भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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( ड )

१६ विभ्रामित्र और मेनका ... ५५

१७ पारंशर और नाविककी कन्या ... ५५

१८ वृद्ध तपस्वीका युवती पर सुगंध होकर सिर कटाना ५७

१९ सुन्दरी से सुन्दरी कामिनी की असलियत ... ५६

२० बहू अपनी सेवा टहलसे मुझे खुश रखती है।

महात्मा—भैया सब मतलबसे प्रीति करते हैं ... ६६

२१ लड़केका साँस चढ़ा लेना और खीका उसे मुदाँ

समझ कर पहले खोर खाना। ... ६६

२२ लड़केकी खी और माँ एवं अन्य कुटुम्बी उसके

चारों तरफ़ जमा होकर रोते पीटते हैं। बसमें

फँसे हुए पैरोंको खी कटवाना चाहती है। ... ६७

२३ गोस्वामी तुलसीदास जी और उनकी धर्मपत्नी ७५

२४ हाय ! यहाँ पहले कैसा राजा था इत्यादि ... १२१

२५ योग-निद्रामें मन्न तपस्वी ... १४०

२६ विवेकप्रश्नों का पद-पद पर पतन (गङ्गा का दृष्टान्त) १४८

२७ शुद्धचित्त योगीश्वर हो आशानदीके पार जा सकते हैं १४६

२८ हे स्त्री ! तू कटाक्षवाण क्यों चलाती है ? तेरा

परिश्रम व्यर्थ होगा, क्योंकि अब हमने विषयों

को तृणवत् त्याग दिया है ... २४२

२९ अज्ञानी मनुष्य पतङ्ग और मछलियों को तरह संसार

के माया-मोहमें फँसकर अपना नाश करते हैं २४७

३० अरे मूल ! विश्वेशकी शरण में क्यों नहीं जाता ? ३१७

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