भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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( ६२ )

कैसा भारी घोका खाया,

तन पर कायिनके ललचाया ! ।

कहैं कवीर आँखसे देखा,

यह तो माटीका स्थूल ॥४॥

( ४ )

उदरमें नरक, अर्ध द्वारनमें नरक,

कुचनमें नरक, नरक भरी छाती है ।

कयठमें नरक, गाल चिबुक नरक-बिम्ब,

मुखमें नरक, जीभ लालहू चुवाती है ।

नाकमें नरक, आंख कानमें नरक बहें,

हाथ पाँउ नखशिख, नरक दिखाती है ।

सुन्दर कहत, नारी नरकको कुण्ड यह,

नरकमें जाइ परे, सो नरक पाती है ॥

स्त्रीमें रूप नहीं ।

स्त्रियोंके जिस शरीरकी कामियोंने भूरि-भूरि प्रशंसा की है, तत्त्वविद् वेदान्तियोंने उसीकी पेट-भर निन्दा की है । वास्तवमें बात भी ऐसी ही है । असलमें नारी उतनी सुन्दरी नहीं, जितनी कि कवियोंने लिखी है । गुम्बद पर कलई है । सचमुच ही नारी नरकका रूप है ; इसके भीतर मल-मूत्र शूक और खवार भरे हैं । पर लोग ऊपरकी चमक-दमक पर मरे मिटते

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