वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)
Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System
डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंDigitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 56 वैदिक वाङ्ग्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता अतः जब वेदों का इतना महत्त्व है तो तन्मूलक स्मृत्यादि का भी महत्त्व स्वयंसिद्ध है। अब हम भिन्न-भिन्न दृष्टियों से वेदों की महत्ता को प्रस्तुत कर रहे हैं— (अ) धार्मिक दृष्टि से महत्त्व :- वेदों का सर्वाधिक महत्त्व धार्मिक दृष्टि से है। वेद हिन्दू धर्म के मूल स्रोत हैं। वेदों का आधार लेकर ही समस्त हिन्दू धर्म से सम्बन्धित ग्रन्थों का प्रणयन हुआ है। 'मनुस्मृति' में लिखा भी है— 'वेदोऽखिलोधर्ममूलम्' अर्थात् वेद धर्म सभी धर्मों के मूल हैं। वे भारतीय ही नहीं, बल्कि संसार के सभी धर्मों के आदि स्रोत हैं— यः कश्चित् कस्यचिद्धर्मो मनुना परिकीर्तितः। स सर्वोऽभिहितो वेदे सर्वज्ञानमयो हि सः॥ (मनु० २.७) धर्म के तत्त्व को जानने के ईच्छुक सामान्य जनों के लिए वेद परम प्रमाण के रूप में मान्य हैं— "धर्म जिज्ञा समानानां प्रमाणं परमं श्रुतिः" (मनु २.१३) लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक जी ने कहा है कि हिन्दू धर्म का लक्षण "केवल वेदों को प्रमाण रूप में स्वीकार करना है"— 'प्रामाण्यबुद्धिर्वेदेषु'। डॉ० सम्पूर्णानन्द के अनुसार ईश्वर की सत्ता न स्वीकार करने वाला हिन्दू संभव है, किन्तु वेद की सत्ता को नकारने वाला 'हिन्दू' सम्बोधन का अधिकारी नहीं। इसी कारण महाभाष्यकार पतञ्जलि ने कामना न करते हुए छः अङ्गों सहित वेदों का अध्ययन ब्राह्मणों के लिए आवश्यक कहा है— "ब्राह्मणेननिष्कारणो धर्मः षडङ्गो वेदोऽध्येयोज्ञेयश्च" (महाभाष्य) वेदों में हिन्दुओं के देवी-देवताओं, उनके स्वरूप तथा गुणों, उनकी शक्तिसम्पन्नता, उनकी पूजा तथा सेवा का महत्त्व तथा उनसे उपलब्ध होने वाले लाभादि समस्त धार्मिक तत्त्वों के विषय में जानकारी प्राप्त होती है। मनु का कथन है कि वेदों के अतिरिक्त शास्त्रों का परिश्रमपूर्वक अध्ययन करने वाला ब्राह्मण जीवित शूद्र है— "योऽनधीत्य द्विजो वेदमन्यत्र कुरुते श्रमम्। स जीवन्नेव शूद्रत्वभाशु गच्छति सान्वयः॥" (मनु : २.१६८) और भी— "आर्षधर्मोपदेशं च वेदशास्त्रविरोधिना। यस्तर्केणानुसन्धत्ते स धर्म वेद नेतरः॥" (मनु. १२.१०६) हिन्दू धर्मरूपी महल की आधारशिला 'यज्ञ' है तथा यज्ञ के अनेक प्रकार तथा उनके विधान हेतु आवश्यक मन्त्रादि का विवेचन वेदों में उपलब्ध होता है। 'शतपथ ब्राह्मण' के अनुसार तो धनादि से परिपूर्ण पृथ्वीदान के कर्म से होने वाली फलप्राप्ति CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar