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वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

पृष्ठ 85, कुल 353 में से

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पृष्ठ 85

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द्वितीय अध्याय 57 वेदों के अध्ययनशास्त्र से ही हो जाती है। वेदों के अध्ययन से अक्षय्य लोक की उपलब्ध होती है— "यावन्तं हैवे इमां पृथिवी वित्तेन पूर्णांददतु लोकं जयति, त्रिमिस्तावन्तं जयतिः भूयांस च अक्षय्य च एवं विद्वान् अहरहः स्वाध्यायमधीते, तस्मात् स्वाध्यायोऽध्ये तव्यः'' (शत. ११.५.६१)। आर्यधर्म में यज्ञ की प्रधानता है। वेद इस विश्व के मूल में यज्ञ की भावना को स्वीकार करता है। ऋग्वेद के दशम मण्डलानुसार यज्ञमहिमा अपूर्व है— "यज्ञ द्वारा ही सब कुछ वर्णित है। " गीतानुसार भी यह सृष्टि, यह रचना, यह प्रजा, यज्ञ के साथ ही उत्पन्न हुई है। प्रजापति विश्वरूपी यज्ञ का याजक, होता, अध्वर्यु तथा पुरोहित है। अथर्व संहितानुसार भी सृष्टि का उद्गम-स्थल यज्ञ है। शतपथ ब्राह्मण में भी यज्ञ को उत्तम-कर्म स्वीकार करके प्रजापति तथा विष्णु का रूप कहा गया है। शरीर भी यज्ञ रूप है, जिसमें चक्षु, श्रोत्र, मुख, वाणी, मन आदि भाग ले रहे हैं। मन—यजमान, चक्षु—होता, प्राण—उद्गाता, श्रवण—अध्वर्यु तथा वाणी—ब्रह्मा का रूप है। वेद के अनुसार— "इमं यज्ञं विततं विश्वकर्मणा।" तथा "स्विष्टिनस्ता कृणवद् विश्वकर्मा।" विश्वकर्मा ने ही इस यज्ञ का विस्तार किया। वही हमारी दुरिष्टियों को स्विष्टियों में परिणत कर सकता है। यज्ञ की भावना सहयोग, सौहार्द तथा संस्कृति की जननी है। यज्ञ के द्वारा हम अहिंसा, दान और ज्ञान का प्रसार करते हैं। समाज का सम्पूर्ण कंकाल इसी प्रसार पर अवलम्बित है। यज्ञ के द्वारा ही हम उस परम यज्ञ स्वरूप प्रभु के पास पहुँचते हैं, जिसने सृष्टि को यज्ञ के साथ ही उत्पन्न किया था। उसी ने हम सबको आदेश दिया था कि हम इसी यज्ञ प्रणाली द्वारा अभ्युदय में संलग्न हों। यही यज्ञ हमारे लिए कामधेनु है। गीतानुसार यज्ञ द्वारा ही हम दिव्य-शक्तियों को भावित तथा प्रसन्न करते हैं, इसीलिए देव भी हमें प्रसन्न करते हैं। इस प्रकार परस्पर भावित होते हुए हम सब कल्याण को प्राप्त करते हैं। अतः यज्ञ श्रेष्ठ कर्तव्य माना जाता है। याज्ञिक विधान के अतिरिक्त वेदों में नैतिक मूल्यों का भी अत्यधिक महत्त्व है। धर्म का मेरुदण्ड नैतिकता, सद्गुण तथा सदाचरण आदि हैं। इन सबका वेदों में विपुल वर्णन उपलब्ध होता है। अतः नैतिक दृष्टि से भी वेदों का अत्यन्त महत्त्व है। (ब) सांस्कृतिक दृष्टि से महत्त्व :- सांस्कृतिक तथा सामाजिक दृष्टि से भी वेदों का महत्त्व अपार है। अनेक सामाजिक संस्थाओं के निर्माण तथा नामकरण का श्रेय वेदों को प्राप्त है। मनुस्मृति के अनुसार—

CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar