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वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

पृष्ठ 82, कुल 353 में से

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पृष्ठ 82

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri ५ द्वितीय वेदों का महत्त्व वैदिक वाङ्मय विश्व का प्राचीनतम वाङ्मय है। यह वाङ्मय अत्यन्त प्राचीन होते हुए भी अपना अनुपम वैशिष्ट्य रखता है। यह समस्त सत्यज्ञान की अप्रतिमराशि एवं विश्व के ग्रन्थागार में सर्वप्राचीन ग्रन्थ है। वह भारतीय संस्कृति तथा सभ्यता का प्राण है। मानव सभ्यता के विकास के अति प्राचीन काल से ही वेद की शिक्षाएं मानव मात्र को असत् से सत् की ओर प्रेरित करती रही हैं। वैदिक-मन्दाकिनी की सुधाधारा में अवगाहन कर हृदय को परम शान्ति प्राप्त होती है। यह युगों में प्रवाहित होने वाली वह पवित्र अक्षुण्ण ज्ञान-धारा है जो कि अनेक संक्रमण-व्युत्क्रमणों को पार करती हुई आज भी अपने अनवद्यवपु के द्वारा बहती चली आ रही है। यह भारत ही नहीं अपितु समस्त विश्व के मानव हृदय का प्रतिनिधित्व करने वाली, परम शान्ति प्रदान करने वाली वह दिव्य ज्योति है जिससे आलोकित मानव को अपने कर्मपथ का ज्ञान होता है। भारत तथा भारतीयता से स्नेह रखने वाले सुधीजन जिसे सम्मान की दृष्टि से देखते हुए जिसके उपदेश पीयूष का पान कर उस दिव्य स्वर्गस्थ पीयूष की कामना नहीं करते, उस विश्व विश्रुत भगवती श्रुति की उपासना से ही भारतीय संस्कृति, धर्म, दर्शन आदि का तात्त्विक अनुशीलन किया जा सकता है। भारत की समस्त मौलिक ज्ञान-विज्ञान की निधि इसी में विद्यमान है। भारतीय संस्कृति, धर्म, दर्शन, सभ्यता, ललित साहित्य, विधिशास्त्र, अर्थशास्त्र, स्थापत्य, गणित, फलित, विज्ञान, इतिहास, कलाएँ आदि सबका आदिस्तोत्र वैदिक वाङ्मय ही है। भारत के मौलिक रूप के दर्शनार्थ वैदिक वाङ्मय का अध्ययन अनुशीलन अत्यावश्यक है। आर्य जाति की वेदों के प्रति अपूर्व आस्था है। पृथ्वी के किसी भी स्थान पर निवास करने वाला हिन्दू अपने धर्म और संस्कृति का मूलतत्त्व वेदों को ही मानता है। धार्मिक पर्वों तथा संस्कारों के समय पर हिन्दुओं के घरों में आज भी सादर वेदमन्त्रों का उच्चारण किया जाता है। वेद मन्त्रों के उच्चारण को सुनकर हिन्दू जाति आज भी गौरव का अनुभव करती है। यद्यपि भारत में अनेक मतमतान्तर प्रचलित हैं, परन्तु उन सभी ने अपने मत का आधार वेदों को ही माना है। इस प्रकार वेदों की महत्ता सर्वातिशायी सिद्ध होती है। महर्षि मनु लिखते हैं— “वेद एव द्विजातीयानां निःश्रेयस्करः परम्” CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar