वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
पृष्ठ 121, कुल 648 में से
संदर्भ में पढ़ेंकरधृतकम्पितशोभितदण्डम् ।
तदपि न मुञ्चत्याशाभण्डम् ॥
अंग शिथिल हो गये हैं, बुढ़ापेसे सिर सन हो गया है, मुहमें दाँत नहीं रहे हैं, हाथमें लौ लकड़ीकी तरह शरीर काँपता है ; तोभी मनुष्य आशा रूपी पात्रको नहीं त्यागता !
संसार आशा और तृष्णाके बन्धनमें बँधा है । तृष्णा न होती तो मनुष्यको स्वर्ग या मोक्ष पानेमें कुछ भी दिकत न होती ; क्योंकि तृष्णाका नाश ही तो मोक्ष या स्वर्ग है । शंकराचार्यरुक्त “प्रश्नोत्तरमाला”में लिखा है :—
बन्धो हि केो यो विषयानुरागी ।
का वा विमुक्तिर्विषयेविरक्तिः ॥
केो वास्ति घेरो नरकस्वदेह—
स्तृष्णाद्वायस्स्वर्गपदं किमस्ति ?
बन्धनमें कौन है ? विषयानुरागी ।
विमुक्ति क्या है ? विषयोंका त्याग ।
घेरो नरक क्या है ? अपना शरीर ।
स्वर्ग क्या है ? तृष्णाका नाश ।
और भी किसी ने कहा है :—
कामानां हृदये वासः संसार इति कीर्त्तितः ।
तेषां सर्वात्मना नाशेो मोक्ष उक्तेो मनीषिभिः ॥