वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( ५६ )
इहि भौति रहत चाहत न कहु, तज, विषय बाधा करत । हरि ! हाय २ तेरी शरणा, आय पर्यो इनसे डरत ॥१६॥
19. A man may go a-begging for his food and get a tasteless meal once a day, he may have earth only for his bed and his own body for his servant. His clothes may only consist of an old and dirty sheet with hundreds of rags hanging from it, But what a pity that the objects of pleasure do not desert even such a man.
स्तनौ मांसग्रन्थी कनककलशाविस्तुपमितौ
मुखं श्लेष्मागारं तदपि च शशकेन तुलितम् ॥
सबन्मूलकिन्नं करिवरकरस्पर्द्धिं जयन-
महो निन्यं रूपं कविजनविशेषैर्गुरु कृतम् ॥१०॥
स्त्रियोंके स्तन मांसके लौदे हैं, पर कवियोंने उन्हें सोनेके कलशोंकी उपमा दी है। स्त्रियोंका मुँह कफका घर है, पर कवि उसे चन्द्रमाके समान बताते हैं और उनकी आँखोंको, जिनमें पेशाव प्रभृति बहते रहते हैं, श्रेष्ठ हाथीकी सूँडके समान कहते हैं। स्त्रियोंका रूप घृणायोग्य है, पर कवियोंने उसकी कैसी तारीफ़ की है ! ॥१०॥
स्त्री नरककुण्ड है ।
स्त्रियोंकी छातियाँ—जिनपर विषयी मरे मिटते हैं, जिनकी कवियोंने बड़ी-बड़ी प्रशंसायें की हैं, जिन्हें वे सोनेके कलसों अथवा अनार और नारङ्गियोंके समान बताते हैं—वास्तवमें