भारतकोश
वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

पृष्ठ 86, कुल 353 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 86

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 58 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता “सर्वेषां तु स नामानि, कर्माणि च पृथक्-पृथक्। वेदशब्देभ्य एवादौ, पृथक् संस्थाश्च निर्ममे॥” वैदिक संस्कृति के विषय में डॉ० आर० के० मुखर्जी का कथन है कि The Ṛgvedic civilization was based on plain living and high thinking यह जानकारी वेदों से ही प्राप्त हुई है। सामाजिक जीवन, वर्ण व्यवस्था, व्यक्ति का संस्कार, परिवार अथवा कुटुम्ब का निर्माण, विवाह संस्था, आश्रम व्यवस्था, स्त्रियों की स्थिति, दासप्रथा, शिक्षा, नियमित यौनसम्बन्ध, सामाजिक आचार तथा व्यवहार, स्वजनों के प्रति कर्तव्य-भावना, सामयिक दायित्वबोध, निवास, भोजन, पेय, वस्त्र, नागरिकता की दृढ़ आधारभूमि तथा अन्य सांस्कृतिक एवं सभ्यता विषयक तत्त्वों के उद्गम तथा विकास की जानकारी के लिए वेद श्रेष्ठ ग्रन्थ हैं। इस विषय में पं० बलदेव उपाध्याय का कथन उचित ही है- “यदि हम जानना चाहते कि हमारे पूर्वज किस प्रकार अपना जीवन बिताते थे, कौन क्रीड़ाएँ उनके मनोरंजन की साधिका थीं, किस प्रकार उनका विवाहसम्बन्ध, देहसम्बन्ध का ही प्रतीक न होकर आध्यात्मिकसंयोग का प्रतिनिधि माना जाता था, किन देवताओं की वे उपासना किया करते थे, किस प्रकार वे प्रातः काल प्राची के मुखमण्डल को उजागर करने वाली पुराणी युवति उषा की सुनहली छटा में अग्नि में आहुति प्रदान किया करते थे, किस तरह आवश्यकतानुसार वे इन्द्र, वरुण, पूषा, सविता तथा पर्जन्य की स्तुति अपने ऐहिक कल्याण तथा आमुष्मिक मंगल की साधना के लिए किया करते थे, तो हमारे पास एक ही साधन है, वेदों का गाढ़ अनुशीलन-श्रुतियों का गहरा अध्ययन।” अपनी बात को सबल तर्कों के साथ सिद्ध करते हुए उपाध्याय जी आगे कहते हैं कि- “ये आर्यों के ही नहीं, प्रत्युत मानव जाति के सबसे प्राचीन ग्रन्थ हैं। मानव जाति के प्राचीन इतिहास, रहन-सहन, आचार-व्यवहार की जानकारी के लिए भी उतने ही उपादेय तथा आदरणीय हैं। वेद मानव जाति के विचारों को लिपिबद्ध करने वाले गौरवमय ग्रन्थों में सबसे प्राचीन माने जाते हैं। अतः अतीव अतीत काल में मानवों के व्यवहार तथा विचार का पता इन अमूल्य ग्रन्थों की पर्यालोचना से भली भाँति लग सकता है।” वेदों का सांस्कृतिक-महत्त्व इसलिए भी अधिक है, क्योंकि वैदिक संस्कृति सदाचार को जितना महत्त्व प्रदान करती है, उतना अन्य उपादानों को नहीं। व्यक्ति चाहे अद्वैतवादी हो चाहे द्वैतवादी, यदि व्यक्ति सदाचारी नहीं है, तो उसका अद्वैतवादी या द्वैतवादी होना निरर्थक है, वह तो बालू में से तेल निकालने के समान है। यदि व्यक्ति सदाचारी है, तो ईश्वर में अविश्वास या विश्वास का प्रश्न उठेगा ही नहीं। वेद के CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar