वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)
Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System
डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंDigitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri तृतीय वेद का काल निरूपण वेद आर्य-धर्म एवं दर्शन की आधारशिला हैं; मानवता के मूल हैं। मानव सभ्यता के विकास के अति प्राचीन काल से ही वैदिक शिक्षाएँ मानव मात्र को असत् से सत् की ओर प्रेरित करती रही है। भारतीय सभ्यता के प्राचीनतम स्वरूप के ज्ञानार्थ वेद नितान्त उपयोगी हैं। वेदों के गौरव तथा महत्त्व के विषय में वेदज्ञ एकमत हैं। इसके विपरीत वेदों के रचनाकाल के विषय में वेदज्ञ एकमत नहीं हैं, अपितु उनमें गहरा मतभेद है। इस वैदिकआलोक से कब भारत भूमि आलोकित हो उठी ? कब हमारे पूर्वज ऋषियों के हृदय रूपी मानसरोवर में वेद-हंस विचरण करने लगा ? कब हमारे पवित्र ऋषियों के हृदय में मानव मात्र के कल्याणार्थ वैदिक सन्देश प्रदान करने की सदिच्छा जागृत हो उठी? आदि प्रश्न आज भी अत्यन्त विचारणीय है, विवादास्पद हैं। विद्वानों का विचार है कि भविष्य में भी इन प्रश्नों का सर्वमान्य समाधान उपलब्ध हो जायें, ऐसी सम्भावना अत्यल्प है। इसके हल को ढूँढ निकालना आसान नहीं, तथापि पाश्चात्य तथा पौरस्त्य वेद के विद्वानों ने वेदों में उपलब्ध अन्तरंग तथा बहिरंग प्रमाणों के आधार पर कतिपय अनुमान प्रस्तुत किए हैं। इनमें से किसी एक को सत्य मानना न्यायसंगत नहीं, किन्तु विद्वानों के प्रयास श्लाघनीय अवश्य हैं। इस सम्बन्ध में विद्वानों के मतों को सात प्रकार का कहा जा सकता है, वे सात प्रकार हैं- (१) प्राचीन भारतीय परम्परा पर आधृत मत। (२) मैक्समूलर का मत, (३) ज्योतिष सम्बन्धी तथ्यों पर आधृत मत। (४) भाषा सम्बन्धी तथ्यों पर आधृत मत। (५) इतिहास सम्बन्धी तथ्यों पर आधृत मत। (६) शिला लेखों पर आधृत मत। (७) भूगर्भ सम्बन्धी तथ्यों पर आधृत मत। इन उपर्युक्त मतों का विस्तृत विवेचन निम्नलिखित है- (१) प्राचीन भारतीय परम्परा पर आधृत मतः प्राचीन भारतीय परम्पराओं के अनुसार वेदों को ईश्वरीय ज्ञान माना जाता है। वैदिक ज्ञान शाश्वत है तथा सृष्टि की उत्पत्ति के प्रारम्भिक काल में ईश्वर ने वैदिक ज्ञान का आविर्भाव किया। वेदान्त दर्शन भी वेद को अनादि तथा अपौरुषेयज्ञान मानता है। उसके अनुसार यह ज्ञान प्रलयोपरान्त भी नष्ट नहीं होता तथा पुनः सृष्ट्यारम्भ में ईश्वर के द्वारा CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar