वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंआकाशके जिस टुकड़ेको ओढ़कर चन्द्रमा रात बिताता है, उसी को ओढ़कर सूर्य दिन बिताता है। इन दोनोंकी कैसी दुर्गति होती है! ॥ १५ ॥
आकाशके जिस हिस्सेको, रातके समय, चन्द्रमा तय करता है, उसीको दिनमें सूर्य तय करता है। सूरज और चाँद—ज्योतिष्योंमें सर्वश्रेष्ठ और सबसे बड़े हैं। जब ऐसे-ऐसोंकी ऐसी दुर्गति होती है, कि बेवारोंको रात-दिन इधर-से-उधर और उधर-से-इधर चकर लगाने पड़ते हैं और परिणाममें कोई फल भी नहीं मिलता; तब हमारी आपकी कौन गिन्ती है? जब ये पराधीनताकी बेड़ियोंमें जकड़े हुए हैं, इन्हें ज़रासी भी आज़ादी नहीं है, एक दिन क्या—एक क्षण भी ये अपनी इच्छानुसार आराम नहीं कर सकते, तब इतर छोटे प्राणियोंकी क्या बात है?
शिक्षा—बड़ोंकी दुर्दशा देखकर छोड़ोंको अपनी विपत्ति पर रोना-कलपना नहीं, बल्कि सन्तोष करना चाहिये। संसारमें कोई भी खुशी नहीं है।
दोहा।
इक अम्बरके टूककों, निशिमें ओढ़त चन्द।
दिनमें ओढ़त ताहि रवि, तू कत करत खण्ड ? ॥ १५ ॥
15. The Sun has to move during the day through the same parts of the heavens as the Moon does at night. Being the two-