद ही समस्त भारतीय दर्शन का मूल स्रोत है। भारतीय दर्शन की विभिन्न विचारधाराओं का उद्गम स्थल वेद है। प्रत्येक विचारधारा के प्रमुख सिद्धान्तों का बीज वेदों में विद्यमान है। सभी भारतीय आस्तिक दर्शन तो अपना मूल वेद को स्वीकार करते ही हैं, साथ ही साथ नास्तिक दर्शन भी वैदिक विचारधारा को आधार रूप में ग्रहण करके अपने सिद्धान्तों की विवेचना करते हैं। वैशेषिक दर्शन के अनुसार- 'तद्वचनादाम्नायस्य प्रामाण्यम्' (वै०सू० १.१.३)। आचार्य वाचस्पति मिश्र का कथन है कि महाप्रलय में नित्य सर्वज्ञ परमेश्वर वेद का प्रणयन कर सृष्टि के आदि में स्वयं ही सम्प्रदायों का प्रवर्तन करते हैं- "महाप्रलये तु ईश्वरेण वेदान् प्रणीय सृष्ट्यादौ स्वयमेव सम्प्रदायः प्रवर्त्यत एवेतिभावः" (न्यायवार्तिकतात्पर्य टीका)। बौद्ध दर्शन के आविर्भाव के पूर्व ही वैदिक साहित्य का प्रणयन हो चुका था, अतः इस दर्शन के निरूपण में भी वेदों का महत्त्वपूर्ण योगदान है। इस विषय पर पं०
CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar