भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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दिन ब्रह्माजी ऋषिसे मिलने गये। ऋषि उस समय कहीं बाहर गये हुए थे। उस पतिव्रताने ब्रह्माजीको आसन बिछा कर बिठाया। ब्रह्माजी उसका रूप देखकर सुख हो गये। उनका वीर्य निकल गया; अतः वे लज्जित हो उठ गये। इतनेमें ऋषि आ गये। उन्होंने वीर्य पड़ा देख खीसे पूछा—“यह क्या!” उसने कहा—“स्वामिन्! ब्रह्माजी आये थे।” सुनकर ऋषिने कहा—“स्त्रीका दर्शन ही ऐसा है कि, जिससे देवता भी घैर्य त्याग देते हैं।”

एक बार महादेवजी समाधिस्थ थे। वहीं वनमें मनुष्योंकी सुन्दरी और युवती खियाँ कूड़ा कर रही थीं। शिवजीका मन चल गया। उन्होंने अपने तपोबलसे उन्हें आकाशमें ले जाकर उनसे भोग किया। अन्तमें पावतीजीने खियोंको नीचे गिरा दिया और शिवजीको समाधिमें लगाया।

विष्णु भगवान्ने जलन्धर नामक राक्षसकी वृन्दा नामक पतिव्रता खीसे छलकर भोग किया। उसने उन्हें श्राप दिया।

इन्द्रने गौतम ऋषिको खी अहिंसासे छलसे भोग किया और इतनेमें ऋषि आ गये। उन्होंने इन्द्रको देखते ही श्राप दिया। ऋषिके श्रापसे इन्द्रके शरीरमें भग-ही-भग हो गयीं।

एक बूढ़ा तपस्वी किसी मन्दिरमें अकेला रहता था। वह पूरा जितेन्द्रिय था। देवात् एक युवती उस मन्दिरके सामनेसे निकली। तपस्वी सुख हो गया और उसके पीछे हो लिया। जब वह अपने घर पहुँची, तब ऋषि भी द्वार पर जाकर उससे