वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंworms sticking to his body, hungry and old, with the upper portion of a broken earthen vessel hanging round his neck, is pursuing the bitch. How cruel is Cupid to shoot his arrows at those who are already dead.
भिन्नाशनं तदपि नीरसमेकवारं शय्या च सः परिजो निजदेहमात्रम् ॥ कर्त्तुं च जीर्णशतखण्डमलीनकन्या हा हा तथाऽपि विषया नपरित्यजन्ति ॥१६॥
वह मनुष्य जो भीख माँगकर दिनमें एक समय ही नीरस अलौना अन्न खाता है, धरती पर सो रहता है, जिसका शरीर ही उसका कुटुम्बी है, जो सौ थेगलियोंकी गुदड़ी आदता है, आश्चर्य्य है कि, ऐसे मनुष्यको भी विषय नहीं छोड़ते ! ॥१६॥
जो दिन-भरमें एक बार अलौना—फीका अन्न खाते हैं और वह भी माँग-ताँग कर ; जिनके पास सोनेके लिये पलँग और गह-तकिये नहीं, बेचारे पेड़ोंके नीचे या खुले मैदानमें घास-पात पर सो रहते हैं ; जिनके नाते-रिश्तेदार कोई नहीं, उनका अपना शरीर ही उनका नातेदार है ; जिनके पास पहनने को कपड़े नहीं, बेचारे ऐसी गुदड़ी ओढ़ते हैं, जिसमें सैकड़ों वीथड़े लटकते हैं—ऐसे लोगोंका भी विषय पीछा नहीं छोड़ते, तब धनियोंका पीछा तो वे कैसे छोड़ने लगे, जहाँ उन्हें सब तरहके पेशो-आराम मिलते हैं ? कहा है :—