वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)
Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System
डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 58 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता “सर्वेषां तु स नामानि, कर्माणि च पृथक्-पृथक्। वेदशब्देभ्य एवादौ, पृथक् संस्थाश्च निर्ममे॥” वैदिक संस्कृति के विषय में डॉ० आर० के० मुखर्जी का कथन है कि The Ṛgvedic civilization was based on plain living and high thinking यह जानकारी वेदों से ही प्राप्त हुई है। सामाजिक जीवन, वर्ण व्यवस्था, व्यक्ति का संस्कार, परिवार अथवा कुटुम्ब का निर्माण, विवाह संस्था, आश्रम व्यवस्था, स्त्रियों की स्थिति, दासप्रथा, शिक्षा, नियमित यौनसम्बन्ध, सामाजिक आचार तथा व्यवहार, स्वजनों के प्रति कर्तव्य-भावना, सामयिक दायित्वबोध, निवास, भोजन, पेय, वस्त्र, नागरिकता की दृढ़ आधारभूमि तथा अन्य सांस्कृतिक एवं सभ्यता विषयक तत्त्वों के उद्गम तथा विकास की जानकारी के लिए वेद श्रेष्ठ ग्रन्थ हैं। इस विषय में पं० बलदेव उपाध्याय का कथन उचित ही है- “यदि हम जानना चाहते कि हमारे पूर्वज किस प्रकार अपना जीवन बिताते थे, कौन क्रीड़ाएँ उनके मनोरंजन की साधिका थीं, किस प्रकार उनका विवाहसम्बन्ध, देहसम्बन्ध का ही प्रतीक न होकर आध्यात्मिकसंयोग का प्रतिनिधि माना जाता था, किन देवताओं की वे उपासना किया करते थे, किस प्रकार वे प्रातः काल प्राची के मुखमण्डल को उजागर करने वाली पुराणी युवति उषा की सुनहली छटा में अग्नि में आहुति प्रदान किया करते थे, किस तरह आवश्यकतानुसार वे इन्द्र, वरुण, पूषा, सविता तथा पर्जन्य की स्तुति अपने ऐहिक कल्याण तथा आमुष्मिक मंगल की साधना के लिए किया करते थे, तो हमारे पास एक ही साधन है, वेदों का गाढ़ अनुशीलन-श्रुतियों का गहरा अध्ययन।” अपनी बात को सबल तर्कों के साथ सिद्ध करते हुए उपाध्याय जी आगे कहते हैं कि- “ये आर्यों के ही नहीं, प्रत्युत मानव जाति के सबसे प्राचीन ग्रन्थ हैं। मानव जाति के प्राचीन इतिहास, रहन-सहन, आचार-व्यवहार की जानकारी के लिए भी उतने ही उपादेय तथा आदरणीय हैं। वेद मानव जाति के विचारों को लिपिबद्ध करने वाले गौरवमय ग्रन्थों में सबसे प्राचीन माने जाते हैं। अतः अतीव अतीत काल में मानवों के व्यवहार तथा विचार का पता इन अमूल्य ग्रन्थों की पर्यालोचना से भली भाँति लग सकता है।” वेदों का सांस्कृतिक-महत्त्व इसलिए भी अधिक है, क्योंकि वैदिक संस्कृति सदाचार को जितना महत्त्व प्रदान करती है, उतना अन्य उपादानों को नहीं। व्यक्ति चाहे अद्वैतवादी हो चाहे द्वैतवादी, यदि व्यक्ति सदाचारी नहीं है, तो उसका अद्वैतवादी या द्वैतवादी होना निरर्थक है, वह तो बालू में से तेल निकालने के समान है। यदि व्यक्ति सदाचारी है, तो ईश्वर में अविश्वास या विश्वास का प्रश्न उठेगा ही नहीं। वेद के CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri द्वितीय अध्याय 59 शब्दों में ‘‘ऋतस्य पन्थां न तरन्ति दुष्कृतः’’ दुराचारी ऋत (सत्य) के पन्थ को पार कर ही नहीं सकता। सदाचारी व्यक्ति ही ‘ऋतपथ’ का अनुगामी है और जो ऋतपथ पर चल रहा है वह एक दिन उसे पार कर ही जायेगा तथा प्रभु का सामीप्य ग्रहण कर ही लेगा। वैदिक संस्कृति में ऋत या सदाचार का नियम महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि संस्कृति रूपी जीवन की नींव वेद हैं। (स) ज्योतिष ज्ञान की दृष्टि से महत्त्व :- वेद की प्रवृत्ति यज्ञ के सम्पादन के लिए है। यज्ञ का विधान विशिष्ट समयों की अपेक्षा रखता है। यज्ञ याग के लिए समय शुद्धि की बड़ी आवश्यकता रहती है। इसीलिए वैदिक आर्यों का ज्योतिष ज्ञान बहुत बढ़ा-चढ़ा था। नक्षत्र, तिथि, पक्ष, मास, ऋतु तथा सम्वत्सर—काल के समस्त खण्डों के साथ यज्ञ याग का विधान वेदों में पाया जाता है। जो व्यक्ति ज्योतिष को भली प्रकार से जानता है, वहीँ यज्ञ का वास्तविक ज्ञाता है। ज्योतिष शास्त्र के मुख्यतः दो भेद हैं— (१) गणित ज्योतिष (२) फलित ज्योतिष। गणित ज्योतिष- ऋग्वेद तथा यजुर्वेद दोनों में समान रूप से गणित ज्योतिष का विवेचन उपलब्ध होता है। गणित के योग-वियोग का आधार यजुर्वेदान्तर्गत निम्नलिखित मन्त्र में दृष्टव्य है— ‘एक॑या च दश॒भि॑श्च स्वभूते॒ द्वाभ्या॑मि॒ष्टये॑ विंश॒ती च॑। ति॒सृभि॑श्च॒ वह॑से त्रिं॒शता॑ च नि॒युद्भि॑र्वायवि॒ह ता विमु॑ञ्च॥’ (यजु० २७/३३) उपर्युक्त मन्त्र में ‘विमुञ्च’ शब्द द्वारा वियोग प्रक्रिया स्पष्ट होती है। गुणन- प्रक्रिया के लिए निम्नलिखित मन्त्र प्रस्तुत किया जा सकता है— ‘‘युवां देवात्रयः एकादशासः सत्यस्यददृशेपुरस्त्राता’’ (ऋ० १०.५७.२) अर्थात् (देवां) दिव्य गुणों को वहन करने वाले ११×३ = ३३ (सत्याः) सद्गुणों से सम्पन्न है। यजुर्वेद के एकमन्त्र चतस्त्रश्चमे से वर्ग प्रक्रिया पूर्णतः स्पष्ट हो जाती है जैसे— २×२ = ४ होता है। वेदों में इकाई, दहाई, सैकड़ा आदि के प्रयोग से योग-वियोगादि का दर्शन उपलब्ध होता है। हमारे वेदज्ञों की संख्या-गणित की अनेक प्रक्रियाएँ पाश्चात्य विद्वानों द्वारा ग्रहण कर ली गई। ऋक् संहिता (८/५६/२२) में हजार की संख्या का अंकन है। बीज-गणित तथा रेखा-गणित के नियमों तथा उपयोग की जानकारी वेदों से प्राप्त होती है। यज्ञीयस्तम्भादि के निर्माण में रेखा गणित का विशेष महत्त्व है। जैसे— रेखा गणित- इयं वेदिः परोअन्तः पृथिव्या अयं यज्ञो भुवनस्य नाभिः। CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
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60 वैदिक वाङ्गमय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता उपर्युक्त मन्त्र से वृत्त के व्यास तथा परिधि की परिभाषा का भी परिज्ञान होता है। यथा- यज्ञवेदी के पृथ्वी का चारों ओर का घेरा परिधि कहलाता है। व्यास- यज्ञवेदी को ऊपर से अन्त तक संयुक्त करने वाली रेखा "व्यास" कहलाती है। फलित ज्योतिष के परिज्ञान की दृष्टि से भी वेद अत्यन्त महत्त्वशाली हैं क्योंकि वेदों में फलित-ज्योतिष सम्बन्धी विवेचन भी पर्याप्त मात्रा में किया गया है। यजुर्वेद के मन्त्र "आकृष्णेन रजसा वर्तमानो निवेशयन्न" से सूर्य के क्रान्तिवृत्त में गतिशील होने का पता चलता है। क्रान्तिवृत्त सूर्य का मार्ग है। इसके १२ भाग कर लिए गए हैं। यही बारह भाग ही बारह राशियाँ हैं। इसके अतिरिक्त वेदों में अन्य ग्रहों का भी विवेचन है। जैसे- 'शुक्राङ्गारक बुध बृहस्पति शनैश्चर राहु केतु सोम सहित आदित्यः पुरोगाः ग्रहाः प्रीयन्ताम्।' सूर्य चन्द्र के सदृश ही बृहस्पति तथा शुक्र को भी महत्त्वपूर्ण देव माना गया है। यजुर्वेद में राहु की स्तुति उपलब्ध होती है। इसी प्रकार नक्षत्रों तथा मुहूर्त आदि की भी पर्याप्त चर्चा वेदों में की गई है। आर्द्रा से द्वादश नक्षत्र वृष्टि के कारण होते हैं- द्वादश धून्यदगोह्यास्याऽऽतिथ्येरणन्भवः ससन्तः। (ऋ० ४.३३.७)। वेदों में शुभ नक्षत्रों के विधान का भी विवेचन है। वेद में सूर्याकर्षण के बल पर क्षितिज में नक्षत्र का वर्णन उपलब्ध होता है- "तिस्रोद्यावः सवितुर्द्वा उपस्थांएका यमस्यभुवने विराषाट्। अणिं न रथ्यममृताधि तस्थुरिह ब्रवीतुयतच्चिकेतत्। (ऋ० १.३५.६)'' वेदों में बीज रूप में विद्यमान ज्योतिष के तीनों स्कन्धों, सिद्धान्त, गणित तथा फलित का विकास बाद के युग में हुआ। (द) दार्शनिक दृष्टि से महत्त्व :- वेदों की दार्शनिक दृष्टि से भी महत्ता अत्यन्त व्यापक है। वेद ही समस्त भारतीय दर्शन का मूल स्रोत है। भारतीय दर्शन की विभिन्न विचारधाराओं का उद्गम स्थल वेद है। प्रत्येक विचारधारा के प्रमुख सिद्धान्तों का बीज वेदों में विद्यमान है। सभी भारतीय आस्तिक दर्शन तो अपना मूल वेद को स्वीकार करते ही हैं, साथ ही साथ नास्तिक दर्शन भी वैदिक विचारधारा को आधार रूप में ग्रहण करके अपने सिद्धान्तों की विवेचना करते हैं। वैशेषिक दर्शन के अनुसार- 'तद्वचनादाम्नायस्य प्रामाण्यम्' (वै०सू० १.१.३)। आचार्य वाचस्पति मिश्र का कथन है कि महाप्रलय में नित्य सर्वज्ञ परमेश्वर वेद का प्रणयन कर सृष्टि के आदि में स्वयं ही सम्प्रदायों का प्रवर्तन करते हैं- "महाप्रलये तु ईश्वरेण वेदान् प्रणीय सृष्ट्यादौ स्वयमेव सम्प्रदायः प्रवर्त्यत एवेतिभावः" (न्यायवार्तिकतात्पर्य टीका)। बौद्ध दर्शन के आविर्भाव के पूर्व ही वैदिक साहित्य का प्रणयन हो चुका था, अतः इस दर्शन के निरूपण में भी वेदों का महत्त्वपूर्ण योगदान है। इस विषय पर पं०
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द्वितीय अध्याय 61
बलदेव उपाध्याय जी का विचार है कि- "श्रुतियों की सहायता से ही भारतीय दर्शनों के विविध विकास को हम भली-भाँति समझ सकते हैं। उपनिषदों में समग्र आस्तिक तथा नास्तिक दर्शन के तत्त्वों की बीजरूपेण उपलब्धि होती है। यदि 'नेह नानास्ति किञ्चन,' अद्वैत तत्त्व का बीजरूप से ही सूचक है, तो श्वेताश्वतर में वर्णित 'लोहितकृष्णाशुक्लां अजां' सांख्याभिमत सत्त्वरजतमोमयीत्रिगुणात्मिका-प्रकृति के प्रतीक हैं। यदि हम रामानुज मत के विशिष्टाद्वैत, निम्बार्क के द्वैताद्वैत, मध्वाचार्य के द्वैत, वल्लभ के शुद्धाद्वैत, चैतन्य के अचिन्त्य भेदाभेद के रहस्योद्घाटन के अभिलाषी हैं, तो उपनिषदों का गम्भीर अध्ययन, मनन तथा पर्यालोचन अनन्य साधन है।" वस्तुतः उपनिषदों में भी वैदिक तत्त्वों का ही वर्णन तथा व्याख्या है। इस प्रकार दार्शनिक दृष्टि से भी वेद महिमामय हैं। (क) साहित्यिक दृष्टि से महत्त्व :- साहित्यिक-सौन्दर्य की दृष्टि से वेदों का अध्ययन अपरिहार्य है। औपम्यगर्भ-अलंकारों के अकृत्रिम रूप, सहज-नाद तथा साम-सौन्दर्य, छन्दों के लयात्मक तथा गत्यात्मक निखार का अनुशीलन वेदों के माध्यम से ही हो सकता है। डॉ० वी० राघवन ने अपने ग्रन्थ 'इण्डियन हेरीटेज' में वैदिक काव्यगत विशेषताओं का मार्मिक विवेचन किया है— The literary merits of vedic poetry are quite conspicuous. In handling metre or language, in the expression of striking fancies or telling similies, in graphic descriptions of natural phenomena as in hymns to dawn and night or in the embodiment of abstractions and speculative conceptions as in the cosmogonic hymns and even in the introduction of verbal assonances, the Vedic Ṛṣi shows him definitely a poet and an able one at that : वेद के मन्त्रद्रष्टा ऋषियों को कवि की संज्ञा से सम्बोधित किया गया है। इन कवियों ने ब्रह्म की प्राप्ति के लिए ऋचाओं का प्रणयन किया। इस प्रकार कवि की भावमयी वाणी ने बल व तेज का संचार किया जिससे दक्षता तथा कर्मण्यता की प्रेरणा मिलती है। मनुष्य उसे श्रवण कर संकीर्णता का पर्दा फाड़ कर विशालता तथा उदारता में रमण करने लगते हैं। यथा— "सोमं गावो धेनवो वावशानाः सोमं विप्रा मतिभिः पृच्छमानाः। सोमः सुतः ऋच्यते पवमानः सोमे अकी: त्रिष्टुभः सं नवन्ते॥" अर्थात्— "दुधारू गायें रम्हाती हुई जैसे बछड़े की ओर जाती है, वैसे ही विप्र, व्यापक ज्ञान वाले ब्राह्मण अपनी मतियों द्वारा पूँछते हुए, खोज करते हुए, सौम्य कवि
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62 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता
के पास जाते हैं। उस समय प्रकट हुआ वेगवान, पवित्र भावों से वर्धमान कवि पूजा जाता है, स्तुति-भाजन बनता है।'' इस प्रकार त्रिष्टुप् छन्द में बँधे हुए जितने भी स्तुति गान हैं, वे सब काव्यात्मक सौन्दर्य से मण्डित हैं। वेदों के अनेक मन्त्रों में रसों का सुन्दर परिपाक हुआ है। प्रतिपक्षियों से संघर्ष में वीर-रस का तथा पुरुरवा-उर्वशी संवाद तथा यमयमी संवादों में शृङ्गार रस का आभास मिलता है। इन्द्र की स्तुति में वीररस का विशद संकेत किया गया है- य॒स्मान्न॒ ऋ॒ते वि॒जय॑न्ते॒ जना॑सो॒ यं युध्य॑माना॒ अव॑से॒ हव॑न्ते। यो विश्व॑स्य प्रति॒मानं॑ ब॒भूव॒ यो अ॑च्युत॒च्युत्स जना॑स॒ इन्द्रः॑॥ (ऋ० २/१२/९) “इन्द्र के बिना मनुष्य विजय प्राप्त नहीं कर सकता। योद्धा लोग अपनी रक्षा के निमित्त उसे पुकारते हैं। वह इस विश्व से श्रेष्ठ है। वह च्युत न होने वाले लोगों को च्युत कर देता है, क्योंकि वह शौर्य तथा वीर्य का प्रतीक है।'' पुरुरवा के प्रेम-प्रसंग में विरह से दुःखी पुरुरवा के कथन में विप्रलम्भ शृङ्गार का उत्कृष्ट निदर्शन है- इषु॒र्न श्रिय॑ इषु॒धेरस॑ना॒ गोषाः॑ श॒तसा॒ न रंहिः॑। अ॒वीरे॒ क्रतौ॒ वि द॑विद्युत॒न्नोरा॒ न मा॒युं चि॑तयन्त॒ धुन॑यः॥३॥ (ऋ० १०/९५/३) “हे उर्वशी, मेरा बाण तरकस में फेंके जाने में असमर्थ होकर लक्ष्मी को नहीं प्राप्त कर पाता। अतः वेग से युक्त होकर मैं शत्रुओं की गायों को भोक्ता नहीं हो पाता। यज्ञकर्म में या शक्तिमान कार्य में मैं प्रकाशशील नहीं होता। मेरे योद्धा, विस्तार वाले युद्ध में मेरे सिंहनाद का श्रवण नहीं कर पाते।'' अलङ्कार - वैदिक कार्य में अलंकारों का भी यथोचित प्रयोग उपलब्ध होता है। अलंकारों का कहीं भी खींच-तान कर प्रयोग नहीं हुआ है वे सर्वत्र स्वाभाविक रूप से उपस्थित हुए हैं। वैदिक कवियों का प्रिय अलंकार उपमा है- अभ्रा॑तेव॒ पुंस॒ एति॑ प्र॒तीची॒ गर्ता॒रुगिव॒ सन॑ये॒ धना॑नाम्। जा॒येव॒ पत्य॑ उश॒ती सु॒वासा॑ उ॒षा ह॒स्रेव॒ नि रि॑णीते॒ अप्सः॑॥ (ऋ० १/१२४/७) 'उषा कभी भ्रातृरहित बहन के सदृश अपने दायभाग को ग्रहण करने के लिए
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Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri द्वितीय अध्याय 63 पितृस्थानीय सूर्य के समीप जाती है, तो कभी वह रमणीक वस्त्र धारण करके पति को अपने प्रेम पाश में आबद्ध करने के लिए मचलने वाली सुन्दरी के समान पति के सम्मुख स्वसौन्दर्य को प्रकट करती है।' छन्द :- वैदिक ऋषियों की वाणी छन्दों के रूप में प्रकट हुई। इसीलिए वैदिक ऋषियों की दृष्टि में छन्दों का अत्यधिक महत्त्व था। ऋग्वेद में (१०-११४/५) 'छन्दांसि' शब्द आया है। यजुर्वेद ४-२४, ८-४७, १२-५, १३-५३ आदि कई स्थलों पर छन्द शब्द ही नहीं, छन्दों के नामों तक का उल्लेख हुआ है। गायत्री छन्द, त्रिष्टुप छन्द, जगती छन्द, अनुष्टुप छन्द आदि प्रसिद्ध छन्दों के अतिरिक्त यजुर्वेद १४-९, १०- १८ में मा, प्रमा, पंक्ति, उष्णिफ्, बृहती, विराट् तथा १५-४-५ में वरिवः, शंभु, परिभू, ककुप, काव्य, अक्षर-पंक्ति, पद-पंक्ति, विष्टार-पंक्ति आदि अनेक छंदों के नाम आते हैं। इस प्रकार वैदिक ग्रन्थों का साहित्यिक महत्त्व स्पष्ट हो जाता है। वैदिक छन्द भारतीय काव्यउपवन के आदि प्रसून हैं। किन्तु, इसके साथ यह भी ध्यातव्य है कि लौकिक साहित्य से वैदिक साहित्य की चारुता नितान्त भिन्न प्रकार की है। (ख) भाषा विज्ञान की दृष्टि से महत्त्व :- भाषा के वैज्ञानिक अध्ययन के लिए भी वेद अत्यन्त महत्त्वपूर्णशाली है। वैदिक साहित्य में भाषा के उद्भव तथा विकास को जानने के लिए विपुल सामग्री विद्यमान है। आधुनिक भाषा विज्ञान का उद्भव ही तब हुआ, जब विदेशी विद्वानों ने वेदों के विषय में जानकारी प्राप्त की। विश्ववाङ्मय में शायद शतपथ ब्राह्मण ही स्वराङ्कित गद्य का उदाहरण प्रस्तुत करता है। भाषा के साथ बलाघात के साहचर्य की आवश्यकता के अध्ययन हेतु इससे श्रेष्ठ क्षेत्र मिलना सम्भव नहीं। मानवीय सभ्यता तथा संस्कृति के विकास में भाषा विशेष महत्त्वपूर्ण रही है। सभ्यता के साथ ही भाषा के विकास के लिए वैदिक वाङ्मय का अध्ययन अत्यावश्यक है। श्री T. Burrow ने अपने ग्रन्थ The Sanskrit Language में लिखा है- 'The discovery of the Sanskrit Language by European Scholars at the end of the eighteenth century was the starting point from which developed the study of the comparative philology of the Indo-European languages and eventually the whole science of modern linguistics.' आधुनिक भाषा तत्त्व का समस्त विज्ञान संस्कृत भाषा के ऊपर अवलम्बित है। अठारहवीं शताब्दी के अन्त में पश्चिमी विद्वानों के द्वारा संस्कृत भाषा का अन्वेषण ही ऐसा बिन्दु था जहाँ से भारोपीय भाषाओं के तुलनात्मक भाषा विज्ञान के अध्ययन का श्रीगणेश हुआ था तथा पुनः इसी से समस्त आधुनिक भाषा विज्ञान का जन्म हुआ।' CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
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संस्कृत के पूर्व यूरोपीय भाषाशास्त्रियों में आदिम भाषा के सम्बन्ध में मतवैभिन्न्य था। कोई ग्रीक को, कोई लैटिन को, कोई हिब्रू को विश्व की प्राचीनतम भाषा स्वीकार करता था। संस्कृत के ज्ञान होने के साथ ही इस विवाद का समापन हो गया। सभी आर्य-भाषा को विश्व की प्राचीनतम भाषा मानने लगे। पं० बलदेव उपाध्याय जी ने संस्कृत शब्दों के अर्थ परिवर्तन के कारण स्वरूप के विषय में विशेष सामग्री प्रस्तुत की है। उनका कथन है— "वैदिक भाषा की लौकिक भाषा के साथ तुलना करने पर अनेक मनोरंजक बातें दृष्टिपथ में आती हैं। भाषाशास्त्र का यह एक सामान्य नियम है कि भौतिक अर्थ में व्यहृत होने वाले शब्द कालान्तर में आध्यात्मिक अर्थ में प्रयुक्त होने लगते हैं। पार्थिव जगत् से हटकर वे सुदूर मानसिक जगत् की वस्तुओं की सूचना देते हैं। वेद इस विषय में बहुत से रोचक उदाहरण उपस्थित करता है। इन्द्र की स्तुति के प्रसङ्ग में गृत्समदऋषि की अन्तःदृष्टि पुकार कर कह रही है— "यः पर्वतान् प्रकुपितां अरम्णात्" अर्थात् इन्द्र ने चलायमान पर्वतों को स्थिर किया। यहाँ कुप् तथा रम् धातु के प्राचीन अर्थ का ऊहापोह भाषादृष्टि से नितान्त उपदेशप्रद है। कुप् धातु का मौलिक अर्थ है भौतिक संचलन और रम् धातु का अर्थ है स्थिरीकरण, चञ्चल पदार्थ को निश्चल बनाना। कालान्तर में इन धातुओं ने अपनी दीर्घ जीवन यात्रा में पलटा खाया। सबसे अधिक मानसिक विकार उस दशा में उत्पन्न होते हैं जब हम क्रोध के वशीभूत होते हैं। हम उस दशा में अपने मन के भीतर विचित्र प्रकार की प्रखर चञ्चलता का अनुभव पद्- पद पर करते हैं। अतः अर्थ की समता के बल पर "कोप" शब्द भौतिक जगत् से ऊपर उठकर मानस स्तर तक अनायास पहुँच जाता है। आधुनिक संस्कृत में यदि यह कहें "कुपितोमकरध्वजः" तो वाक्यपदीय के मन्तव्यानुसार कोप रूपी 'लिङ्ग' की सत्ता के कारण मकरध्वज से अभिप्राय "काम" से समझा जाता है और 'समुद्र' का अर्थ लक्षणया ही बोधित किया जा सकता है। 'रम्' का अर्थ है भौतिक स्थिरीकरण, परन्तु धीरे-धीरे इस शब्द ने भौतिक भाव को छोड़कर मानस भाव से अपना सम्बन्ध स्थापित कर लिया है। खेल तमाशों में चंचल चित्त स्थिर हो जाता है, क्योंकि उसे इन वस्तुओं में एक विचित्र प्रकार के आनन्द का संचार होता है। यही कारण है कि आजकल 'रम्' का प्रयोग क्रीड़ा अर्थ में किया जाता है। प्रचलित भाषा के प्रयोगों में कभी-कभी प्राचीन अर्थ की भी झलक आ जाती है। "क्रीडायां रमते चित्तम्" (क्रीडा में चित्त रमता है।) यहाँ रमते का लक्ष्य स्थिरीकरण के लिए स्पष्ट प्रतीत होता है।" अतः संस्कृत शब्दों के अर्थ-परिवर्तन के ज्ञानार्थ वैदिक साहित्य एवं भाषा का चिन्तन तथा मनन परमावश्यक है। वैदिक साहित्य तथा वैदिक भाषा के
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Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri द्वितीय अध्याय 65 विश्लेषण के बिना भाषा-विज्ञान सम्बन्धी जानकारी अधूरी रह जाती है। (ग) अर्थशास्त्रीय ज्ञान की दृष्टि से महत्त्व :- अर्थशास्त्र के नियमों तथा सिद्धान्तों के निर्धारण में वेदों से अत्यधिक सहायता प्राप्त हो सकती है। वैदिक वाङ्मय में समाज में अर्थव्यवस्था के सम्बन्ध में समाजवाद, साम्यवाद अथवा पूँजीवाद के स्थान पर धर्मानुगत दृष्टि का प्राधान्य दृष्टिगोचर होता है। वेदों में धन की परिभाषा, गतियाँ, विभाजन तथा विकेन्द्रीकरण के विषय में महत्त्वपूर्ण जानकारी उपलब्ध होती है। वेद में धन के लिए श्री तथा लक्ष्मी के अतिरिक्त वसु, अन्न, राधः, रयि आदि शब्दों का प्रयोग हुआ है। धन की तीन गतियाँ बतलाई गई हैं- दान, भोग तथा विनाश। यजुर्वेद के ४०वें अध्याय के प्रथम मन्त्र में कहा गया है कि "तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा" अर्थात् त्यागमय भोग करो। धन का एक ही स्थल पर एकत्रीकरण वेदों में अनुचित तथा असङ्गत बतलाया गया है। व्यापारी-वर्ग मनुष्य को क्षुधातुर तथा तृषातुर न कर सके, इस विषय पर वैदिक विद्वान् सदैव सचेष्ट दिखलाई देते हैं। अनेक स्थलों पर तथा मन्त्रों में शोषण तथा शोषकों के दमन के उपाय बतलाए गए हैं। वेदानुसार अधिक धन नाश का कारण होता है। किसी समय धन की मात्रा इतनी अधिक हो जाती है कि वह मनुष्य के उपभोग में नहीं आ पाती। अनुपयोग की दशा में धन मानव के पतन का कारण हो जाता है। वेद के अनुसार :- या मां ल॒क्ष्मीः प॑तया॒लूरजु॑ष्टाभि॒चस्क॒न्द वन्द॑नेव वृ॒क्षम्। अ॒न्यत्रा॒स्मत् स॑वितु॒स्तामि॒तो धा॒ हिर॑ण्यहस्तो॒ वसु॑ नो॒ ररा॑णः॥ (अथर्व० ७/११५/२) "प्रभु हिरण्यहस्त हैं। ऐश्वर्य, स्वर्ण, हितकर तथा रमणीय स्वरूप उनके करों में दीप्ति हो रहा है। वे ही इसका वितरण तथा विभाजन प्राणि वर्ग में कर रहे हैं। किन्तु जो धन जीवधारियों के पास असेवित है, उपयोग से परे है तथा अंततः पतन की ओर प्रवृत्त करने वाला है, उसे मनुष्य को स्वयं अभीप्सित व्यक्ति तथा स्थान के पास पहुँचा देना चाहिए। यह कदापि नहीं होना चाहिए कि एक व्यक्ति क्षुधाग्रस्त होकर प्राण गवाँ दे तथा दूसरी जगह अतिरिक्त धन व्यक्ति के विनाश का कारण बन जाये।" वेदों में पणि नामक अर्थ पिशाच व्यापारी का वर्णन आया है, जो गो इत्यादि चल आवश्यक वस्तुओं को छिपा देता था तथा उस अभाव की स्थिति से अधिक लाभ उठाता था; इन्द्र देव ने उसके भण्डार गृहों पर आक्रमण करके आवश्यक वस्तुएँ जनसाधारण को उपलब्ध कराईं। CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
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66 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता (घ) राजनैतिक दृष्टि से महत्त्व :- राजनैतिक दृष्टि से भी वेदों का महत्त्व न्यून नहीं है। इस दृष्टिकोण से भी वेद प्रचुर उपयोगिता से युक्त है। वेदों में युद्ध, राज्य- व्यवस्था, सैनिक एवं सेनापति के गुण, सेना की स्थिति तथा व्यूह रचना, विश्वासघाती से बचने के उपाय, विभिन्न शासन-प्रणालियों, संस्थाओं तथा सिद्धान्तों का वर्णन उपलब्ध होता है। ऋग्वेद में सभा तथा समिति नामक दो विशिष्ट संस्थाओं का उल्लेख है, जो प्रजातन्त्र की सफलता के लिए आवश्यक है। अथर्ववेद में सामान्य जनता द्वारा राजा के चुनाव की बात कही गई है— त्वां विशो॑ वृणतां राज्या॒य त्वामि॒माः प्र॒दिशः॒ पञ्च॑ दे॒वीः। वर्ष्म॑न् राष्ट्रस्य॑ क॒कुदि॑ श्रयस्व॒ ततो॑ न॒ उग्रो वि भ॑जा॒ वसू॑नि॥ (अथर्व० ३/४/२) “प्रजा राजा का वरण करती है, उसका चुनाव करती है। पंच जन, पाँच प्रकार की जनता, ज्ञानी, बली, श्रमी तथा असभ्य वर्ग द्वारा निर्वाचित सम्राट राष्ट्र के सिंहासन पर सुशोभित होता है। वह उग्रता, तेजस्विता तथा वीरता से सम्पन्न होता है। राजा के पास धनागमन तो होता ही है, किन्तु वह उस धन को प्रजा की सम्पत्ति समझता है तथा जनता की भलाई के कार्यों में व्यय करता है। इस प्रकार प्रजा की सम्पत्ति, प्रजा में विभाजित होकर प्रजा को प्राप्त हो जाती है।” यजुर्वेद (९/४० तथा १०/१८) में 'महते क्षत्राय, महते ज्यैष्ठाय, महते जान राज्याय' शब्दों का उल्लेख है, जो प्रजातन्त्र की स्पष्ट सूचना प्रदान करते हैं। ऋग्वेद में राजा द्वारा शासन करने की विधि तथा व्यवस्था पर प्रकाश डाला गया है। सामान्यतः “त्रीणि राजानां विदथे पुरुणि” (ऋ० ३/३८/६), राजा राज्य की शासन व्यवस्था को सुचारु रूप से चलाने के लिए तीन प्रकार की संस्थाओं का निर्माण करता है। प्रथम संस्था का कार्य आन्तरिक उपद्रवों का दमन करना तथा बाहरी हमलों से देश को बचाना होता है। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए सेना आवश्यक है। द्वितीय संस्था न्याय का कार्य करती है। यह दो भागों में विभाजित है। एक में विवादों का निर्णय होता है तथा दूसरे में दोषी व्यक्ति को दिए गए दण्ड का क्रियान्वयन। इस कार्य के लिए न्यायाधीश तथा रक्षक-वर्ग की नियुक्ति की जाती है। तीसरा विभाग प्रजा की शिक्षा तथा अर्थव्यवस्था का प्रबन्ध करता है। अथर्ववेद के १५वें काण्ड में “तं सभाच समितिश्च सेना च" शब्दों द्वारा ही इन्हीं तीन प्रकार की संस्थाओं का संकेत किया जाता है। प्रो० अल्तेकर, डॉ० काशी प्रसाद जायसवाल, डॉ० बेनी प्रसाद, डॉ० श्यामलाल पाण्डेय आदि वेदज्ञों ने राजनीति के दृष्टिकोण से वेदों का
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द्वितीय अध्याय 67 पर्यास चिन्तन, अध्ययन तथा मनन करके यह निष्कर्ष दिया कि उनमें इस विषय पर विपुल सामग्री विद्यमान है। (च) ऐतिहासिक दृष्टि से महत्त्व :- निःसन्देह ऐतिहासिक दृष्टि से वेदों का महत्त्व अपूर्व है। केवल भारतवर्ष के आदिकालिक ऐतिहासिक तत्त्वों के ज्ञानार्थ ही नहीं, बल्कि सम्पूर्ण विश्व के इतिहास के महत्त्वपूर्ण तथ्यों की जानकारी के लिए भी वैदिक वाङ्मय विशेष उपयोगी है। युद्धों, स्वअस्तित्व को स्थैर्य प्रदान हेतु किए गए संघर्षों, सम्राटों, अनेक राज्य-सत्ताओं के परिवर्तन के लिए की गई क्रान्तियों, वैचारिक विवादों आदि के विषय में उपयोगी संकेतों की वैदिक ग्रन्थों में प्रचुरता है। (द) वैज्ञानिक दृष्टि से महत्त्व :- आधुनिक युग में विज्ञान विभिन्न भागों में विभक्त होकर अनेक प्रकार के अन्वेषणों से विश्व के जनमानस को आश्चर्यचकित कर रहा है। उसने पृथ्वी के बाहर तथा भीतर दोनों भागों में छिपे हुए तत्त्वों की खोज की। प्रकाश, ध्वनि तथा नवीन ग्रहों के विषय में खोज के द्वारा नवीन मान्यताएँ स्थापित की जा रही हैं, किन्तु महर्षि दयानन्द ने अपनी ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका में सप्रमाण सिद्ध किया है कि वेद में विज्ञान के इन आविष्कारों का आधार विद्यमान है। इसीलिए वेदों को विद्वानों ने "सृष्टि विज्ञान" के नाम से अभिहित किया है। वेद में चन्द्र, मंगल, शुक्रादि ग्रहों की विशेषताएँ वर्णित हैं। यथा निम्नलिखित ऋग्वेद के मंत्र में मंगल का वैशिष्ट्य वर्णित है- "अग्निर्मूर्धा दिवः ककुत्पतिः पृथिव्या अयम्। अपां रेतांसि जिन्वति।। (ऋग्वेद ८/४४/१६) मंत्र से पूर्णतया स्पष्ट है कि मंगल पृथ्वी का भाग है, आग्नेय है तथा अरुणवर्णी है। विज्ञान द्वारा भी मंगल के सम्बन्ध में यही निष्कर्ष निकाला गया है। वर्तमान भौतिक शास्त्र की मान्यतानुसार सूर्य यदि हिरण्यगर्भ का जाज्वल्यमान अंश हैं, तो सूर्य के प्रस्फुटित भागों में शुक्र भी है। निम्नलिखित वेद मंत्र में भी शुक्र सम्बन्धी अनेक तथ्यों को प्रकट किया गया है- "अन्ना॑त् परि॑स्रुतो रसं॒ ब्रह्म॑णा॒ व्यपिबत् क्ष॒त्रं पयः॒ सोमं॑ प्र॒जाप॑तिः। ऋ॒तेन॑ स॒त्यमि॑न्द्रि॒य विपा॑नं शु॒क्रमन्ध॑स॒ऽ इन्द्र॑स्येन्द्रि॒यमि॒दं पयो॒ऽमृतं मधु॑।।" (यजु० १९-७५) सूर्य सौर जगत् का प्रजापति तथा सौर जगत् उसकी प्रजा है। सूर्य अपने चतुर्दिक
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Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 68 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता भ्रमण करने वाले पृथ्वी, मंगल तथा शुक्रादि ग्रहों का पूर्वज है। वह ब्रह्म के साथ पके हुए अन्न के रस को पीता है। यह अन्न सोम है। यजुर्वेद का पुरुष सूक्त चन्द्रोत्पत्ति को यज्ञ पुरुष के मन से तथा सूर्योत्पत्ति को यज्ञ पुरुष के चक्षु से मानता है। चक्षु तथा सूर्य का सम्बन्ध वैज्ञानिक भी स्वीकार करने लगे हैं तथा मन का और चन्द्रमा का सम्बन्ध मनोवैज्ञानिक भी स्वीकार करेंगे। वेदों में यज्ञ की प्रमुखता है। यज्ञों से ही आयुर्विज्ञान का प्रादुर्भाव हुआ। वेदों में अनेक औषधियाँ वर्णित है जो विभिन्न रोगों को दूर करने में समर्थ है। ऋक् संहिता (१०/९७) औषधि सूक्त के नाम से प्रसिद्ध है। यजुर्वेद में १२वें अध्याय में मंत्र ७५ से लेकर मंत्र १०१ तक औषधि प्रकरण है। वेद में अश्विनीकुमार देवताओं के वैद्य के नाम से प्रसिद्ध हैं। वे वृद्ध को युवा तथा लंगड़े को चलने के योग्य बना सकते हैं। इस उपर्युक्त विवेचन से यह स्पष्ट है कि आधुनिक विज्ञान के अनेक सिद्धान्त वेद सम्मत तथा वेदों की अनेक मान्यताएँ विज्ञान सम्मत हैं। अतः वैज्ञानिक दृष्टि से भी वेद विशेष महत्त्व वहन करते हैं। (ज) तुलनात्मक देवशास्त्र तथा पुराण कथाओं के विश्लेषण की दृष्टि से महत्त्वः- वेदों के अध्ययन से इस विषय में भी पर्याप्त सहायता प्राप्त हुई है। अनेक पौराणिक कथाओं का बीज वेदों में निहित है। वेदों के संवादसूक्त अनेक पौराणिक तथा साहित्यिक कथानकों के जन्मदाता है। यथा— पुरूरवा-उर्वशी संवाद। इस संवाद का आधार लेकर गुणाढ्य की बृहत्कथा में कथा उपनिबद्ध की गई है। कालिदास कृत विक्रमोर्वशीय नाटक का आधार वेदों का यही पुरूरवा-उर्वशी संवाद है। मैक्डानल, हिल्लेब्रान्डर, कीथ, सम्पूर्णानन्द आदि के प्रयास इस प्रसंग में उल्लेखनीय है। उपसंहार हमारे धर्म, दर्शन, समाज, राजनीति, इतिहास, भाषा, कला, साहित्य तथा विज्ञान आदि पर वेदों का अत्यधिक प्रभाव परिलक्षित होता है। वेदों ने मार्गदर्शन किया तथा हम उसके द्वारा निर्दिष्ट मान्यताओं का अनुकरण करने लगे। वेद में बीज निहित है। शाखा, पत्र तथा पुष्पों में उसे पल्लवित करना मनुष्य का कार्य है। वेद के इस महत्त्व को पाश्चात्य मनीषियों ने भी मुक्तकण्ठ से स्वीकार किया है, जिनमें मैक्समूलर, ग्रिफिथ, कोलब्रुक, राथ, मैक्डानल, पीटर्सन आदि उल्लेखनीय हैं। विन्टरनिट्ज के अनुसार "If we wish to learn, to understand the beginnings of our own culture, we must go to India where the oldest literature of an Indo- European people is preserved." CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
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द्वितीय अध्याय 69 मैक्समूलर जर्मनी मे उत्पन्न हुआ और इंग्लैण्ड में जाकर रहने लगा। उसने संस्कृत साहित्य का अध्ययन करके वेदों के प्रति अपनी निष्ठा को निम्नलिखित पंक्तियों में प्रकट किया— "I maintain that for a study of man, there is nothing in the world equal in importance with the 'Veda'. I maintain that to every body who cares for himself, for his ancestors, for his history or for his intellectual development, a study of Vedic Literature is indispensable." "To the present day India acknowledges no higher authority in the matters of religion, ceremonials, customs and law than the Veda." वस्तुतः भारतीयों का जन-जीवन वेदों की मान्यताओं से आपूर्ण है। जन्म से लेकर देहान्त तक के समस्त भारतीय संस्कार वेद सम्मत हैं। वस्तुतः वेद हिन्दू धर्म तथा दर्शन के आशा केन्द्र हैं। हिन्दू-संस्कृति तथा सभ्यता के आधार स्तम्भ हैं। हिन्दुत्व की भावना के आलोक हैं। माननीय रामगोविन्द जी त्रिवेदी ने वेदों की विशुद्ध वाणी के समर्थन में विद्वानों का यह अंश उद्धृत किया है— वेद ईश्वर की विमल वाणी है और विश्व के उद्धार के लिए ही उसका अवतरण हुआ है। वैदिक-वाङ्मय पारिजात से भी अधिक सुगन्धमय और स्फटिक मणि से भी अधिक शुभ्र है। वेद के किसी मन्त्र में कुरुक्षेत्र का भैरव-रव है, किसी में वीरों की सी भयंकर हुंकार है, किसी में रण-चण्डी का प्रचण्ड अट्टहास है, किसी में समर-भूमि का विकट रणत्कार है, किसी में लक्ष्मी का मधुर- हास्य है, किसी में वृन्दावन का प्रेम-प्रवाह है, किसी में दिव्य शक्ति का नवल-नृत्य है और किसी में ब्रह्मदेव का ललित-विलास है। 'श्रुतिभगवती' जिसे छू देती है, वह अमृत से भी अधिक प्रिय बन जाता है और जिसके ऊपर पैर रख देती है, वह पद्मराग-मणि से भी मूल्यवान हो जाता है। वस्तुतः वेद अलौकिक हैं, महान् हैं, अद्भुत हैं, अमूल्य-निधि के सदृश हैं। उनका प्रत्येक मन्त्र, प्रत्येक ऋचा तथा प्रत्येक पद अपना विशेष महत्त्व रखता है। वेदों के शब्दों के महत्त्व के विषय में श्रीरामगोविन्द जी त्रिवेदी का मत है कि— "वेद का प्रत्येक शब्द बाह्य तत्त्वों से विमुक्त और योग की प्रक्रिया से विशुद्ध है। इस विशुद्धीकरण के कारण ही वेद के प्रत्येक शब्द में दिव्य शक्ति निहित है। वेद का प्रत्येक शब्द तपःपूत योगियों और महर्षियों की विमल समाधि में उपलब्ध अनन्त शक्तिमन्त्र है। फलतः प्रत्येक वेद-मन्त्र में रहस्य भरा पड़ा है। कमी है केवल इस रहस्य को समझने वाले तपस्वी तथा अधिकारी पुरुषों की।"
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70 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता अतः विभिन्न दृष्टियों से वेदों का असाधारण महत्त्व सिद्ध होता है। इसीलिये उनका अध्ययन, मनन तथा संग्रहण परमावश्यक है। वेदाध्ययन की आवश्यकता का निरूपण करते हुए पं० बलदेव उपाध्याय जी ने निम्नलिखित शब्दों में अपने विचार प्रकट किए हैं— भारतीय संस्कृति के इतिहास में वेदों का स्थान नितान्त गौरवपूर्ण है। श्रुति की दृढ़ आधारशिला के ऊपर भारतीय धर्म तथा सभ्यता का भव्य विशाल प्रासाद प्रतिष्ठित है। हिन्दुओं के आचार-विचार, रहन-सहन, धर्म-कर्म को भली भाँति समझने के लिए वेदों का ज्ञान विशेष आवश्यक है। हम ईश्वर विरोध को सहन कर सकते हैं, परन्तु वेदों का आंशिक विरोध भी हमारी दृष्टि में नितान्त वर्जनीय है। "आस्तिक" वही है जो वेद की प्रामाणिकता में विश्वास रखे तथा "नास्तिक" वही है जो वेदों की निन्दा करे। अतः वेद का अनुशीलन प्रत्येक भारतीय का आवश्यक कर्त्तव्य होना चाहिए।
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri तृतीय वेद का काल निरूपण वेद आर्य-धर्म एवं दर्शन की आधारशिला हैं; मानवता के मूल हैं। मानव सभ्यता के विकास के अति प्राचीन काल से ही वैदिक शिक्षाएँ मानव मात्र को असत् से सत् की ओर प्रेरित करती रही है। भारतीय सभ्यता के प्राचीनतम स्वरूप के ज्ञानार्थ वेद नितान्त उपयोगी हैं। वेदों के गौरव तथा महत्त्व के विषय में वेदज्ञ एकमत हैं। इसके विपरीत वेदों के रचनाकाल के विषय में वेदज्ञ एकमत नहीं हैं, अपितु उनमें गहरा मतभेद है। इस वैदिकआलोक से कब भारत भूमि आलोकित हो उठी ? कब हमारे पूर्वज ऋषियों के हृदय रूपी मानसरोवर में वेद-हंस विचरण करने लगा ? कब हमारे पवित्र ऋषियों के हृदय में मानव मात्र के कल्याणार्थ वैदिक सन्देश प्रदान करने की सदिच्छा जागृत हो उठी? आदि प्रश्न आज भी अत्यन्त विचारणीय है, विवादास्पद हैं। विद्वानों का विचार है कि भविष्य में भी इन प्रश्नों का सर्वमान्य समाधान उपलब्ध हो जायें, ऐसी सम्भावना अत्यल्प है। इसके हल को ढूँढ निकालना आसान नहीं, तथापि पाश्चात्य तथा पौरस्त्य वेद के विद्वानों ने वेदों में उपलब्ध अन्तरंग तथा बहिरंग प्रमाणों के आधार पर कतिपय अनुमान प्रस्तुत किए हैं। इनमें से किसी एक को सत्य मानना न्यायसंगत नहीं, किन्तु विद्वानों के प्रयास श्लाघनीय अवश्य हैं। इस सम्बन्ध में विद्वानों के मतों को सात प्रकार का कहा जा सकता है, वे सात प्रकार हैं- (१) प्राचीन भारतीय परम्परा पर आधृत मत। (२) मैक्समूलर का मत, (३) ज्योतिष सम्बन्धी तथ्यों पर आधृत मत। (४) भाषा सम्बन्धी तथ्यों पर आधृत मत। (५) इतिहास सम्बन्धी तथ्यों पर आधृत मत। (६) शिला लेखों पर आधृत मत। (७) भूगर्भ सम्बन्धी तथ्यों पर आधृत मत। इन उपर्युक्त मतों का विस्तृत विवेचन निम्नलिखित है- (१) प्राचीन भारतीय परम्परा पर आधृत मतः प्राचीन भारतीय परम्पराओं के अनुसार वेदों को ईश्वरीय ज्ञान माना जाता है। वैदिक ज्ञान शाश्वत है तथा सृष्टि की उत्पत्ति के प्रारम्भिक काल में ईश्वर ने वैदिक ज्ञान का आविर्भाव किया। वेदान्त दर्शन भी वेद को अनादि तथा अपौरुषेयज्ञान मानता है। उसके अनुसार यह ज्ञान प्रलयोपरान्त भी नष्ट नहीं होता तथा पुनः सृष्ट्यारम्भ में ईश्वर के द्वारा CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 72 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता प्रकट किया जाता है। वैदिक ज्ञान ठीक उसी प्रकार अनादि, अनन्त एवं अविनश्वर है, जिस प्रकार ईश्वर स्वयं अनादि, अनन्त तथा अविनश्वर हैं। सृष्टि की रचना के पश्चात् ईश्वर द्वारा यह ईश्वरीय ज्ञान ऋषियों के हृदयों में आलोकित होता है। तत्पश्चात् गुरु-शिष्य की अविच्छिन्न परम्परा अथवा शृङ्खला के द्वारा समस्त जगत् में प्रचलित हो जाता है। जगत् के प्रलयोपरान्त वह ज्ञान पुनः ईश्वर में समाहित हो जाता है। आधुनिक काल में ऋषि दयानन्द ने वेदों के उद्भव पर सप्रमाण विचार किया है। उनके मत में भी वेद अपौरुषेय हैं, ईश्वरीय कृति हैं, जिनका ज्ञान सृष्ट्यारम्भ में ईश्वर द्वारा मानव मात्र के मंगलार्थ ऋषियों के मन में प्रस्फुटित किया गया। सृष्टि की उत्पत्ति १९६०८५२९६६ वर्ष पूर्व हुई थी। ईश्वरप्रणीत ये वेद भी उसी काल में आविर्भूत हुए थे, अतः उतने ही पुरातन हैं। वेदों के ईश्वर प्रणीत होने के विषय में वेदों में तथा तदुपरान्त उपलब्ध साहित्य में अनेक प्रमाण प्राप्त होते हैं। नीचे वे मन्त्र प्रस्तुत किए जा रहे हैं, जो वेदों को ईश्वरकृत सिद्ध करने में प्रमाण स्वरूप हैं। तस्मा॑द्य॒ज्ञात्स॑र्व॒हुत॒ ऋचः॒ सामा॑नि जज्ञिरे। छन्दां॑सि जज्ञिरे॒ तस्मा॒द्यजु॒स्तस्मा॑दजायत।।९।। (ऋ० १०/९०/९, यजु० ३१/७) अर्थात् उस सर्वहुत यज्ञ से ऋचाएँ (ऋग्वेद), साम (सामवेद) उत्पन्न हुए, उससे गायत्री आदि छन्द उत्पन्न हुए तथा उससे यजुष् (यजुर्वेद) उत्पन्न हुआ। तथा यस्मा॒दृचो॑ अपा॒तक्ष॒न् यजुर्यस्मा॑द॒पाक॑षन्। सामा॑नि॒ यस्य॒ लोमा॒न्यथ॑र्वाङ्गिरसो मुखं॑ स्क॒म्भं तं ब्रू॑हि कत॒मः स्विदे॒व सः॥ (अथर्व० १०/७/२०) अर्थात् जिससे ऋक् मन्त्रों को उन्होंने सूक्ष्म किया, जिससे यजुः ज्ञान को उन ऋषियों ने कसौटी पर रखा, सामविद्या जिसके रोम हैं तथा अथर्वमन्त्र मुख हैं, (वह कौन सा स्कम्भ है ? तू कह दे) इस प्रकार से ऋग्वेद, यजुर्वेद तथा अथर्ववेद में स्पष्टतः वेदों को ईश्वर से उत्पन्न बतलाया गया है। ब्राह्मण, आरण्यक, उपनिषद्, दर्शन, स्मृति आदि ग्रन्थों में भी वेदों को ईश्वरकृत कहा गया है। CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
२. अध्याय ३-४: गुरुकुल दिनचर्या, स्वाध्याय, स्मृति-संवर्धन एवं मौखिक शिक्षण विधि
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द्वितीय अध्याय 73 "तेभ्यस्तपस्तेभ्यस्त्रयो वेदा अजायन्ताग्नेर्ऋग्वेदो, वायोर्यजुर्वेदः सूर्यात्सामवेदः।" (श०ब्रा० ११/५२/३) अर्थात् उन सातों से तीन वेद उत्पन्न हुए, अग्नि से ऋग्वेद उत्पन्न हुआ, वायु से यजुर्वेद उत्पन्न हुआ तथा सूर्य से सामवेद की उत्पत्ति हुई। तथा "अग्निवायुरविभ्यस्तु त्रयं ब्रह्म सनातनम्। दुदोह यज्ञसिद्ध्यर्थमृग्यजुः सामलक्षणम्॥" (मनु० २/१५१) इस प्रकार भारतीय परम्परानुसार वेदों की उत्पत्ति जगत् की संरचना के साथ हुई। (२) अर्वाचीन एवं पाश्चात्य विद्वानों का मत :- भारतीय विचारधारा तो वेदों को ईश्वरकृत मानती है किन्तु आधुनिक युग की ऐतिहासिक दृष्टि जो विकासवाद के सिद्धान्त पर विश्वास करती है, इस भारतीय विचार परम्परा को स्वीकार करने में सहमत नहीं होती। वैदिक साहित्य के अध्येता अनेक पाश्चात्य मनीषियों ने ऋग्वेद को सर्वप्राचीन मानकर उसके काल निर्धारण का प्रयत्न किया है। इन विद्वानों का विचार है कि प्रत्यक्ष तथा सबल प्रमाणों के अभाव में ऋग्वेद के समय को पूर्णतः सत्य निश्चित नहीं किया जा सकता। हो सकता है कि उस अनुमान में कतिपय शताब्दियों का अन्तर रह जाय। पाश्चात्य आलोचकों का अनुकरण करने वाले भारतीय आलोचकों ने भी वेदों के काल निर्धारण का प्रयत्न किया है तथा ये ऋग्वेद के काल को पाश्चात्य आलोचकों की अपेक्षा अधिक प्राचीन समय तक खींच ले गए। इस स्थल पर ऋग्वेद की रचना के सम्बन्ध में विभिन्न विद्वानों के मतों को उद्धृत किया जा रहा है। (३) मैक्समूलर का मत :- इंग्लैण्ड की "Sacred books of the east" नामक ग्रन्थमाला के अन्तर्गत मैक्समूलर द्वारा सम्पादित ऋग्वेद (शाकल शाखा) को प्रकाशित किया गया था। यह ग्रन्थ १८५९ ई० के लगभग प्रकाशित हुआ। इस ग्रन्थ के भूमिका भाग में मैक्समूलर द्वारा ऋग्वेद के काल को निश्चित करने का प्रयास कया गया है। इनके अनुसार ऋग्वेद की रचना १२०० वि० पूर्व में सम्पन्न हुई। अपने मत की पुष्टि करने के लिए मैक्समूलर ने कहा कि गौतम बुद्ध के समय तक वैदिकसाहित्य की रचना पूर्ण हो चुकी थी। वैदिक साहित्य को उन्होंने चार भागों
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74 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता में विभक्त किया। वे भाग हैं— छन्द, मन्त्र, ब्राह्मण एवं सूत्र। उनका कथन है कि प्रत्येक भाग के विकास का एक निश्चित समय रहा होगा। सर्वप्रथम छन्दों, तत्पश्चात् मन्त्रों, तदुपरान्त ब्राह्मणों एवं उसके बाद सूत्रों की रचना हुई। मैक्समूलर के विचार में प्रत्येक विभाग के विकास में तथा उसकी पूर्णता के लिए २०० वर्षों का समय पर्याप्त है। गौतम बुद्ध का आविर्भाव काल विक्रम से लगभग ५०० वर्ष पूर्व हुआ। अतः सूत्र काल का प्रारम्भ ६०० वि० पूर्व माना गया है। इन सूत्रों में प्रमुख रूप से श्रौत सूत्रों तथा गृह्य सूत्रों की गणना की जाती है। इन सूत्रों की रचना से २०० वर्ष पूर्व अर्थात् ८०० वि० पूर्व ब्राह्मणों की रचना हुई। इस काल में ही याज्ञिक अनुष्ठानों का विस्तार तथा उपनिषदों के आध्यात्मिक सिद्धान्त का विवेचन हुआ। उससे २०० वर्ष पूर्व मन्त्रों की रचना हुई। वेदों को दो भागों में विभाजित किया जा सकता है— छन्द तथा मन्त्र। मन्त्रों का विनियोग यज्ञीय अनुष्ठानों में किया जाता है, शेष छन्द हैं। मन्त्रों का निर्माण तथा विकास उससे पूर्व के २०० वर्षों में अर्थात् १२०० ई० पूर्व में हुआ। ऋग्वेद में सर्वप्राचीन छन्द तथा मन्त्र हैं। इस प्रकार ऋग्वेद का काल १२०० वि० पूर्व हुआ। इस काल-गणना के विषय में मैक्समूलर पूरी तरह स्वयं भी सन्तुष्ट नहीं थे। उनके अनुसार यह समय निर्धारण तो मात्र सम्भावना पर आधारित है क्योंकि वेदों के समय को ठीक-ठीक निर्धारित करना असम्भव सा है। वेदों का अस्तित्व इसके पूर्व का भी हो सकता है। विल्सन, कीथ, कोलब्रुक आदि पाश्चात्य मनीषियों ने ऋग्वेद की रचना के काल निर्णय के विषय में मैक्समूलर का समर्थन किया है। ऋग्वेद के काल निर्णय के सम्बन्ध में अनेक विद्वानों ने मैक्समूलर की पद्धति को तो स्वीकार किया है, परन्तु प्रत्येक स्तर के विकास के लिए २०० वर्ष के समय को पर्याप्त नहीं माना है। सन् १८८९ ई० को भौतिक धर्म शीर्षक अपने जिफोर्ड व्याख्यानमाला के अवसर पर स्वयं मैक्समूलर ने स्पष्टतः अपने मत को एक अनुमान बतलाया तथा कहा कि विश्व की कोई भी शक्ति वेदों के काल को निर्धारित नहीं कर सकती है। ओल्डन वर्ग के अनुसार ऋग्वेद की रचना का काल २५०० ई० पूर्व का होना चाहिए। (४) ज्योतिष-सम्बन्धी तथ्यों पर आधृत मत :- वैदिक संहिताओं तथा ब्राह्मण ग्रन्थों में अनेक स्थलों पर ऋतु-सम्बन्धी एवं नक्षत्र-सम्बन्धी जानकारी प्राप्त होती है। कतिपय विद्वानों ने इन ऋतु एवं नक्षत्र विषयक जानकारी का उपयोग वेदों के रचना काल को निर्धारित करने के लिए किया है। उनमें से प्रमुख मत निम्नलिखित हैं—
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Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri द्वितीय अध्याय 75 (क) पं० शङ्कर बालकृष्ण दीक्षित का मत :- महाराष्ट्र निवासी प्रख्यात वेदज्ञ पं० शङ्कर बालकृष्ण दीक्षित ने शतपथ ब्राह्मण का एक अंश उद्धृत किया है, जिसके अनुसार इस ब्राह्मणग्रन्थ के रचनाकाल पर प्रकाश पड़ता है। इस अंश से विदित होता है कि शतपथ ब्राह्मण के रचनाकाल के समय कृत्तिकाओं को ठीक पूर्वीय बिन्दु पर उदित होने का निर्देश है, जहाँ से वे किञ्चिदपि पृथक् नहीं होती। उद्धृत अंश इस प्रकार है— ''एकं द्वे त्रीणि चत्वारीति वा अन्यानि नक्षत्राणि, अथैता एव भूयिष्ठा यत् कृत्तिका स्तद् भूमानमेव एतदुपैति तस्मात् कृत्तिकास्वादधीत। ऐता ह वै प्राच्यादिशो न च्यवन्ते, सर्वाणि ह वा अन्यानि नक्षत्राणि प्राच्यादिशयाच्यन्ते।'' (शतपथ ब्राह्मण २/१/२) आजकल कृत्तिका नक्षत्र पूर्वीय बिन्दु से किंचित् उत्तर की ओर हट कर उदित होता है। अतः दीक्षित जी की गणनानुसार कृतिका नक्षत्र में वसन्त सम्पात सम्भवतः २५०० ई० पूर्व हुआ होगा। यही शतपथ-ब्राह्मण की रचना का समय है। कृत्तिकादि नक्षत्रों का वर्णन करने वाली संहिता तैत्तरीय शतपथ-ब्राह्मण से प्राचीनतर है तथा तैत्तरीय संहिता से भी प्राचीनतर है ऋग्वेद। अतः चतुर्वेद के निर्माण में लगभग एक हजार वर्षों का समय व्यय हुआ होगा। अतः सर्वप्रथम निर्मित ऋग्वेद का निर्माण ३५०० ई० पूर्व हुआ होगा। (ख) लोकमान्य बालगंगाधर तिलक का मत :- स्वर्गीय श्री तिलक जी ने ऋग्वेद में उपलब्ध ज्योतिष विषयक घटनाओं के आधार पर वेद की रचना का सर्वप्राचीन काल ६००० ई०पू० से लेकर ४००० ई०पू० तक निर्धारित किया है। इस तिथिनिर्धारण का मुख्य आधार विभिन्न नक्षत्रों में वसन्त- सम्पात का वर्णन है। उन्होंने वैदिक काल को चार युगों में विभाजित किया है। वे चार युग निम्नलिखित हैं— (१) अदिति-काल :- इस काल की सीमा ६००० ई०पू० से लेकर ४००० ई०पू० तक है। इस काल में किंचित् गद्य में तथा किंचित् पद्य में अर्थात् गद्यपद्य मिश्रित यज्ञीय विधि वाक्यों की रचना हुई। इनकी संज्ञा निविद् है। इनमें देवताओं की संज्ञा, उनके गुणों तथा चरितों का वर्णन उपलब्ध होता है। (२) मृगशिरा-काल :- इस काल की सीमा ४००० ई०पू० से लेकर २५०० ई०पू० तक है। रचना के दृष्टिकोण से इस युग का सर्वाधिक महत्त्व है। इसी युग में ऋग्वेद के अधिकांश सूक्तों CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 76 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता की रचना हुई। (३) कृत्तिका-काल :- इस काल की सीमा २५०० ई०पू० से लेकर १४०० ई०पू० तक है। इसी युग में चारों मन्त्र संहिताओं का सम्पादन तथा तैत्तरीय संहिता एवं शतपथ ब्राह्मणादि कतिपय ब्राह्मण ग्रन्थों की रचना हुई। वस्तुतः मन्त्रों का निर्माण तो ६००० ई०पू० में ही आरम्भ हो गया था, परन्तु यज्ञीय दृष्टिकोण से उन मन्त्रों का परिमार्जन, परिष्कार तथा संकलन इसी काल में सम्पन्न हुआ- ‘‘It was at this time that the Saṁhitas were probably compiled into systematic books and attempts made to ascertain the meaning of the oldest hymns and formulae’’. (The Orion, Page 207) इसके अन्तिम भाग में वेदाङ्ग ज्योतिष की रचना हुई। इसमें सूर्य एवं चन्द्र के श्रविष्ठा के आदि में उत्तर दिशा की ओर घूम जाने का वर्णन है तथा यह स्थिति गणित के आधार पर लगभग १४०० ई०पू० के निकट होती है- ‘‘प्रपद्येते श्रविष्ठादौ सूर्याचन्द्रमसावुदक्। सर्वार्धे दक्षिणार्कस्तु माघ श्रवणवोः सदा॥’’ (४) अन्तिम काल :- इस काल की सीमा १४०० ई०पू० से लेकर ५०० ई०पू० तक है। इस काल में विशेष रूप से श्रौत-सूत्रों, गृह्य-सूत्रों तथा अन्य दर्शन सूत्रों का निर्माण हुआ। इसके अन्तिम भाग में वैदिक धर्म के विरुद्ध प्रतिक्रिया स्वरूप बौद्ध धर्म का उदय हुआ। अन्त में स्व० तिलक जी ने विचार प्रकट किया कि यदि वेदों का निर्माण काल ४००० ई०पू० स्वीकार कर लिया जाये तो भारतीय तथा पाश्चात्य विद्वानों के मतों का समन्वय हो जायेगा- ‘We can thus satisfactorily account for all the opinions and traditions current about the age of the Vedas amongst ancient and modern scholars in India and Europe if we place the Vedic period at about 4000 B.C. in strict accordance with the astronomical references and facts recorded in the ancient literature of India.’ तिलक की गणना प्रक्रिया :- ऋतु-चक्र, सूर्य-संक्रमण पर आधारित है। इसी के आधार पर ऋतुएँ आती जाती हैं। ऋतुएँ निरन्तर पीछे की ओर हट जाती हैं। प्रथम वर्ष का प्रारम्भ वसन्त से होता है। इस काल में वसन्त सम्पात क्रमशः जिन नक्षत्रों पर होता है, वे हैं- उत्तरा, CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri द्वितीय अध्याय 77 भाद्रपद, रेवती, अश्विनी, कृत्तिका, रोहिणी, मृगशिरा आदि। सम्प्रति वह मीन की संक्रान्ति से प्रारम्भ होता है। इस संक्रान्ति का प्रारम्भ पूर्वा भाद्रपद के चतुर्थ चरण से होता है। शनैः शनैः नक्षत्र क्रमशः पीछे की ओर हटते गए हैं। नक्षत्रों की कुल संख्या २७ है तथा सूर्य का संक्रमण चक्र ३६० डिग्री का है। इस प्रकार प्रत्येक नक्षत्र की ३६०/२७ = १३११ डिग्री दूरी प्राप्त होती है। प्रत्येक नक्षत्रकाल क्रमानुसार अपने मूल स्थान से हटता रहता है। एक डिग्री पीछे को हट जाने में एक नक्षत्र ७२ वर्ष का समय लेता है। अतः प्रत्येक नक्षत्र अपनी १३११ डिग्री की दूरी तय करने में कुल ७२×१३११= ९७२ वर्ष का समय लेता है। इस प्रकार निष्कर्ष यह निकला कि २५०० वर्ष पूर्व वसन्त-सम्पात हुआ होगा। तिलक जी को ऋग्वेद में कतिपय ऐसे मन्त्र भी उपलब्ध हुए हैं, जिनमें मृगशिरा नक्षत्र पर वसन्त-सम्पात होने का सङ्केत मिलता है। वे मन्त्र हैं- ऋग्वेद १/३३/१२, १/८०/७, १०/८६/५। यह वसन्त-सम्पात और भी आगे पुनर्वसु तक जाता है। कृत्तिका नक्षत्र, मृगशिरा नक्षत्र से दो नक्षत्र पूर्व तथा पुनर्वसु नक्षत्र से चार नक्षत्र पूर्व है। अतः मृगशिरा पर वसन्त-सम्पात का काल ९७२×२ = १९४४ वर्ष कृत्तिका नक्षत्र के वसन्त-सम्पात के काल से पूर्व होगा। इस प्रकार मृगशिरा नक्षत्र में वसन्त- सम्पात होने का काल ४४४४ ई० पहले है। इस प्रकार तिलक जी के अनुसार वेदों का निर्माण लगभग ४५०० वर्ष पूर्व हुआ होगा। अगर पुनर्वसु नक्षत्र में वसन्त-सम्पात को माना जाय तो इस रचनाकाल में २००० वर्षों की वृद्धि और हो जायेगी। (ग) डॉ० जैकोबी का मत :- डॉ० जैकोबी जर्मनी के बोन नगर के निवासी थे। इन्होंने भी ज्योतिषीय गणना के आधार पर ऋग्वेद का काल ४५०० ई०पू० निर्धारित किया है। उनका कथन है कि कल्पसूत्रों में आए विवाह प्रकरण में ध्रुव इवस्थिरा भव वाक्य का तात्पर्य है कि उस समय ध्रुवतारा अधिक चमकीला तथा स्थिर रहा होगा। यह स्थिति २००० ई०पू० सम्भव है। कृत्तिका नक्षत्र पर वसन्त-सम्पात का उल्लेख ब्राह्मण ग्रन्थों में मिलता है। अतः गणना करने पर यह समय लगभग २५०० ई०पू० का प्रतीत होता है। इस प्रकार ब्राह्मण ग्रन्थों तथा कल्प सूत्रों का समय २७०० ई०पू० से लेकर २५०० ई०पू० तक हो सकता है, इसलिये ऋग्वेद का समय इससे भी और पूर्व लगभग ४५०० ई०पू० होना चाहिये। (घ) हाग एवं आर्कविशप प्राट का मत :- हाग एवं आर्कविशप प्राट आदि विदेशी विद्वानों ने भी वेद काल निर्णय हेतु CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar