भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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विश्वामित्रपराशरप्रभृतयो वाताम्बुपर्णाशना- स्तेऽपि स्त्रीमुखपंकजे सुललितं दृष्ट्वैव मोहगताः । शाल्यज्ञं सघृतं पयोदधिष्ठुतं ये भुञ्जते मानवा- स्तेषामिन्द्रियनिग्रहो यदि भवेद्विन्द्यस्तेरत् सगरे ॥

विश्वामित्र और पराशर प्रभृति ऋषि भी,—जो हवा, जल और पत्ते खाते थे—स्त्रीका कमल-मुख देखकर मोहित हो गये ; फिर शालिर्चावल, दही और घी मिला भोजन जो खाते हैं, उनकी इन्द्रियाँ यदि उनके वशमें हो जायँ, तो विन्द्याचल पर्वत भी समुद्रमें तैरने लगे। मतलब यह है कि, पत्तों और जल पर गुजर करनेवाले ऋषि भी जब स्त्रियों पर मोहित हो गये, तब घी दूध खानेवालोंकी क्या बात है ? कामदेवका वश करना बड़ा कठिन है। पराशर ऋषिने दिनकी रात कर दी और नदीको रेतमें परिणत कर दिया, पर वे भी कामको वश में न कर सके। इतना ही नहीं ; बड़े-बड़े देवता भी कामको वशमें न कर सके। स्वयं ब्रह्मा, विष्णु और महेश तकको कामने जीत लिया। “आत्मपुराण”में लिखा है :—

कामेन विजिता ब्रह्मा, कामेन विजिता हरिः

कामेन विजितः शम्भुः, शक्रः कामेन निर्जितः ॥

कामदेवने ब्रह्मा, विष्णु, शिव और इन्द्रको जीत लिया ।

“पद्मपुराण”में लिखा है,—शान्तनु नामक ऋषिकी स्त्रीका नाम अमोघा था। वह परमा सुन्दरी और पतिव्रता थी। एक

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