वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( ४४ )
हमारे शरीरका बुढ़ापा आ गया, पर तृष्णाकी तो जवानी चढ़ रही है ! महात्मा सुन्दरदासजी कहते हैं—
नैननकी पलही पलमें, क्षण आधि घरी घरी घटिका जु गई है । जाम गयो जुग जाम गयो, पुनि सैक गई तब रात भई है । आज गई अरु काल गई, परसों तरसों कलु और ठई है । सुन्दर ऐसे ही आयु गई, तृष्णा दिन ही दिन होता नई है ।
आज सारा संसार तृष्णाके फेरमें पड़ा हुआ है। अमीर और गरीब सभी इसके बन्धनमें बँधे हैं। गरीबीकी अपेक्षा धनियोंको तृष्णा बहुत है। धनी हमेशा निन्ध्यानवै के फेरमें लगे रहते हैं। ६६ होने पर १०० पूरे करनेकी फिक रहती है। हजार होनेपर दस हजारकी, दस हजार होनेपर लाखकी, लाख होनेपर करोड़की और करोड़ होनेपर अरब-खरबकी तृष्णा लगी रहती है। इसी फेरमें मनुष्य रोगी और बूढ़ा हो जाता है, पर तृष्णा न रोगिणी होती है और न बूढ़ी। “सुभाषितावलि”में लिखा है :—
यौवनं जया प्रस्तमोराम्यं व्याधिभिर्हतम् ।
जीवितम् मृत्युरन्येति तृष्णैका निरुपद्रवा ॥
जवानी बुढ़ापेसे, आरोग्यता व्याधियोंसे और जीवन मृत्यु से प्रसित है ; पर तृष्णाको किसी उपद्रवका डर नहीं ।