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वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

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पृष्ठ 87

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri द्वितीय अध्याय 59 शब्दों में ‘‘ऋतस्य पन्थां न तरन्ति दुष्कृतः’’ दुराचारी ऋत (सत्य) के पन्थ को पार कर ही नहीं सकता। सदाचारी व्यक्ति ही ‘ऋतपथ’ का अनुगामी है और जो ऋतपथ पर चल रहा है वह एक दिन उसे पार कर ही जायेगा तथा प्रभु का सामीप्य ग्रहण कर ही लेगा। वैदिक संस्कृति में ऋत या सदाचार का नियम महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि संस्कृति रूपी जीवन की नींव वेद हैं। (स) ज्योतिष ज्ञान की दृष्टि से महत्त्व :- वेद की प्रवृत्ति यज्ञ के सम्पादन के लिए है। यज्ञ का विधान विशिष्ट समयों की अपेक्षा रखता है। यज्ञ याग के लिए समय शुद्धि की बड़ी आवश्यकता रहती है। इसीलिए वैदिक आर्यों का ज्योतिष ज्ञान बहुत बढ़ा-चढ़ा था। नक्षत्र, तिथि, पक्ष, मास, ऋतु तथा सम्वत्सर—काल के समस्त खण्डों के साथ यज्ञ याग का विधान वेदों में पाया जाता है। जो व्यक्ति ज्योतिष को भली प्रकार से जानता है, वहीँ यज्ञ का वास्तविक ज्ञाता है। ज्योतिष शास्त्र के मुख्यतः दो भेद हैं— (१) गणित ज्योतिष (२) फलित ज्योतिष। गणित ज्योतिष- ऋग्वेद तथा यजुर्वेद दोनों में समान रूप से गणित ज्योतिष का विवेचन उपलब्ध होता है। गणित के योग-वियोग का आधार यजुर्वेदान्तर्गत निम्नलिखित मन्त्र में दृष्टव्य है— ‘एक॑या च दश॒भि॑श्च स्वभूते॒ द्वाभ्या॑मि॒ष्टये॑ विंश॒ती च॑। ति॒सृभि॑श्च॒ वह॑से त्रिं॒शता॑ च नि॒युद्भि॑र्वायवि॒ह ता विमु॑ञ्च॥’ (यजु० २७/३३) उपर्युक्त मन्त्र में ‘विमुञ्च’ शब्द द्वारा वियोग प्रक्रिया स्पष्ट होती है। गुणन- प्रक्रिया के लिए निम्नलिखित मन्त्र प्रस्तुत किया जा सकता है— ‘‘युवां देवात्रयः एकादशासः सत्यस्यददृशेपुरस्त्राता’’ (ऋ० १०.५७.२) अर्थात् (देवां) दिव्य गुणों को वहन करने वाले ११×३ = ३३ (सत्याः) सद्गुणों से सम्पन्न है। यजुर्वेद के एकमन्त्र चतस्त्रश्चमे से वर्ग प्रक्रिया पूर्णतः स्पष्ट हो जाती है जैसे— २×२ = ४ होता है। वेदों में इकाई, दहाई, सैकड़ा आदि के प्रयोग से योग-वियोगादि का दर्शन उपलब्ध होता है। हमारे वेदज्ञों की संख्या-गणित की अनेक प्रक्रियाएँ पाश्चात्य विद्वानों द्वारा ग्रहण कर ली गई। ऋक् संहिता (८/५६/२२) में हजार की संख्या का अंकन है। बीज-गणित तथा रेखा-गणित के नियमों तथा उपयोग की जानकारी वेदों से प्राप्त होती है। यज्ञीयस्तम्भादि के निर्माण में रेखा गणित का विशेष महत्त्व है। जैसे— रेखा गणित- इयं वेदिः परोअन्तः पृथिव्या अयं यज्ञो भुवनस्य नाभिः। CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar