वैराग्य शतक

वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
Devanagarihipublished648 पृष्ठ
पृष्ठ 148, कुल 648 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 148
( ६१ )
हाड़ मांस मज्जा मेद, चाममुँ लपेटि राखै । ठोर-ठोर रक्तके, भेड़ भगडार हैं ॥ मूत्रह पुरीष आत, एकमेक मिलि रहौं । और ही उदर माँहि, विविध विकार हैं ॥ सुन्दर कहत, नारी नखशिख निन्दा-रूप । ताहि जा सराहै, सो तो बड़ेई गँवार है ॥२॥
( ३ )
( राग सोरठ )
अनाड़ी मन ! नारी नरकका मूल । रंग रूप पर भया लुभाना, क्यों मूल गया हरि नाम दिवाना ? । इस धन यौवनका नाहि ठिकाना, दो दिनमें हो जाय घूल ॥१॥ कंचन भरे दो कलश बतावे, ताहि पकड़ आनन्द मनावे । यह तो चमड़ेकी थैली हैं मूरख, जिन पै रहो तू भूल ॥२॥ जा सुखको तू चन्दा कर माने, थूक राल वामें लिपटाने । धिक धिक धिक ! तेरे या सुख पै, मिथामें रहो तू भूल ॥३॥