भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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करधृतकम्पितशोभितदण्डम् ।

तदपि न मुञ्चत्याशाभण्डम् ॥

अंग शिथिल हो गये हैं, बुढ़ापेसे सिर सन हो गया है, मुहमें दाँत नहीं रहे हैं, हाथमें लौ लकड़ीकी तरह शरीर काँपता है ; तोभी मनुष्य आशा रूपी पात्रको नहीं त्यागता !

संसार आशा और तृष्णाके बन्धनमें बँधा है । तृष्णा न होती तो मनुष्यको स्वर्ग या मोक्ष पानेमें कुछ भी दिकत न होती ; क्योंकि तृष्णाका नाश ही तो मोक्ष या स्वर्ग है । शंकराचार्यरुक्त “प्रश्नोत्तरमाला”में लिखा है :—

बन्धो हि केो यो विषयानुरागी ।

का वा विमुक्तिर्विषयेविरक्तिः ॥

केो वास्ति घेरो नरकस्वदेह—

स्तृष्णाद्वायस्स्वर्गपदं किमस्ति ?

बन्धनमें कौन है ? विषयानुरागी ।

विमुक्ति क्या है ? विषयोंका त्याग ।

घेरो नरक क्या है ? अपना शरीर ।

स्वर्ग क्या है ? तृष्णाका नाश ।

और भी किसी ने कहा है :—

कामानां हृदये वासः संसार इति कीर्त्तितः ।

तेषां सर्वात्मना नाशेो मोक्ष उक्तेो मनीषिभिः ॥