भारतकोश
वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

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पृष्ठ 83

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri द्वितीय अध्याय 55 अर्थात् मानव मात्र के लिए वेद ही एकमात्र सुख का साधन है। इसका अध्ययन पाँच प्रकार से होता है। जैसा कि लिखा गया है— ‘वेदस्वीकरणं पूर्वं विचारोऽभ्यसनं जपः। तद्दानं चैव शिष्येभ्यो वेदाभ्यासोहि पञ्चधा॥’ अर्थात्- (१) वेद पढूँगा, यह निश्चय करना। (२) वेदार्थ का विचार। (३) वेदमन्त्रों का अभ्यास या पाठ। (४) शिष्य-प्रशिष्यों द्वारा वेद का अध्यापन। (५) वेदमन्त्रों का जप। इस प्रकार वेदाध्ययन करने वाले मानव द्विज कहलाए। वेदों को महर्षि मनु ने सर्वज्ञानमय तथा समस्त विधाओं का आधार एवं स्रोत माना है— ‘यः कश्चित् कस्यचिद् धर्मो मनुना परिकीर्तितः। स सर्वोऽभिहितो वेदे सर्वज्ञानमयो हिं सः॥’ मनु का मत है कि वेदों द्वारा ही तीनों काल के रहस्य को जाना जा सकता है- ‘भूतं भव्यं भविष्यच्च, सर्वं वेदात् प्रसिध्यति।’ चाणक्य तथा महर्षि दयानन्द ने राजा के मंत्री को वेदवित् होना चाहिए, यह स्वीकार किया है। अतएव वेदभक्त कहलाने वाले प्रत्येक व्यक्ति को स्वाध्याय करना आवश्यक है। यही तो इस स्वाध्यायोऽध्येतव्यः मीमांसक प्रोक्त घोषणा का आशय है। अपि च— “वेत्ति यो विविधान् वेदानधीते च यथाविधिः। स्वधर्मनिरतो विप्रो वैदिकः परिकीर्तितः॥” तथा— “ये साङ्गवेदान् विधिवद् विदन्ति, ते ब्राह्मणाः वैदिकनामधेयाः। वेदेन हीनाः यदि केऽपि सन्ति, ते शूद्रतुल्या भुवि सञ्चरन्ति॥” इस प्रकार वैदिक मतानुसार सृष्टिकाल के आदि में प्रकट हुए वेदों का आविर्भाव काल भी सृष्टिकाल के समान है। अतः मनु का कथन है— ‘युगान्तेऽन्तर्हितान् वेदान् सेतिहासान् महर्षयः। लेभिरे तपसा पूर्वम् अनुज्ञातः स्वयम्भुवा॥’ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar