वैराग्य शतक

वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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हज़ारी संस्करण प्रायः डेढ़ सालमें ही शेष हो गया। अनेक पत्रसम्पादक महोदयोंने भी हमारा श्रृंगार शतक पढ़ कर भूरि-भूरि प्रशंसा की है। “वर्त्तमान”-सम्पादक श्रद्धेय पण्डित रमाशङ्करजी अवस्थी तो उस पर विलोजन से फिदा हो गये। बस, इन्हीं सब वज्झातोंसे हमारा और प्रकाशकोंका दिल बढ़ा है और हम लोग इसमें भी वृद्धि करने पर तैयार हुए हैं। आशा है, मनोरथदाता कृष्ण हमारी मनोकामना सफल करेंगे और हमारे प्रेमी पाठक पहलेकी तरह ही हमारा उत्साह बढ़ाते रहेंगे।
कलकत्ता।
१५ मई, सन् १९२५ ई०
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विनीत—
अनुवादक