वैराग्य शतक

वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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चिन्मन्त्री
| १ | देवता तपस्वी ब्राह्मणको अमर-फल देता है | ... २६ |
|---|---|---|
| २ | तपस्वी-ब्राह्मण महाराजा भर्तृहरिको अमरफल देता है | २८ |
| ३ | महाराजा भर्तृहरि रानी पिङ्गलाको अमर फल देते हैं | २९ |
| ४ | रानी अपने उपपति दारोगाको अमरफल देती है | ३१ |
| ५ | दारोगा अपनी प्रणयिनी वेश्याको अमरफल देता है | ३२ |
| ६ | वेश्या महाराजा भर्तृहरिको अमरफल देती है | ३३ |
| ७ | महाराजा भर्तृहरिको संसारसे विरक्ति हो जाती है | ३४ |
| ८ | धनके लिये अनेक उपाय किये, पर एक कानी कौड़ी | |
| भी न मिलो। तृष्णा ! अब तो पीछा छोड़ ! | १२ | |
| ९ | संसारमें स्त्री ही सब दुःखोंका कारण है | ... २४ |
| १० | द्विदावस्थामें वैराग्य । | ... ४१ |
| ११ | सुखेश्वर्यमें वैराग्य । | ... ४२ |
| १२ | बुद्धापि में तृष्णा । | ... ४३ |
| १३ | सूरज और चन्द्रमाकी पराधीनता । | ... ४८ |
| १४ | कामदेव मरेको भी मारता है । | ... ५३ |
| १५ | ब्रह्माका अमोघा पर मोहित होना । | ... ५४ |