भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

Devanagarihipublished648 पृष्ठ

पृष्ठ 141, कुल 648 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 141

( ५८ )

जो स्त्री-जातिसे इस तरह अलग रहेंगे, वे ही कदाचित् इस बलासे बच सकेंगे। इसे देखकर मनको वशमें रखना बड़ा कठिन काम है। सभी भीष्म और अर्जुन नहीं हो सकते। संसारी लोग कितने ही दुःख, ताप और कष्ट क्यों न पावें ; किन्तु उनका मन उस ऊर्टकी तरह है, जो काँटेदार वृक्षोंको खाना पसन्द करता है ; काँटेदार वृक्षोंके खानेसे उसके मुँह से खून बहने लगता है, पर वह उनका खाना नहीं छोड़ता ; इसी तरह जिन्हें विषयोंका स्वाद आ गया है, वे अनेक तरह के कष्ट भोगने पर भी उन्हें नहीं त्यागते ; किन्तु जब उनमें विवेक आ जाता है, उनमें सत-असतके विचारकी शक्ति हो जाती है, तब उन्हें उनसे विरक्ति हो जाती है। उस अवस्थामें स्त्री जातिसे नफ़रत हो जाती है।

शिक्षा-विषय विष है। इनका त्याग हो सुखकी जड़ है। जो विषयी हैं, उन्हें कहीं सुख नहीं है। अतः कामको जीतो। जिसने कामको जीत लिया, उसने सबको जीत लिया।

छण्पय ।

भीख-अन्न इकवार, लौन दिन खाय रहत हूँ । फटी गुदरी ओढ़, वृक्ष की छाँह गहत हूँ । घास पात कहु डारि, धूमि पर नित प्रति सोवत । राख्यौ तन परिवार, भार यह ताको ढोवत ।