वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
पृष्ठ 120, कुल 648 में से
संदर्भ में पढ़ेंपेट पसार दिये जितही तित
तैं यह भूख कितो इक थापी ।
और न छोर कछूँ नहि आवत ।
मैं बहु माँति भली विधि मापी ।
देखत देह भये सब जीरन ।
तू नित नूतन आहि अद्यापि ।
मुन्दर तोहि सदा समुभावत,
हे तुष्णा ! अजहूँ नहि धापी ॥
और भी :—
जीव्यन्ते जीव्यंतः केशा दन्ता जीव्यन्ति जीव्यंतः,
जीव्यंते चक्षुषी श्रोत्रे तुष्योका तक्ष्यायते ॥
जीर्ण होनेसे बाल जीर्ण हो जाते हैं, जीर्ण होनेसे दाँत जीर्ण हो जाते हैं, जीर्ण होनेसे आँख और कान भी जीर्ण हो जाते हैं ; पर एक तुष्णा तरुण होती जाती है ।
सारांश यह कि, मनुष्य नितान्त निकम्मा और जज्जर शरीर होनेपर भी तुष्णाको नहीं त्यागता, यही बड़े आश्चर्यकी बात है । शङ्कराचार्य महाराजने “मोहमुद्गर”में ठीक ही कहा है :—
अंगं गलितं पलितं मुबडं
दन्तविहीनम् यातं तुण्डम् ।