भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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हृदयमें जो कामनाओंका निवास है, उसीको “संसार” कहते हैं और उनके सब तरहसे नाश हो जानेको “मोक्ष” कहते हैं।

संसारमें बारम्बार आना और यहाँसे जाना ; यानी जन्म लेना और मरना ये बहुत ही दुःखदायी हैं ; अतः जिन्हें अपने तर्ह जन्म-मरणसे मुक्त करना हो, वे कभी भूल कर भी तृष्णा-राक्षसीके भुलावेमें न आवें ; क्योंकि इसके चक्रमें पड़नेसे इस लोकमें नीच-से-नीच कर्म करने होंगे और इतने पर भी तृष्णा शान्त न होगी और उधर परलोक भी न बनेगा । जो निस्सृह हैं, जिन्हें कामना या तृष्णा नहीं, वे मनुष्यरूपमें ही देवता हैं । मरने पर वे स्वर्ग या मोक्षके अधिकारी होंगे, इसमें ज़रा भी सन्देह नहीं ।

दोहा ।

सेत चिकुर तन दशन विन, वदन भयो ज्यों कूप ।

गात सबै शिथिलित भये, तृष्णा तरुण स्वरूप ॥१४॥

14. In old age, the face is marked with wrinkles, the head is lined with grey hair and the limbs all grow loose, but Desire alone becomes rejuvenated and predominant.

येनैवाम्वरसृण्डेन संवीतो निशि चन्द्रमाः ।

तेनैव च दिवा भातुरहो दौर्गत्यमेतयोः ॥१५॥