वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( ३ )
मित्रने हमारी अनुपस्थितिमें कितने ही खलोंमें महाराज प्रताप सिंहजी की व्रतकारिणी कविताओंके कठिन शब्दोंके अर्थ कुटनोद्योंके स्थानोंमें लिखनेकी कृपाकी है। इस शब्दार्थसे साधारण हिन्दी जानने वालोंको कविताओंका मर्म समझनेमें अवश्य आसानी होगी ; पर अफसोस है, सारी ही कविताओंके शब्दार्थे विस्तार-भयसे नहीं लिखे गये। सभी कविताओंके शब्दार्थकी ज़रूरत भी नहीं समझी गई, क्योंकि घूम फिर कर वे ही शब्द बारम्बार आते हैं। आशा है, पाठक इतनेसे ही सन्तुष्ट हो जायेंगे।
इस संस्करणमें, भाषाकी बुटियों पर भी जहाँ-तहाँ ध्यान दिया गया है। फिर भी आधीसे ज़ियादा पुस्तक हमारी नमौ-जूदगीमें छपी, इसलिये वहाँ कोई सुधार न हो सका। अगर इस संस्करणमें भी बुटियाँ या गलतियाँ रह गई हों, तो पाठको से हमारा नम्र निवेदन है कि, वे हमें पहलेकी तरह ही क्षमा प्रदान करें।
भगवान् कृष्णकी असीम कृपासे हमारे अनुवाद किये हुए “श्रृंगार शतक” का भी नवीन संस्करण होने वाला है। पुस्तक प्रेसमें दे दीगई है। अगर दैव अनुकूल रहा, विघ्न-बाधाओंका सामना न करना पड़ा, कोई अमङ्गल घटना न घटी और स्वास्थ्य अच्छा रहा, तो श्रृंगार शतकके भी चित्रों और पृष्ठों में वृद्धि की जायगी ; क्योंकि हमारा श्रृंगार भी पाठकोंने खूब पसन्द किया है। पाठकों की क्रूरदानीका ही नतीजा है कि, दो