वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)
Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System
डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा
पृष्ठ 100, कुल 353 में से
संदर्भ में पढ़ेंDigitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 72 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता प्रकट किया जाता है। वैदिक ज्ञान ठीक उसी प्रकार अनादि, अनन्त एवं अविनश्वर है, जिस प्रकार ईश्वर स्वयं अनादि, अनन्त तथा अविनश्वर हैं। सृष्टि की रचना के पश्चात् ईश्वर द्वारा यह ईश्वरीय ज्ञान ऋषियों के हृदयों में आलोकित होता है। तत्पश्चात् गुरु-शिष्य की अविच्छिन्न परम्परा अथवा शृङ्खला के द्वारा समस्त जगत् में प्रचलित हो जाता है। जगत् के प्रलयोपरान्त वह ज्ञान पुनः ईश्वर में समाहित हो जाता है। आधुनिक काल में ऋषि दयानन्द ने वेदों के उद्भव पर सप्रमाण विचार किया है। उनके मत में भी वेद अपौरुषेय हैं, ईश्वरीय कृति हैं, जिनका ज्ञान सृष्ट्यारम्भ में ईश्वर द्वारा मानव मात्र के मंगलार्थ ऋषियों के मन में प्रस्फुटित किया गया। सृष्टि की उत्पत्ति १९६०८५२९६६ वर्ष पूर्व हुई थी। ईश्वरप्रणीत ये वेद भी उसी काल में आविर्भूत हुए थे, अतः उतने ही पुरातन हैं। वेदों के ईश्वर प्रणीत होने के विषय में वेदों में तथा तदुपरान्त उपलब्ध साहित्य में अनेक प्रमाण प्राप्त होते हैं। नीचे वे मन्त्र प्रस्तुत किए जा रहे हैं, जो वेदों को ईश्वरकृत सिद्ध करने में प्रमाण स्वरूप हैं। तस्मा॑द्य॒ज्ञात्स॑र्व॒हुत॒ ऋचः॒ सामा॑नि जज्ञिरे। छन्दां॑सि जज्ञिरे॒ तस्मा॒द्यजु॒स्तस्मा॑दजायत।।९।। (ऋ० १०/९०/९, यजु० ३१/७) अर्थात् उस सर्वहुत यज्ञ से ऋचाएँ (ऋग्वेद), साम (सामवेद) उत्पन्न हुए, उससे गायत्री आदि छन्द उत्पन्न हुए तथा उससे यजुष् (यजुर्वेद) उत्पन्न हुआ। तथा यस्मा॒दृचो॑ अपा॒तक्ष॒न् यजुर्यस्मा॑द॒पाक॑षन्। सामा॑नि॒ यस्य॒ लोमा॒न्यथ॑र्वाङ्गिरसो मुखं॑ स्क॒म्भं तं ब्रू॑हि कत॒मः स्विदे॒व सः॥ (अथर्व० १०/७/२०) अर्थात् जिससे ऋक् मन्त्रों को उन्होंने सूक्ष्म किया, जिससे यजुः ज्ञान को उन ऋषियों ने कसौटी पर रखा, सामविद्या जिसके रोम हैं तथा अथर्वमन्त्र मुख हैं, (वह कौन सा स्कम्भ है ? तू कह दे) इस प्रकार से ऋग्वेद, यजुर्वेद तथा अथर्ववेद में स्पष्टतः वेदों को ईश्वर से उत्पन्न बतलाया गया है। ब्राह्मण, आरण्यक, उपनिषद्, दर्शन, स्मृति आदि ग्रन्थों में भी वेदों को ईश्वरकृत कहा गया है। CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar