वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
पृष्ठ 132, कुल 648 में से
संदर्भ में पढ़ेंdom of Swarga, although it is worn out by long, long ages having passed over it.
कृशः काणः स्वज्जः श्रवणरहितः पुच्छविकलो
वर्णी प्रयुक्लिः कृमिकुलशतैरावृतततः ॥
चुथात्तामो जीर्णः पिठरजकपालार्पितभलः
शुनीमन्वेति श्वा हतमपि च हन्त्येव मदनः ॥१८॥
दुबला काना और लँगड़ा कुत्ता, जिसके कान और पूँछ नहीं हैं, जिसके ज़ख्मोंसे राध बह रही है, जिसके शरीरमें कीड़े किल-बिला रहे हैं, जो भूखा और बुढ़ा है, जिसके गलेमें हँडीका घेरा पड़ा है—कुतियाके पीछे-पीछे दौड़ता है। कामदेव मेरे हुस्के भी मारता है ॥१८॥
जिस कुत्तेकी ऐसी बुरी हालत है, वह कुत्ता भी मेशुन करनेके लिये कुतियाके पीछे-पीछे दौड़ता है; तब मोटे-ताज़े मावा-मलाई और मिष्ठान्न खाने वाले अपनी कामवासनाको कैसे रोक सकते हैं? इसीसे बचनेके लिये, ज्ञानी लोग अपनी देहको एकदम गला देते हैं, तरह-तरहके व्रत और उपवास करते हैं, धुनी तपते हैं और शीत-घास सहते हैं। कामदेव बड़ा बलवान् है। जो उसके क़ाबूमें नहीं आते, वे सबसे बलवान् और सच्चे योद्धा हैं। वे भीष्म और अर्जुन हैं।
18. The lean, blind and lame dog, without either ears or tail, with blood oozing out of its wounds, hundreds and thousands of