भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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पेट पसार दिये जितही तित

तैं यह भूख कितो इक थापी ।

और न छोर कछूँ नहि आवत ।

मैं बहु माँति भली विधि मापी ।

देखत देह भये सब जीरन ।

तू नित नूतन आहि अद्यापि ।

मुन्दर तोहि सदा समुभावत,

हे तुष्णा ! अजहूँ नहि धापी ॥

और भी :—

जीव्यन्ते जीव्यंतः केशा दन्ता जीव्यन्ति जीव्यंतः,

जीव्यंते चक्षुषी श्रोत्रे तुष्योका तक्ष्यायते ॥

जीर्ण होनेसे बाल जीर्ण हो जाते हैं, जीर्ण होनेसे दाँत जीर्ण हो जाते हैं, जीर्ण होनेसे आँख और कान भी जीर्ण हो जाते हैं ; पर एक तुष्णा तरुण होती जाती है ।

सारांश यह कि, मनुष्य नितान्त निकम्मा और जज्जर शरीर होनेपर भी तुष्णाको नहीं त्यागता, यही बड़े आश्चर्यकी बात है । शङ्कराचार्य महाराजने “मोहमुद्गर”में ठीक ही कहा है :—

अंगं गलितं पलितं मुबडं

दन्तविहीनम् यातं तुण्डम् ।